आपने ‘स्वदेश’ फिल्म तो देखी ही होगी। गया-गुज़रा भारत, समस्याओं से जूझता भारत, जहाँ शौचालय खुले में होता है और लोग हाइजीन की कमी से त्रस्त हैं। एक समय में वाकई देश के हालात कुछ ऐसे ही थे। जब भी हम कूड़ा-कचरा, ग़रीबी और भुखमरी देखते हैं, तो एक बार शाहरुख खान की तरह वैसा ही एक्सप्रेशन हमारे चेहरे पर भी आता होगा।
लेकिन अब मैं आपको लेकर चलती हूँ उस भारत में, जिसने कोविड जैसी वैश्विक महामारी (Pandemic) का आसानी से सामना किया। यह सब मैं आपको जो बताने वाली हूँ, उसे ‘टोपी मीडिया’ दूर-दूर तक नहीं बताने वाली है। गुजरात के बंजर धोलेरा में वह काम हो रहा है जो पूरे विश्व के लिए एक मोटिवेशन बनेगा, और हो सकता है कि सऊदी अरब के ‘नियोम प्रोजेक्ट’ (Neom Project) को भी इससे कोई सीख मिले।
बंजर ज़मीन पर अनोखा प्रयोग
धोलेरा में बंजर और सूखी पड़ी ज़मीन पर एक एक्सपेरिमेंट हुआ है, जो पूरी तरह सफल भी हो चुका है। आप भी सोच रहे होंगे कि ऐसी सूखी ज़मीन पर पेड़ कैसे उगाए गए? आप इस तस्वीर को देखिए, जहाँ एक तरफ सूखा मैदान है, तो दूसरी तरफ ‘ड्रम प्लांटेशन तकनीक’ (Drum Plantation Technique) की मदद से उगाए गए 3,200 से ज़्यादा पेड़ हैं। इस एक्सपेरिमेंट की शुरुआत अगस्त 2025 में हुई थी और अब यहाँ 50,000 नए पौधे लगाने की तैयारी चल रही है।
‘Drum Plantation Technique’ पेड़ लगाने का एक आधुनिक और अनोखा तरीक़ा है। इसमें प्लास्टिक के बड़े ड्रम्स का इस्तेमाल किया जाता है। इन ड्रम्स के दोनों तरफ छेद किए जाते हैं ताकि पौधों को हवा मिल सके। इसके बाद इन ड्रम्स को करीब एक फीट तक ज़मीन में गाड़ दिया जाता है और फिर ड्रम के अंदर पौधा लगाया जाता है।
कैसे काम करती है यह तकनीक?
इस तकनीक में पौधों को सीधे खारी मिट्टी में नहीं लगाया जाता। ड्रम के अंदर खास तरह की परतें बनाई जाती हैं, जिसमें रेत, उपजाऊ मिट्टी और केंचुआ खाद डाली जाती है। साथ ही इसमें पराली और कोकोपीट (नारियल का बूरा) भी मिलाया जाता है। यह मिश्रण पौधों को ज़रूरी पोषक तत्व (Nutrients) प्रदान करता है।
धोलेरा की ज़मीन में नमक की मात्रा बहुत ज़्यादा है। यहाँ साल के छह महीने तक खारा पानी भरा रहता है। ऐसी स्थिति में यह ड्रम तकनीक पौधों की नाज़ुक जड़ों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। प्लास्टिक का ड्रम बाहर के खारे पानी और नमक को जड़ों तक नहीं पहुँचने देता। पौधों को जीवित रखने के लिए ड्रिप सिस्टम (Drip System) से अलग से मीठा पानी दिया जाता है, जिससे पौधे खारेपन से पूरी तरह बचे रहते हैं।
बंजर इलाक़े में लौट रही हरियाली
‘Drum Plantation Technique’ का असर जादुई तरीक़े से दिख रहा है। आप इन तस्वीरों से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि एक साल से भी कम समय में पौधे 12 फीट तक ऊँचे हो गए हैं। यहाँ नीम, पीपल, बरगद और इमली के साथ-साथ पेड़ों की 15 प्रजातियाँ लहलहा रही हैं।
सोचिए, जिस रेगिस्तान में सिर्फ नागफनी ही उगती थी, वहाँ आज आपको वे पेड़ दिख रहे हैं जिनकी छाँव शहरों में लोगों को राहत देती है। जिनकी शाखाओं पर बने बसेरों से चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई पड़ती है। कई पेड़ों में तो फल भी आने लगे हैं। जिस ज़मीन पर पहले घास भी नहीं उगती थी, वहाँ अब हरियाली छा गई है। इस बदलाव को देखकर इलाक़े में पक्षी और तितलियाँ भी लौटने लगे हैं।
वैश्विक परियोजनाओं के लिए प्रेरणा
इस शानदार प्रोजेक्ट को वन मंत्रालय (Forest Ministry) और धोलेरा अथॉरिटी (DSIRDA) ने मिलकर चलाया है। इस सफलता से उत्साहित होकर सरकार ने 20 हेक्टेयर ज़मीन और आवंटित कर दी है। अगले चरण में इसी ड्रम तकनीक से 50,000 और पौधे लगाए जाएँगे। जब ये पेड़ बड़े और मज़बूत हो जाएँगे, तब इन प्लास्टिक के ड्रमों को निकालकर रीसायकल (Recycle) कर दिया जाएगा।
यानी कुछ महीनों पहले जो ड्रम ग़लत कारणों से चर्चा में था, आज उसका इस्तेमाल पर्यावरण बचाने और सूखे रेगिस्तानों में हरियाली लाने के लिए हो रहा है। सबसे अच्छी बात यह है कि यह सब एकदम किफ़ायती ढंग से किया जा रहा है।
मैंने शुरुआत में कहा था कि यह सऊदी अरब के लिए एक सीख होगी। जहाँ रेगिस्तान में एक सीधी लाइन में बनाया जा रहा नियोम सिटी आज फ़ंडिंग, Engineering और बाक़ी समस्याओं से जूझ रहा है, वहीं धोलेरा एक मिसाल बनकर खड़ा हो गया है और यहाँ रेगिस्तान को आबाद किया जा रहा है।
काम का स्केल अलग ज़रूर हो सकता है, लेकिन भारत में हुआ यह इनोवेशन चाहे सऊदी अरब हो या गल्फ के दूसरे देश, उनके लिए एक प्रेरणा बनेगा। यह कम लागत में पर्यावरण बचाने का एक बेहतरीन ज़रिया साबित होगा, क्योंकि अभी तक पर्यावरण बचाने के उपायों को बहुत महंगा माना जाता रहा है। इस ड्रम तकनीक ने एक नया रास्ता दिखाया है, जिससे अब पीली रेत के मरुस्थलों में भी हरियाली छाएगी।



