आज से लगभग 15-20 वर्ष पहले मैंने फ़िल्मों में मुंबइया गुंडागर्दी को डिस्क्राइब करने के लिए लफड़ा शब्द सुना था। सामान्यतः दो लोगों या गुटों के विवाद को लफड़ा की संज्ञा दी जाती थी। लेकिन समय बदल गया और लफड़े के स्वरूप भी बदल गए। अब लफड़ा करने के लिए भौतिक उपस्थिति की जरूरत ही नहीं रह गई है। और इस जरूरत को समाप्त करने का श्रेय उत्तराखण्ड एवं हरियाणा के सोशल मीडिया पर मौजूद योद्धाओं को दिया जाना चाहिए।
इंटरनेट के आने के बाद से इंटरनेट की धरती पर भी लफड़े शुरू हो गए हैं, और इनका नाम है ई-लफड़ा। बीते लगभग एक सप्ताह से ट्विटर और फेसबुक पर ऐसा ही एक बवाल चल रहा है हरियाणा और उत्तराखंड के कुछ लोगों के बीच। और इस बवाल में एक-दूसरे की संस्कृति, एक-दूसरे का खाना, आदतें, सब कुछ टारगेट हो रहा है। मैं एक बार को इस विवाद या कथित लफड़े को भी स्वीकार कर लेता हूँ कि एक कारण से हो रहा है।
लेकिन जैसा कि हमारे देश में हर लड़ाई में होता है, कि प्राइम टारगेट के तौर पर एक-दूसरे के समाज की महिलाओं को निशाना बनाया जाने लगता है। अब हो क्या रहा है कि इस विवाद में एक-दूसरे के राज्य की महिलाओं की फोटो डालकर दोनों तरफ़ के सोशल मीडिया वीर बता रहे हैं कि देखो तुम्हारा परचम नीचा है क्योंकि तुम्हारे यहाँ की महिला ने बाहर किसी समाज में शादी कर ली है।
लेकिन थोड़ा क्रोनोलॉजी से चलते हैं! सबसे पहले जानिए लफड़ा शुरू कहाँ से हुआ? तो ये झगड़ा शुरू हुआ 20 मई 2026 को ऋषिकेश में हुई एक घटना के बाद। इस दिन हरियाणा के कैथल से आए कुछ टूरिस्ट्स को ऋषिकेश में एक बच्ची से छेड़छाड़ का आरोप लगाकर पीटा गया, भीड़ ने उनके कपड़े भी उतरवाए और काफ़ी बेइज्जत किया।
इसके बाद सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुई तो धीरे-धीरे माहौल बनना शुरू हुआ। कहानी में मोड़ तब आया जब 22 मई को दावा हुआ कि टूरिस्ट्स ने कोई छेड़छाड़ नहीं की थी और वो सिर्फ़ कुछ बातचीत कर रहे थे। इसके बाद एक-एक करके दोनों तरफ़ के इन्फ्लुएंसर से लेकर आम लोग तक हमलावर हो गए।
हम दोनों का पक्ष एक-एक करके समझेंगे और ये भी जानेंगे कि किसकी तरफ़ से क्या तर्क और क्या कुतर्क दिए जा रहे हैं। पहले बात हरियाणा की। सोशल मीडिया पर ख़ुद को हरियाणवी बताने वाले अकाउंट्स का कहना है कि पहाड़ में उनके प्रति पूर्वाग्रह पैदा हो गया है।
उनका यह दावा भी है कि बिना किसी बात के हरियाणा से उत्तराखंड जाने वाली गाड़ियों को विशेष तौर पर निशाना बनाया जाता है, स्थानीय लोग इकट्ठा होकर उनसे अभद्रता करते हैं। ये भी आरोप लगाया कि उनसे सामान्य सेवाओं के ज़्यादा पैसे वसूले जाते हैं।
लेकिन अगर किसी लड़ाई में इतनी ही बात हो, तो उसे विवाद नहीं संवाद कहा जाएगा। यहाँ पर आता है अगली पार्ट। हरियाणा से जुड़े इन्फ्लुएंसर्स जैसे हर्ष छिकारा और स्वाति वगैरह ने कई ऐसे दावे किए हैं जो सतही हैं और लड़ाई को बढ़ाते हैं। इन इन्फ्लुएंसर्स के साथ ही एक बड़े समूह ने दावा किया कि अगर हरियाणा के टूरिस्ट उत्तराखंड न जाएँ तो यहाँ के लोग भूखे मर जाएँगे, इकॉनमी ख़त्म हो जाएगी और लोग बेरोज़गार हो जाएँगे।
इसके साथ पहाड़ी यानी उत्तराखंड के निवासियों को लेकर और भी कई सारी टिप्पणियाँ की गईं, उत्तराखंड के बॉयकॉट का भी एक अभियान चलाया गया और साथ ही ये भी दावा किया गया कि इस बार हरियाणा के टूरिस्ट्स से अगर किसी ने मारपीट की तो इसका जवाब दिल्ली NCR में रहने वाले पहाड़ियों से लिया जाएगा।
बेसिकली ये खुली धमकी दी गई कि NCR में रहने वालों को पीटा जाएगा या उनके प्रदेश वापस भेजा जाएगा। दिल्ली एयरपोर्ट से वीडियो भी वायरल हुई जिसमें कथित तौर पर उत्तराखंड के एक ड्राइवर को यहाँ सवारियाँ बिठाने से रोका गया। और अंत में इस सबसे ज़्यादा बढ़कर जो हुआ, वो था महिलाओं का अपमान।
उत्तराखंड की महिलाओं को निशाने पर लेकर उन्हें स्पा में काम करने वाली कहा गया, इसके साथ ही कई ऐसी पहाड़ी लड़कियाँ जिन्होंने हरियाणा के लड़कों से विवाह किया है, उनकी तस्वीरें निकाली गईं और उन महिलाओं को ट्रॉफी की तरह पेश किया गया। और ये बहस अभी थमी नहीं है बल्कि लगातार बढ़ रही है।
लेकिन हम किसी निष्कर्ष पर पहुँचें, उससे पहले उत्तराखंड वालों के तर्क भी सुन लीजिए। उत्तराखंड में लंबे समय से यह भावना है कि बाहर से आने वाले टूरिस्ट्स और विशेषकर दिल्ली NCR तथा हरियाणा से आने वाले लोग रैश ड्राइविंग करते हैं। सिर्फ़ रैश ड्राइविंग ही नहीं करते बल्कि स्थानीय लोगों से गुंडई भी करते हैं।
इसके अलावा उनके व्यवहार को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। उत्तराखंड की वकालत करने वालों का कहना है कि हरियाणा या NCR से आने वाले टूरिस्ट सार्वजनिक जगहों पर शराब पीते हैं, झगड़ा करते हैं, महिलाओं से बदतमीज़ी करते हैं और फोटो-वीडियो को लेकर भी बवाल करते हैं।
यही नहीं बल्कि ये भी कहा गया है कि हरियाणा से आने वाले कांवड़ यात्री भी हल्ला-हंगामा करते हैं और सड़कों पर रोड रेज करते हैं। गंगा के तट पर हुक्का पीते हैं, जिससे सांस्कृतिक समस्याएँ भी खड़ी होती हैं।
हरियाणा और NCR से आने वाली गाड़ियों के चलते बढ़ते जाम को लेकर भी कई सारी बातें कही गई हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि यहाँ सारे सही मुद्दे ही उठाए जा रहे हैं।
अति करने वालों की यहाँ भी कमी नहीं है। उत्तराखंड के भी कुछ इन्फ्लुएंसर्स ने “बैन हरियाणा” मुहिम छेड़ रखी है। इस तरफ़ से भी मैंने कुछ ट्वीट्स ऐसे देखे हैं जिनमें हरियाणा के कल्चर को निशाने पर लिया गया। पूरे हरियाणा को ही बदतमीज़ ठहराने का प्रयास किया गया और जिन स्वामी रामदेव की कोई भूमिका पूरे विवाद में नहीं थी, उन्हें भी भगाने की बात कही गई।
और जब हरियाणा का प्रतिनिधित्व करने वाले अकाउंट्स ने पहाड़ की महिलाओं को लेकर उल्टी-सीधी बातें कही थीं तो आख़िर अपने आप को पहाड़ का प्रतिनिधि कहने वाले कैसे पीछे रहते। इस देश में एक राज्य के लोग दूसरे राज्य की हेल्थ केयर, इंडस्ट्री और इन्वेस्टमेंट में बराबरी भले न कर पाएँ, लेकिन महिलाओं का अपमान करने में एकदम पीछे नहीं रहना चाहते। मैंने आपको जो ट्वीट्स दिखाए, वो यही बात इंडिकेट करते हैं।
खैर, मैंने अब आपको जब दोनों पक्ष समझा दिए हैं तो मूल मुद्दे पर आते हैं। सवाल है कि क्या हरियाणा के लोग उत्तराखंड नहीं गए तो वहाँ लोग भूखे मरने लगेंगे? बिल्कुल ऐसा नहीं है। आज से 50-60 साल पहले जब टूरिज्म इतना बढ़ा नहीं था तब भी पहाड़ों में लोग जीवन व्यतीत किया करते थे।
क्या हरियाणा के लोगों के न जाने से उत्तराखंड में अकाल आ जाएगा? ऐसा भी नहीं होगा। लेकिन दूसरा पक्ष भी सुन लीजिए। यहाँ सवाल है कि क्या हरियाणा से जाने वाले सारे कांवड़िये या सारे टूरिस्ट उत्तराखंड या कहीं भी बाहरी राज्य में बदतमीज़ी ही करते हैं? क्या सभी झगड़ा करते हैं?
ऐसा भी बिल्कुल नहीं है। हाँ! ये बात जरूर है कि रील कल्चर और मैचोइज़्म दिखाने के चक्कर में कई बार कुछ युवक अनैतिक काम करते पाए गए हैं। ये भी है कि उनकी रैश ड्राइविंग की शिकायतें आती हैं, लेकिन ये बात यूनिक नहीं है। लेकिन ये भी बात समझना जरूरी है कि सारे लोग सिर्फ़ हरियाणा के ही रहने वाले हैं, ये जरूरी नहीं है। एक लेबल बनाकर पूर्वाग्रह आधारित निर्णय लेकर इंटरनेट और ज़मीन पर इस तरह की हरकत करना कतई उचित नहीं है। हरियाणा से हर साल लाखों लोग उत्तराखंड जाते हैं और शांति से यात्रा पूरी करके आते हैं, वहाँ कोई विवाद नहीं होता। कुछ ऐसे इंसिडेंट्स होते हैं, जो हाइलाइट होते हैं और उन्हें ही सर्वविदित सत्य मान लिया जाता है।
जब ये घटनाएँ रिपीट होती हैं तो एक पूर्वाग्रह बनता है और फिर हमें ऋषिकेश जैसी घटनाएँ देखने को मिलती हैं। ये पूर्वाग्रह न बने, इसके लिए टूरिस्ट्स को भी ये ध्यान रखना चाहिए कि जिस क्षेत्र में वो जा रहे हैं उसकी सेंसिटिविटीज़ क्या हैं? कहाँ तेज म्यूजिक लोग पसंद नहीं करते या कहाँ का समाज कथित तौर पर मेनस्ट्रीम हो चुके शराब या नशे के कल्चर को किस तरह स्वीकार करता है।
लेकिन जो लोग उन टूरिस्ट्स को होस्ट कर रहे हैं, उन्हें भी संयम से काम लेने की जरूरत है। आप जब किसी को होस्ट कर रहे हैं तो हज़ार अच्छाइयों के साथ कुछ बुराइयाँ भी आएँगी, और उनका हल किसी भी सूरत में विवाद से नहीं हो सकता है। और विशेषतः यह समझे जाने की जरूरत है कि यदि विवाद का ये ट्रेंड अनर्गल रूप से बढ़ेगा तो कुछ लोगों की गलती की सज़ा के तौर पर वो आम पहाड़ी, जो दिल्ली NCR में प्रेमपूर्वक दशकों से रहे हैं, वो भी अपने आप को सुरक्षित नहीं महसूस करेंगे। सेम यही हरियाणा या बाहर के लोगों के लिए भी कहा जाएगा कि आपकी जो कुछ अपवाद स्वरूप ग़लतियाँ हैं, वो सामान्य रूप से जाने वाले यात्रियों के प्रति एक नकारात्मक पूर्वाग्रह को जन्म देंगी।
और सबसे महत्वपूर्ण बात कि यदि विवाद अवश्यंभावी है या किसी भी कारण से कोई घटना घटित हो रही है, तो प्रयास इस पर होना चाहिए कि इस लड़ाई-झगड़े में महिलाएँ निशाना न बनें। सड़क के झगड़े में एक-दूसरे की महिलाओं की धज्जियाँ उड़ाना कोई खास समझदारी का काम नहीं है। वक्त-वक्त पर गालियों से लेकर सामाजिक व्यवहार के कई परिदृश्यों में महिलाओं को ग़लत ढंग से सॉफ्ट टारगेट बनाया गया है। किंतु ध्यान रहे, पहले तो ऐसी स्थिति उत्पन्न ही न हो और दूसरी बात कि यदि ऐसी परिस्थिति आती है तो बिलो द बेल्ट जाना आपके किसी भी तर्क या बात को कमजोर ही करता है।
और आख़िरी बात, भारत एक विविधता-प्रधान देश है। यहाँ एक ही राज्य के अंदर बोली, भाषा, संस्कृति, व्यावहारिकता सब बदलता रहता है और ऐतिहासिक रूप से हम इसी तरह से साथ रहते आए हैं। और हरियाणा-उत्तराखंड विवाद कोई नया नहीं है, ये उसी एक लंबी शृंखला का एक और बिंदु है जहाँ क्षेत्रवाद के नाम पर इस तरह के अनैतिक और ग़ैरकानूनी कृत्य किए जाते हैं। हमें समझना होगा कि अपनी संस्कृति पर गर्व करने के साथ दूसरों के रहन-सहन, खान-पान और सामाजिक परिवेश को स्वीकार करना होगा। देश और दुनिया में कई ऐसी शक्तियाँ हैं जो ऐसी ही छोटी-छोटी घटनाओं पर नजर रखकर फॉल्ट लाइंस को ट्रेस करती हैं और मौक़ा पड़ने पर उनका दोहन भी करती हैं। जिसका अंतिम प्रभाव यही होता है कि हम और हमारे लोग ही नुकसान में जाते हैं।





