“आजादी की लड़ाई में कालापानी की सजा भुगतने वालों में एक भी गुजराती नहीं था” यह बयान है TMC सांसद महुआ मोइत्रा का।
एक ऐसा बयान जो न केवल भारत के Federal Structure पर हमला करता है, बल्कि ‘ऐतिहासिक साक्ष्यों’ का गला भी घोंटता है। ब्रूट के PR से ख़ुद को वाम-लिब्रल्स की ध्वज वाहक मानने वाली कुत्ता चोर और पैसा लेकर सवाल पूछने वाली महुआ जी, संसद के माइक पर चीखने से इतिहास नहीं बदल जाता ..
लेकिन महुआ जिस ‘बंगाली प्राइड’ की ढाल लेकर यह राजनीति कर रही हैं, क्या उन्हें पता है कि जिन क्रांतिकारियों का वो नाम ले रही हैं, उनकी Ideological Roots कम से कम महुआ की TMC से तो नहीं जुड़ी हैं.. ये तो जुड़ी हैं ‘हिंदुत्व’ से आज के इस वीडियो में हम इतिहास की उन फाइलों को खोलेंगे जिन तक महुआ मोइत्रा का IQ कभी पहुँच नहीं पाया है।
हम जानेंगे कि कैसे महुआ के बयान ने गुजरात के आदिवासियों से लेकर बाक़ी तमाम नायकों को एक ही बार में अपमानित करने की कोशिश की है, जो कालापानी भी गए, जिन्होंने 1857 की क्रांति में भी हिस्सा लिया और जिन्होंने अंग्रेज़ों को भी उनकी हैसियत दिखा दी थी… ये भी हम याद दिलाएंगे कि कैसे अनुशीलन समिति के क्रांतिकारी गीता पर हाथ रखकर कसम खाते थे, और कैसे ममता बनर्जी और उनकी ही महुआ की आज की पॉलिटिक्स उन क्रांतिकारियों के उसूलों के ठीक विपरीत खड़ी है।
महुआ मोइत्रा ने बड़े विश्वास के साथ कह दिया कि Savarkar के अलावा कोई गुजराती काला पानी नहीं गया। ये उन तमाम गुजराती योद्धाओं के बलिदान का अपमान है जिन्हें अंग्रेजों ने Andaman की काली कोठरियों में सड़ने के लिए छोड़ दिया था। बंगाल की जिस विरासत की महुआ बात करती हैं, वो कभी ‘हिंदुत्व’ और ‘शक्ति’ की उपासक थी, लेकिन आज आपकी राजनीति सिर्फ इस्लामी तुष्टीकरण और ऐतिहासिक झूठ पर टिकी है।
अब जरा ये नाम सुनिए और रिकॉर्ड्स पलटकर देखिए:
गरबड़दास पटेल: वो मुखिया जिसने अंग्रेजों को धूल चटाई
गुजरात में आणंद के रहने वाले गरबड़दास पटेल। 1857 में जब इन्होंने British Camp पर धावा बोला, तो अंग्रेज़ों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी। अंग्रेजों ने इन्हें पकड़कर काला पानी फेंक दिया और इसी अंडमान की जेल में तड़प-तड़प कर इनकी जान गई। महुआ जी, क्या ये रिकॉर्ड्स आपकी फाइलों में नहीं हैं?
दूसरा नाम आता है रूपा और केवलनायक का जो भील आदिवासी थे और लोग इनसे ख़ौफ़ खाते थे। पंचमहल के इन भील नायकों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। जब ये पकड़ में आए, तो ब्रिटिश हुकूमत ने इन्हें और इनके साथियों को सीधे अंडमान का टिकट थमा दिया। तो शायद महुआ इनको भी भूल गई या ये आदिवासी वीर क्या महुआ के लिए क्रांतिकारी नहीं हैं?
तीसरे हैं द्वारका के बागी कहे जाने वाले ओखामंडल के वाघेर:
जोधा माणेक और मूलू माणेक के नेतृत्व में वाघेर समुदाय ने अंग्रेजों के खिलाफ खूनी जंग लड़ी थी। इस विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और जीत के बाद कई वाघेर योद्धाओं को जंजीरों में जकड़कर काला पानी के नर्क में भेज दिया। तो महुआ जी- क्या ये नाम आपके ‘बंगाली चश्मे’ से दिखाई नहीं देते? खैर!
चौथे हैं फौज के वो बागी सिपाही जिन्होंने ब्रिटिश सेना के अंदर रहकर बगावत करने का नाम सेलुलर जेल के रिकॉर्ड्स में दर्ज है।नाम था सरदार सिंह आर्टिलरी…ये वो गुजराती जांबाज थे जिन्होंने सिस्टम के अंदर रहकर सिस्टम को चुनौती दी थी।
तो महुआ जी, अपनी ये सिलेक्टिव मेमरी दुरुस्त कर लीजिए। गुजरात ने सिर्फ 20वीं सदी में चरखा ही नहीं चलाया, बल्कि 19वीं सदी में अंग्रेजों के खिलाफ गोलियां भी चलाई हैं और काला पानी की यातनाएं भी झेली हैं। ध्रुव राठी के जैसे FACTS वाली नौटंकी बंद करिए, क्योंकि अंडमान की मिट्टी आज भी उन गुजराती वीरों के खून की गवाही दे रही है जिन्हें आपने एक झटके में इतिहास से मिटाने की कोशिश की है।
अब ये तो गुजरात के वो नाम थे जिन्हें महुआ ने एक ही बार में नकार दिया.. लेकिन बंगाल के नायकों के नाम भी अगर देखें तो उनकी ideology के core में क्या नजर आता है वो भी detail में देख लेते हैं.
बंगाल का ‘क्रांतिकारी राष्ट्रवाद’ और ‘धर्म’
देखिए, हमें स्कूल में पढ़ाया गया कि क्रांतिकारी केवल ‘देशभक्त’ थे। लेकिन वे देशभक्त क्यों थे? उनका मोटिवेशन क्या था?
अगर आप 1905 के बाद की ‘अनुशीलन समिति’ या युगांतर को देखें, तो वहां राष्ट्रवाद और ‘शाक्त परंपरा’ यानी ‘Shaktism’ को अलग करना नामुमकिन है। अरबिंदो घोष ने अपनी किताब ‘भवानी मंदिर’ में साफ़ साफ़ लिखा था कि भारत माता केवल एक जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवंत देवी हैं। अरबिंदो ने अपनी किताब में मातृभूमि को ‘आद्या शक्ति’ या ‘काली’ के रूप में चित्रित किया। क्रांतिकारियों के लिए स्वतंत्रता एक ‘यज्ञ’ था.. आज की TMC जिस ‘जय श्री राम’ से चिढ़ती है, उसी के मूल में ये क्रांतिकारी हुआ करते थे।उन क्रांतिकारियों की ताक़त यही आध्यात्मिक शक्ति थी… जिसका महुआ मोइत्रा टाइम टाइम पर मजाक बनाती रही है..
डेटा देखिए, उस समय क्रांतिकारियों को भर्ती करने के लिए ‘भगवद्गीता’ पर हाथ रखवाकर शपथ दिलाई जाती थी। दुर्गा पूजा के पंडालों का इस्तेमाल गुप्त बैठकों के लिए होता था। महुआ जिसे आज ‘कम्युनल’ कहेंगी, उन्ही ‘हिंदू प्रतीकों’ ने बंगाल को क्रांतिकारियों की फैक्ट्री बनाया था।
RSS के founder डॉ. हेडगेवार खुद कोलकाता जाकर इन्हीं बंगाली क्रांतिकारियों से राष्ट्रवाद के बेसिक्स सीखकर आए थे। क्या ये हास्यास्पद नहीं है कि जिस विरासत पर महुआ आज Bengali Pride कह कर मार्केटिंग करती हैं, उसका DNA आज के हिंदुत्व से मिलता है ना कि TMC से?
गुजरात का ‘साइलेंट’ योगदान और काला पानी
महुआ की मूर्खता को फिर देखिए, उसका कहना है कि ‘गुजरात का योगदान ही जीरो रहा है आजादी की लड़ाई में’। इतिहास केवल पिस्तौल चलाने से नहीं, बल्कि उस पिस्तौल के लिए फंड और ट्रेनिंग जुटाने से भी बनता है। श्यामजी कृष्ण वर्मा कच्छ, गुजरात से थे, उन्होंने लंदन में ‘इंडिया हाउस’ बनाया। और अगर ये इंडिया हाउस न होता, तो सावरकर जैसे क्रांतिकारी भी तैयार न होते।
पेरिस में बैठे सरदारसिंहजी राणा, गुजरात के काठियावाड़ से थे… उन्होंने ही बंगाली क्रांतिकारी हेमचंद्र कानूनगो को रूसी क्रांतिकारियों से मिलवाकर बम बनाने की ट्रेनिंग दिलवाई थी। यानी बंगाल का बम, गुजरात की strategic help से ही बना था। सेलुलर जेल या काला पानी के रिकॉर्ड्स के अनुसार, वहां 68% बंगाली थे। लेकिन सावरकर और उनके भाई, जो मराठी-गुजराती संस्कृति के सेतु थे, उन्हें अंग्रेजों ने ‘सबसे खतरनाक’ की कैटेगरी में रखा था। ये सब महुआ नहीं बताएँगी क्यूंकि उनकी आँखों में TMC का नीला पत्ता बाँधा है, इसलिए महुआ को कम्युनिटी और अपने बँटवारे की पॉलिटिक्स से ‘नफरत’ फैलाने का टूल बनाना बंद कर देना चाहिए.
गांधी, राम और ममता की राजनीति
अब एक और कड़वा सच सुनिए। महुआ की पार्टी अक्सर महात्मा गांधी का नाम लेती है। लेकिन क्या महुआ जी और ममता बनर्जी, गांधी के उस ‘राम’ को स्वीकार करेंगी? क्यूंकि गांधी जी भी सनातनी हिंदू थे। उनकी हर सुबह ‘राम धुन’ से शुरू होती थी। जिस ‘जय श्री राम’ के नारे से आज बंगाल सरकार को चिढ़ होती है, जिस राम नाम को बोलने पर बंगाल में जेल हो जाती हैं, गांधी जी ने उसी राम नाम को अपना अंतिम शब्द बनाया।
सोचिए, अगर आज गांधी जी बंगाल की सड़कों पर हाथ में माला लेकर ‘राम नाम’ जपते हुए निकलें, तो क्या ममता बनर्जी की पुलिस उन्हें भी उसी तरह टॉर्चर करती जैसे उन्होंने पिछले कुछ सालों में कई राम-भक्तों के साथ किया है? क्या आज के बंगाल में गांधी जी का ‘हे राम’ कहना भी कम्युनल नहीं मान लिया जाता? यह विरोधाभास समझना जरूरी है। आप और आपकी अन्य नेता साथी- क्रांतिकारियों की विरासत तो चाहती हैं, लेकिन जैसी आपकी हरकतें हैं वो तो साफ़ दिखाता है की आपको उनके ‘धर्म’ और ‘संस्कृति’ से आपको नफरत है।
भारत का इतिहास किसी एक राज्य की बाप की जागीर नहीं है। बंगाल ने ख़ून दिया, तो गुजरात ने विजन। और दोनों ने ही स्वतंत्रता को अपनी विचारधारा मानकर ये काम किया.. लेकिन आज TMC की राजनीति इस बलिदान को बांटकर अपनी रोटियां सेक रही है। महुआ मोइत्रा का बयान ऐतिहासिक रूप से गलत तो है ही, नैतिक रूप से भी गिरा हुआ और घटिया है।




