Ahmedabad Serial Blast

अहमदाबाद ब्लास्ट केस: कैसे एक जांच ने भारत में सीरियल ब्लास्ट के दौर को थाम दिया?

Summary
2008 का दौर तो भयावह था जब सीरियल ब्लास्ट रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। 13 मई, जयपुर… 25 जुलाई, बेंगलुरु, 26 जुलाई, गुजरात, 13 और 27 सितंबर दिल्ली, 29 सितंबर मालेगांव, 29 सितंबर  मोडासा गुजरात, 30 अक्टूबर असम और फिर आया 26/11 मुंबई अटैक।

गुजरात हाईकोर्ट के इस फैसले की चर्चा हर तरफ है कि अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामले के 38 आतंकियों की फांसी बरकरार रहेगी लेकिन चर्चा इस बात की भी होनी चाहिए कि इस मामले में जो कार्रवाई हुई थी वो कैसे देश के लिए एक बेंचमार्क बन गई और उसका नतीजा ये हुआ कि बीते 12-14 सालों में सीरियल ब्लास्ट वाली घटनाएं रिपीट नहीं हुई।

एक दौर था जब देश में ये डर था कि वो घर से बाहर तो निकल गए हैं लेकिन सुरक्षित घर वापस आ पाएंगे या नहीं… किसी लावारिश चीज को देखते ही मन में ये खयाल आता था कि कहीं इसमें बम तो नहीं। 

2008 का दौर तो भयावह था जब सीरियल ब्लास्ट रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। 13 मई, जयपुर, 25 जुलाई, बेंगलुरु, 26 जुलाई, गुजरात, 13 और 27 सितंबर दिल्ली, 29 सितंबर मालेगांव, 29 सितंबर  मोडासा गुजरात, 30 अक्टूबर असम और फिर आया 26/11 मुंबई अटैक।

यानी हर दूसरे दिन, हर दूसरे महीने पूरे देश भर में सीरियल ब्लास्ट हो रहे थे। 26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में सिर्फ 70 मिनट के भीतर 21 धमाके हुए। 

तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे और गृह राज्य मंत्री अमित शाह। इन धमाकों के तुरंत बाद जांच शुरू हुई। अमित शाह रोज वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ 4-4 घंटों तक बैठक करते थे और मात्र 21 दिन के भीतर इस हमले की गुत्थी सुलझा दी गई थी। 

इस गुत्थी सुलझा देने के लिए कॉल डीटेल्स निकाली गईं। धमाकों में इस्तेमाल हुई चोरी की कारों की तस्वीरें पब्लिक की गई। एक स्थानीय व्यक्ति खुद पुलिस के पास पहुंचा और उसने बताया कि आतंकी पहले उसके यहां किराए पर रह चुके हैं। 

मामले में कई गिरफ्तारियां हुई और इंडियन मुजाहिदीन के मॉड्यूल, उसके ट्रेनिंग नेटवर्क और अलग-अलग राज्यों में फैले संपर्कों की अहम जानकारी सामने आई। इसी दौरान आजमगढ़ के मौलवी अबू बशर जो इस नेटवर्क की महत्वपूर्ण कड़ी था उसे गिरफ्तार कर तत्काल एक खास प्लेन से अहमदाबाद लाया गया ताकि पूछताछ से मिले इनपुट पर बिना देरी कार्रवाई की जा सके। (ये पार्ट हटा देना)

ये जांच एक राज्य की सीमा से निकलकर राष्ट्रीय स्तर के आतंकवाद विरोधी अभियान में बदल गई। गुजरात पुलिस ने जुटाए गए इनपुट दिल्ली पुलिस, महाराष्ट्र एटीएस और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों के साथ साझा किए। 

अहमदाबाद जांच से मिले सुरागों ने आगे चलकर सितंबर 2008 के बाटला हाउस ऑपरेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।.. बाटला हाउस छापे के लिए इनपुट इस जांच से निकले थे। देशभर में फिर इंडियन मुजाहिदीन के कई मॉड्यूल का खुलासा हुआ और ये नेटवर्क तब जाकर कमजोर पड़ा। 

इसलिए इस ऑपरेशन को भारत के सबसे बड़े आतंकवाद विरोधी ऑपरेशनों में से एक माना जाता है। अब आप इसे देश के स्तर पर देखिए। तब के गुजरात सीएम आज देश के पीएम और तब के गृह राज्य मंत्री आज देश के गृहमंत्री हैं। 

2014 में सरकार बदलने के बाद ऐसा क्या हुआ कि सब थम गया? क्योंकि मोदी सरकार आतंकवाद के स्वरूप को पहचानती है और उसे खत्म करने का प्लान उसके पास है और सबसे बड़ी बात राजनीतिक इच्छाशक्ति है जो अहमदाबाद में देखने को मिली थी और आज आतंकियों को सजा मिलते वक्त भी दिख रही है।

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