बेंगलुरू की लाइफलाइन आए दिन वेंटिलेटर पर क्यों चली जाती है? कभी पानी भर जाता है, कभी मेट्रो ही जवाब दे देती है।
सरकार समय-समय पर मेट्रो का किराया बढ़ाती रहती है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर लोगों को क्या मिलता है?
यानी भारत की सिलिकॉन वैली में ऑफिस से घर पहुंचने के लिए लोगों को ट्रकों और लॉरियों का सहारा लेना पड़ रहा है।
और यही है कांग्रेस सरकार का कर्नाटक मॉडल, जिसे वह देशभर में लागू करने की बात करती है।
बेंगलुरू जहां दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां हैं, लाखों इंजीनियर हैं, अरबों डॉलर का कारोबार है। लेकिन एक मेट्रो लाइन रुकते ही पूरा शहर रुक जाता है। कल ठीक यही हुआ।
टेक्निकल खराबी की वजह से पर्पल लाइन पर मेट्रो सेवा अचानक ठप पड़ गई। अगर यह घटना दिन के किसी सामान्य समय में होती तो शायद असर सीमित रहता, लेकिन यह पीक ऑवर्स में हुआ, जब हजारों कर्मचारी ऑफिस से निकलकर घर जा रहे थे।
नतीजा? लोग स्टेशन पर एक-एक घंटे तक फंसे रहे। और जब बाहर निकले तो उन्हें न बस मिली, न ऑटो और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था।
यानी अगर मेट्रो बंद हो जाए तो बेंगलुरू के पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम के पास कोई बैकअप प्लान ही नहीं है।
फिर लोगों ने जो किया, वह किसी विकसित शहर की नहीं बल्कि एक बदहाल व्यवस्था की तस्वीर पेश करता है।
कोई ट्रक में चढ़ गया। कोई लॉरी से लिफ्ट लेकर घर गया। और जिसे कुछ नहीं मिला, वह किलोमीटरों पैदल चल पड़ा। घर पहुंचना मानो रोजमर्रा का काम नहीं, बल्कि एक जंग बन गया।
लेकिन सवाल है कि क्या यह पहली बार हुआ है? बिल्कुल नहीं। बेंगलुरू मेट्रो को लेकर शिकायतें वर्षों पुरानी हैं।
ओवरक्राउडिंग, लंबा वेटिंग टाइम, कमजोर कनेक्टिविटी और लगातार बढ़ता दबाव। यात्री रोज शिकायत करते हैं, लेकिन समाधान कहीं दिखाई नहीं देता।
सबसे बड़ी बात यह है कि जब सिस्टम फेल हो जाता है तो सरकार की तरफ से कोई आपात व्यवस्था भी नजर नहीं आती।
कल भी यही हुआ। हजारों लोग फंसे रहे, लेकिन उन्हें घर पहुंचाने के लिए अतिरिक्त बसों, शटल सेवाओं या किसी विशेष व्यवस्था की खबर नहीं मिली।
यही वजह है कि लोग पूछ रहे हैं कि आखिर सरकार की प्राथमिकता क्या है? और हैरानी की बात सिर्फ सरकार नहीं, मीडिया को लेकर भी है।
अगर ऐसी ही घटना दिल्ली, मुंबई या किसी अन्य बड़े शहर में हुई होती तो शायद राष्ट्रीय बहस छिड़ चुकी हो ती। प्राइम टाइम डिबेट होती। संपादकीय लिखे जाते।
लेकिन बेंगलुरू में हुआ है, इसलिए मामला कुछ घंटों की खबर बनकर रह गया। मेरा सवाल उन लोगों से भी है जो भाषा और साइनबोर्ड के मुद्दों पर अक्सर सड़कों पर उतरते हैं।
जब पब्लिक ट्रांसपोर्ट की हालत ऐसी हो कि लोगों को ट्रकों में भरकर घर जाना पड़े, तब सरकार से जवाब मांगने के लिए आंदोलन क्यों नहीं दिखाई देते?
आखिर बेंगलुरू की सबसे बड़ी समस्या भाषा है या फिर बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर? क्योंकि हकीकत यह है कि भारत की सिलिकॉन वैली आज भी अधूरे और देरी से चल रहे प्रोजेक्ट्स की कीमत चुका रही है।
Suburban Rail Project वर्षों से देरी का सामना कर रहा है।… Land acquisition और अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल की सम स्याएं लगातार सामने आती रही हैं। कई परियोजनाओं की रफ्तार उम्मीद से काफी धीमी रही है।
लेकिन इन सवालों को लेकर शायद ही कभी वैसा जनदबाव दिखाई देता है जैसा दूसरे मुद्दों पर दिखाई देता है। और यही वजह है कि बेंगलुरू बार-बार हमें याद दिलाता है, First World Tech Talent. Third World Infrastructure.





