संविधान के नाम पर मुस्लिम महिलाओं को क्यों याद आता है इस्लाम?

हैदराबाद: फैशन के लिए बुर्का उतर सकता है तो SIR प्रक्रिया के लिए हिजाब क्यों नहीं?

Summary
वर्ष 2022 में कर्नाटक के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों में निर्धारित ड्रेस कोड के साथ हिजाब पहनने को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हुआ था। मामला कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा, जिसने सरकारी आदेश को सही ठहराया।

हैदराबाद नगर निगम चुनावों को लेकर चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान हिजाब और फोटो को लेकर नया विवाद सामने आया है। जानकारी के अनुसार, मुस्लिम बहुल बूथों पर कई महिलाओं ने चुनाव आयोग के अधिकारियों से आवेदन पत्र पर लगने वाली फोटो को लेकर सवाल पूछे। उनका सवाल था कि हिजाब वाली फोटो मान्य होगी या फिर ऐसा फोटो देना होगा जिसमें कान तक चेहरा दिखाई दे।

चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया कि SIR फॉर्म के लिए किसी भी प्रकार की फोटो स्वीकार की जा सकती है, लेकिन फोटो में आवेदक का चेहरा स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए, ताकि पहचान में कोई परेशानी न हो। आयोग का कहना है कि पहचान सुनिश्चित करना चुनावी प्रक्रिया का अहम हिस्सा है और नियम सभी मतदाताओं पर समान रूप से लागू होते हैं।

सोशल मीडिया पर उठ रहे सवाल

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई है। कुछ लोगों का कहना है कि जब सरकारी पहचान और संवैधानिक प्रक्रिया की बात आती है तो धार्मिक पहचान को आगे रखा जाता है, जबकि सार्वजनिक जीवन में कई मुस्लिम महिलाएं अलग-अलग परिस्थितियों में हिजाब के बिना भी नजर आती रही हैं।

पत्रकार आरफ़ा ख़ानुम शेरवानी, अभिनेता आमिर खान की बेटी आइरा खान और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर उर्फी जावेद के उदाहरण भी सोशल मीडिया पर दिए जा रहे हैं। इन उदाहरणों के आधार पर सवाल उठाया जा रहा है कि सरकारी दस्तावेजों और पहचान संबंधी प्रक्रिया में हिजाब को लेकर अलग रुख क्यों अपनाया जाता है।

कर्नाटक से शुरू हुआ हिजाब विवाद

हिजाब को लेकर यह पहला विवाद नहीं है। वर्ष 2022 में कर्नाटक के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों में निर्धारित ड्रेस कोड के साथ हिजाब पहनने को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हुआ था। मामला कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा, जिसने सरकारी आदेश को सही ठहराया। बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां दो जजों की अलग-अलग राय आने के बाद इसे बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया।

इसके अलावा, विभिन्न चुनावों के दौरान पहचान सत्यापन की प्रक्रिया को लेकर भी समय-समय पर बहस होती रही है। चुनाव आयोग का लगातार यही रुख रहा है कि मतदान और मतदाता सूची से जुड़े मामलों में पहचान स्पष्ट होना आवश्यक है।

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