सतलज और अधूरा सच

Diljit Doshanjh की Film Satluj ने क्या दिखाया और क्या छुपाया?

Summary
फिल्म सतलज पर एक तथ्य-आधारित टिप्पणी, जो पंजाब की इंसर्जेंसी के दौर को एकतरफा नहीं, बल्कि पूरे ऐतिहासिक संदर्भ के साथ देखने की जरूरत पर जोर देती है।

पंजाब में इंसर्जेंसी के दौर में हिंसा कितनी आम थी इसका आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं। इंसर्जेंसी के दौर में जिस तरह से आम लोगों को खाड़कुओं या खालिस्तानी उग्रवादियों के बराबर रखकर उन पर जुल्म ढाये गए, उस इतिहास को कभी न मिटाया जा सका है और न ही मिटाया जाना चाहिए। इसके बारे में अगर कोई बात कर रहा है तो उसे हर अधिकार है कि वो इस कहानी को कहे। उस निर्ममता का किस्सा बताए और पीढ़ियों को दिखाये और समझाये कि ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन एक अहम सवाल ये है कि क्या पंजाब की कहानी सिर्फ़ सिखों के ऊपर हुए अत्याचार तक सीमित है? क्या पंजाब के इस हिंसा के दौर में किसी और तक उसकी आँच नहीं पहुंची? क्या पंजाब पुलिस को सिर्फ़ और सिर्फ़ गुनहगार के ही लेंस से देखा जाना चाहिए? और ये सारे सवाल इस वजह से खड़े हो रहे हैं क्योंकि एक फ़िल्म आई है। फ़िल्म का नाम है सतलज (Satluj)।

दिलजीत दोसांझ (Diljit Dosanjh Satluj controversy), अर्जुन रामपाल और अन्य अभिनेताओं की अभिनीत इस फ़िल्म ने अस्सी के दशक के पंजाब की कहानी को दिखाने का दावा किया है और उस कहानी को कहने का जरिया बनाया है जसवंत सिंह खलारा को, जिसे आजकल के ही कुछ एक्टिविस्ट्स की तरह उस वक्त ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट नाम दिया गया था। ये फ़िल्म जब Zee5 पर रिलीज हुई तो मैंने देखने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई, लेकिन दो ही दिन बाद इसके मेकर्स की तरफ़ से सोशल मीडिया पर ये संदेश प्रसारित किया गया कि ये फ़िल्म अब प्लेटफॉर्म से हटाई जा रही है। तो इसके हटने के बाद मेरे मन में कौतूहल हुआ कि ऐसा क्या है कि रिलीज के दो दिन के भीतर ही फ़िल्म हट गई? कौतूहल को शांत करने के लिए इंटरनेट के किसी अन्य सोर्स से मैंने इस फ़िल्म को डाउनलोड किया और फिर पूरी फ़िल्म को देखा।

(Satluj film review) फ़िल्म को एक आर्ट के नज़र से आप देखेंगे तो आपको ये फ़िल्म एक History cum Biopic Drama लगेगी। क्राफ्ट के लेवल पर ये फ़िल्म कहीं भी ज़्यादा बड़े कमजोर हिस्से नहीं छोड़ती है। अर्जुन रामपाल का नैरेशन हो या दिलजीत दोसांझ के चेहरे का कौतूहल या पंजाब पुलिस के डीजी के रोल में कंवलजीत सिंह का किरदार हो, सभी ने अपना रोल बखूबी निभाया है, लेकिन गड़बड़ ये हुई कि ये सभी किरदार मिलकर जिस कहानी को कह रहे हैं उसकी पूरी कहानी बताई ही नहीं गई।

ये कहानी है एक जसवंत सिंह खालरा खालड़ा के बारे में। जिसने 1984 से 1994 की इंसर्जेंसी के बीच पंजाब में लापता हुए हजारों अज्ञात सिखों और उनके कथित अंतिम संस्कार के मामले की जांच की थी। उनकी इस जांच ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर ला खड़ा किया था। और हुआ यूँ कि इस मुद्दे को उठाने के बाद जसवंत सिंह खुद लापता हो गया। फ़िल्म और इतिहास दोनों के मुताबिक 6 सितंबर 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क में सुबह करीब 9:20 बजे जसवंत सिंह खलरा अपने घर के बाहर अपनी कार धो रहे थे तभी पंजाब पुलिस ने उनका अपहरण कर लिया। इसके बाद वे कभी नहीं दिखे, उनकी लाश तक नहीं मिली।

लेकिन ये कहानी जिस बात को बताना भूल जाती है कि जसवंत सिंह खलरा ने 1992 में “The Game of Elections – Should It Be Played?” शीर्षक से Liberation Khalistan पत्रिका में लेख लिखा था, जिसमें तर्क दिया गया कि भारतीय संविधान के तहत चुनाव लड़ना खालिस्तान आंदोलन को कमजोर करता है, क्योंकि निर्वाचित प्रतिनिधियों को संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती है। उन्होंने सिखों से चुनावी राजनीति से दूर रहकर अलग राष्ट्र की मांग पर टिके रहने का आह्वान किया।

ये सीधे तौर पर उसी खालिस्तानी विचार का समर्थन था। अब सोचकर देखिए कि पंजाब में इंसर्जेंसी और जिस हिंसा के दौर की आलोचना करने की कोशिश ये फ़िल्म करती है उसका जो सबसे बड़ा कारण खालिस्तान और भिंडरावाले का मूवमेंट था उसका समर्थन इस फ़िल्म का कथित नायक कर रहा है।

एक और वीडियो इंटरव्यू है जिसमें सतलज का नायक ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट ख़ुद भिंडरावाले को संत कहकर संबोधित कर रहा है। और कह रहा है कि उसने हमारी क़ौम को जागृत रखने का काम किया है, भिंडरावाले ने जो किया उसने सिखों के हिंदुस्तान से संबंध को पुनः परिभाषित करने का काम किया है।

अब भिंडरावाले ने क्या किया था? भिंडरावाला जिसे यह नायक संत कहने की कोशिश कर रहा है, वो खुले मंचों से सिखों से अपील करता था कि “टीवी और फ्रिज न खरीदें… जब हिंदू आप पर हमला करेंगे, तो क्या आप टीवी के एंटीना से उन्हें मारेंगे?… आपको बंदूकें, सबमशीन गन, बम और ग्रेनेड लेने चाहिए और खून चूसने वालों को मार देना चाहिए.”

यह फ़िल्म एक आर्ट प्रोपगेंडा की खाई में उसी वक्त गिर जाती है जब पंजाब की हिंसा को पुलिसिया अत्याचार तक सीमित करने की कोशिश करती है। मैं यहाँ तक मानता हूँ कि पंजाब पुलिस ने उस वक्त ग़लत कर दिया लेकिन उस कहानी को कौन बताएगा कि 25 अप्रैल 1983 को पंजाब पुलिस के एक अधिकारी डीआईजी अवतार सिंह अटवाल की स्वर्ण मंदिर की सीढ़ियों पर इन्हीं खालिस्तानियों के द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई। खौफ ऐसा था कि उनकी लाश कई घंटों तक परिसर के बाहर सीढ़ियों पर पड़ी रही। किसी ने उसे छूने तक की हिम्मत नहीं की।

इस कहानी को कौन बताएगा कि 6 अक्टूबर 1983 को लालरू बस नरसंहार हुआ था जिसमें 6 हिंदू यात्रियों को गोली मार दी गई। इसके अलावा कपूरथला से होशियारपुर जा रही बस में चार हिंदुओं को मारा गया। धिलवान से जालंधर जा रही बस में छह हिंदुओं को मारा गया। और जानते हैं कैसे मारा जाता था हिंदुओं को? बसों को टारगेट किया जाता, उन्हें रुकवाया जाता। सभी यात्रियों को बाहर निकाला जाता और पहचान पूछकर एक लाइन में खड़े करके हिंदू पहचान होने के आधार पर गली से भून दिया जाता था।

ये कौन बताएगा कि 1 सितंबर 1986 को खालिस्तान कमांडो फोर्स के प्रमुख लभ सिंह ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश आर.पी. गैंड की उनकी पत्नी और बेटी के सामने गोली मारकर हत्या कर दी। ऑपरेशन ब्लू स्टार का नेतृत्व करने वाले पूर्व सेना प्रमुख जनरल अरुण वैद्य की पुणे में मोटरसाइकिल सवार आतंकियों ने गोलियों से हत्या कर दी, और उनकी पत्नी को भी चार गोलियाँ मारी गईं। इसके बाद 27 दिसंबर 1990 को खालिस्तानी आतंकी गुरजंत सिंह बुधसिंहवाला के गिरोह ने पटियाला के डीएसपी सुजीत सिंह की हत्या कर दी। इतना ही नहीं, आतंकियों ने उनकी पत्नी और दोनों सुरक्षाकर्मियों को भी मौत के घाट उतार दिया।

और इस फ़िल्म की जो दूसरी सबसे बड़ी फंडामेंटल प्रॉब्लम है कि वो जिस अत्याचार की कहानी को नैरेट करना चाह रही है उसके chronological order को बिल्कुल address नहीं किया, कैसे ऐसे हो गया कि खड़कू और सिविलियन का अंतर खत्म हुआ? इस कहानी को समझना है तो एक घटना के ज़रिए मैं आपको बताता हूँ कि पंजाब पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर मिथ सिंह पर आरोप था कि उन्होंने खालिस्तानी आतंकी गुरजंत सिंह बुधसिंहवाला के पिता के साथ सार्वजनिक रूप से अपमानित किया।

क्योंकि जिस तरह की इंसर्जेंसी से पंजाब पुलिस उस समय निपट रही थी वो एक प्रकार का गृहयुद्ध था। और पुलिस इस तरह की कार्रवाइयाँ करने के लिए बाध्य होती थी ताकि किसी भी तरह से आतंकी उनके हाथ लग सकें, लेकिन हुआ क्या? हुआ ये कि इस आतंकवादी ने अपने पिता के अपमान का बदला लेने के लिए सितंबर 1987 में बाबर खालसा के आतंकियों ने सब-इंस्पेक्टर मिथ सिंह की हत्या कर दी। और न जाने कितने ऐसे ही पुलिस वाले आतंकवाद से लड़ते हुए टार्गेटेड हो रहे थे और इसने एक ऐसे vicious cycle को जन्म दिया जिसका डॉक्यूमेंटेशन जसवंत सिंह खलरा ने किया।

लेकिन फ़िल्म इस कहानी को आइसोलेट करती है और सब कुछ छोड़कर जसवंत सिंह खलड़ा को बेचारा बनाने पर तुल जाती है।

ये फ़िल्म ये नहीं बताती कि खालिस्तानी आतंकियों ने उस दौर में रामायण देखने को लेकर तालिबानी फरमान जारी किया था कि जो हिंदू अपने घर में रामायण देखता हुआ पाया जाएगा उसके परिणाम बुरे होंगे। हिंदू मंदिरों के बाहर गायों के सर काटकर फेंक दिए जाते थे।

9 सितंबर 1981 को, लाला जगत नारायण अपने ड्राइवर सोम नाथ के साथ एक ग्रे फिएट कार (लाइसेंस प्लेट PUQ 8880) में पटियाला से जालंधर लौट रहे थे। लुधियाना से लगभग 4 किलोमीटर बाहर, अमलतास मोटल के पास गाड़ी पहुँच रही होती है। नछत्तर सिंह और भिंडरनवाले का भतीजा स्वर्ण सिंह रोड़े एक रॉयल एनफील्ड बुलेट मोटरसाइकिल पर लाला की कार को ओवरटेक करते हैं। खतरा भाँपते हुए, ड्राइवर सोम नाथ ने गाड़ी सड़क की बायीं ओर मोड़ दी। सामने से आ रही बस ने उधर से भी रास्ता रोक दिया। हमलावरों ने मोटरसाइकिल से उतरकर कार की ओर गोलीबारी की।

लाला जगत नारायण को तीन गोलियाँ मारी गईं, और वे तुरंत सीट पर गिर पड़े। और कुछ देर में उनकी मौत हो गई। लाला जगत नारायण पंजाब केसरी व हिंद समाचार जैसे समाचार पत्रों के संस्थापक थे। और लगातार वे भिंडरनवाले द्वारा प्रचारित सिख धर्मग्रंथों की गलत व्याख्या की आलोचना करते थे। वे एक आर्य समाजी थे और खालिस्तानी चरमपंथ के आलोचक माने जाते थे। लाला, खालिस्तानी आतंकवाद से पीड़ित हिन्दू परिवारों की मदद भी करते थे। और इस गुनाह के लिए भिंडरनवाले के भतीजे ने उन्हें मार दिया। इस कहानी को कौन बताएगा?

और मैं सारी जिम्मेदारी एक फ़िल्म पर डालने का पक्षधर नहीं हूँ। मेरा विषय ये है कि ये फ़िल्म अगर ढाई घंटे में एक व्यक्ति की कहानी को कह सकती है तो उन पारिस्थितियों को बताने के लिए क्या दस मिनट भी नहीं खर्च कर सकती है? सवाल ये है कि इस फ़िल्म ने जिन चीजों को जनरलाइज़ और रोमेन्टिसाइज़ करने की कोशिश की है उन्हें इस तरह से किए जाने की क्या आवश्यकता थी?

मसलन आप पंजाब के सीएम बेअंत सिंह की हत्या की कहानी को ही देखें। उन्होंने डीजीपी के पी.एस. गिल को खालिस्तानी आतंकियों के खात्मे के लिए फ्रीहैंड दिया। और काफी हद तक के पी.एस. गिल अपने मिशन में सफल रहे।

लेकिन इसकी कीमत बेअंत सिंह को चुकानी पड़ी। खालिस्तानी सिंपथाइज़र और पंजाब पुलिस के ही एक कर्मचारी बलवंत सिंह के द्वारा सुसाइड बॉम्बिंग में उन्हें मार दिया गया। और ये फ़िल्म इस सीन को किस तरह से दिखाती है? एक पाँच रुपये का सिक्का उछला जाता है जिसमें एक तरह भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है तो दूसरी तरफ पाँच की संख्या, इसके पीछे से सिखों के एक धार्मिक गीत बजता है यानी “सूरा सो पहचानिए जो लड़े दीन के हेत, पुरजा-पुरजा कट मरे कबहुं न छांडे़ खेत”। को चलाया गया। एक सीएम की आतंकवादियों द्वारा हत्या की जा रही है और उस आतंकवादी को शूरवीर बताया जा रहा है, वो भी सिखों के एक धार्मिक गीत के साथ में। ये ‘एन आई फॉर एन आई’ के ही लॉजिक का समर्थन है। और इस फ़िल्म के द्वारा तो पूरा लॉजिक ही इस एन आई फॉर एन आई विरोध का था।

इस फ़िल्म को बनाने वालों को ये समझना चाहिए कि जसवंत सिंह खलरा का लापता होना या हत्या होना उतना ही सच है जितना डीआईजी अटवाल की स्वर्ण मंदिर की सीढ़ियों पर हत्या, जितना लाला जगत नारायण की हत्या, जितना जज गैंड की पत्नी-बेटी के सामने गोली मारी जाना, जितना डीएसपी सुजीत सिंह और उनकी पत्नी की हत्या, जितना हिंदू मंदिर के सामने गाय का सर काटकर फेंक देना सच है। अगर आप इस सच को एड्रेस नहीं करेंगे, तो जसवंत सिंह खलरा भी झूठ ही रह जाएगा। सतलज सिर्फ़ जसवंत सिंह खलरा के ख़ून से लाल नहीं हुई होगी, उसमें इन पुलिसवालों और हिंदुओं का ख़ून भी उतना ही बहा था।

फ़िल्में और कला अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा हैं, और किसी पीड़ित की कहानी कहना ग़लत नहीं, बल्कि ज़रूरी है। लेकिन जब वह कहानी बाकी पीड़ितों को अदृश्य बना देती है, जब हत्यारे को शहीद और पीड़ित परिवार को हाशिये पर धकेल दिया जाता है, तब वह कला कम और प्रोपेगेंडा ज़्यादा लगने लगती है। आज जब पंजाब की उस पीड़ा को याद किया जा रहा है, तो ज़रूरी है कि उसे उसकी पूरी जटिलता के साथ उसके हर एक पहलू को याद किया जाए, न कि एक पक्षीय भावुकता के साथ कहानी को आइसोलेट करके पेश किया जाए। क्योंकि जिस दिन भी हम पंजाब की हिंसा के दौर को सिर्फ़ “हीरो बनाम विलेन” के फ्रेम में देखने की कोशिश करेंगे उसी दिन उस पूरे इतिहास के साथ पुनः वही अन्याय कर रहे होंगे जो अन्याय उसके वर्तमान ने किया था।

जसवंत सिंह की कहानी के सिर्फ़ मानवीय पहलू को अगर आप दिखायेंगे तो उसका दूसरा पहलू कोई दिखाएगा। जैसे आज मैं बता रहा हूँ हो सकता है कोई फ़िल्म बनाकर बताए कि जसवंत सिंह ने जितना बताया उससे कहीं ज़्यादा उसने छुपा लिया था। इस फ़िल्म को देखकर पंजाब के हिंसा के दौर से अनजान कोई व्यक्ति अगर उठेगा तो उसे लगेगा कि इसका मतलब है जो हिंसा की बात हम सुनते हैं वो इस पुलिसिया अत्याचार के बदले में हुई होगी। जबकि सच कुछ और था। सच ये था कि ये पूरी हिंसा पाकिस्तान और अलगवावादियों की देन थी जिससे बचने की कोशिश ये देश और इस देश की फौज और पुलिस कर रही थी।

और अगर फिल्ममेकर और पोस्टरबॉय दिलजीत दोसांझ ये कहते हैं कि ये तो सिर्फ़ बायोपिक है तो भाईसाहब जरा इस बात को समझिए कि जब कोई भी फ़िल्म ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर अपना नैरेटिव बनाती है, तब उस इतिहास का आवश्यक संदर्भ देना भी उसकी जिम्मेदारी बन जाती है। और अगर संदर्भ के बिना वो पेश की जाएगी तो उसे प्रोपेगेंडा से अधिक और कुछ नहीं कहा जाएगा।

और आख़िरी बात, इस फ़िल्म को लेकर जो सबसे बड़ा झूठ फ़ैल रहा है कि सरकार ने बैन लगा दिया। दरअसल सच ये है कि 2022 में जब ये फ़िल्म सीबीएफसी के पास रिव्यू के लिए गई थी तो इसमें 120 के आसपास कट लगाने का सुझाव दिया गया था। तब इस फ़िल्म का टाइटल Punjab 95 था और इसे सिनेमाहॉल में रिलीज करने का प्लान था। लेकिन मेकर्स ने कट नहीं लगाया। और अब इन्होंने चुपचाप फ़िल्म का नाम बदला, सतलज रखा और OTT पर रिलीज कर दिया। और चूँकि ये भारतीय सिनेमा के कानूनों के हिसाब से मान्य नहीं थी तो इसे IT रूल्स के तहत हटाने का आदेश बाय-डिफ़ॉल्ट आना ही था। तो इसे ये कहना कि ये सरकार द्वारा बैन कर दिया गया, फिल्म की तरह यह भी प्रोपेगेंडा है।

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