तमिलनाडु की नई सरकार ने धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बने व्यक्ति को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का लाभ देने से जुड़े मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सरकार के इस फैसले के बाद राज्य में आरक्षण और धर्म परिवर्तन को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। विपक्षी दल सरकार पर मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि सरकार का कहना है कि उसका रुख सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के सिद्धांत पर आधारित है।
अब तमिलनाडु की नई सरकार ने इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सरकार के इस कदम के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव से पहले भ्रष्टाचार, नशामुक्ति, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार का वादा करने वाली सरकार अब आरक्षण के इस मुद्दे पर मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति कर रही है।
वहीं, सरकार का पक्ष है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी यदि किसी व्यक्ति का सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन बना रहता है, तो उसे आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। अब इस पूरे मामले पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है, जिस पर तमिलनाडु समेत देशभर की नजरें टिकी हुई हैं।
तमिलनाडु सरकार ने क्या कहा था?
उस समय राज्य में एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली सरकार ने कहा था कि यदि पिछड़ा वर्ग (BC), अति पिछड़ा वर्ग (MBC), विमुक्त समुदाय (DNC) अथवा अनुसूचित जाति (SC) का कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करता है, तो उसे राज्य में अधिसूचित सात मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदायों में से किसी एक का सदस्य मानते हुए समुदाय प्रमाणपत्र दिया जा सकता है। इसके आधार पर वह OBC आरक्षण का लाभ लेने का भी पात्र होगा।
राज्य सरकार ने अपना यह निर्णय तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों के आधार पर लिया था। सरकार का तर्क था कि केवल धर्म परिवर्तन कर लेने से किसी व्यक्ति का सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन समाप्त नहीं हो जाता, इसलिए ऐसे लोगों को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।
मद्रास हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया सरकार का आदेश?
तहसीलदार द्वारा आवेदन खारिज किए जाने के बाद समीर अहमद ने मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के G.O. को रद्द करते हुए कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद किसी व्यक्ति की पहचान मुस्लिम के रूप में होगी, लेकिन उसे स्वतः किसी विशेष मुस्लिम पिछड़ा वर्ग, जैसे ‘लब्बाई’, का सदस्य नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार का आदेश सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों और आरक्षण के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। यह फैसला उस समय आया था जब राज्य में एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली सरकार थी।
क्या है समीर अहमद का मामला?
पूरा मामला समीर अहमद की याचिका से जुड़ा है। समीर का पहले नाम परम शिवम था और उनका जन्म तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले के एक हिंदू परिवार में हुआ था। वर्ष 2015 में उन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने स्वयं को ‘मुस्लिम लब्बाई’ समुदाय का सदस्य बताते हुए समुदाय प्रमाणपत्र जारी करने का आवेदन किया, लेकिन तहसीलदार ने उनका आवेदन खारिज कर दिया।





