एक जिज्ञासा, एक खोज की तड़प और सच तक पहुँचने की इच्छा हर पत्रकार में होनी चाहिए। कुछ दिन पहले मैं जंतर-मंतर पर हुए एक चर्चित विरोध प्रदर्शन में शामिल हुई। वहाँ मौजूद अधिकांश लोगों को यह नहीं पता था कि मैं वहाँ एक पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रयोग (social experiment) का हिस्सा बनकर पहुँची थी।
प्रदर्शन को कवर करने के लिए कई मीडिया संस्थान मौजूद थे। इसी दौरान मेरी मुलाकात तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार आरफ़ा ख़ानुम शेरवानी से भी हुई और बाद में उन्होंने अपने वीडियो में मुझे भी शामिल कर लिया।
लेकिन इस पूरी कहानी का दिलचस्प हिस्सा यह नहीं है।
असल सवाल यह है कि क्या आज का तथाकथित वैकल्पिक मीडिया किसी भी भीड़ को बिना जाँच-पड़ताल के अपने पूर्व निर्धारित नैरेटिव में फिट कर देता है?
मेरा प्रयोग क्या था?
मैं इस प्रदर्शन में एक आम प्रतिभागी की तरह शामिल हुई। मैंने भीड़ के साथ नारे लगाए, तालियाँ बजाईं, लोगों से बातचीत की और पूरे कार्यक्रम को भीतर से समझने की कोशिश की।
मेरा उद्देश्य किसी का समर्थन या विरोध करना नहीं था। मैं केवल यह जानना चाहती थी कि:
- क्या यह आंदोलन वास्तव में पेपर लीक जैसे मुद्दों पर केंद्रित है?
- क्या आयोजकों की प्राथमिकता छात्रों की समस्याएँ हैं?
- क्या मीडिया वहाँ मौजूद लोगों और उनके वास्तविक उद्देश्यों को समझने की कोशिश कर रहा है?
- और सबसे महत्वपूर्ण, क्या पत्रकार वास्तविक और प्रतीकात्मक प्रदर्शनकारियों के बीच अंतर कर पा रहे हैं?
जो मैंने देखा, उसने कई सवाल खड़े कर दिए।
मुद्दा पेपर लीक था या कुछ और?
तीन दिनों के दौरान मैंने देखा कि जिस आंदोलन को छात्रों के मुद्दों के नाम पर प्रस्तुत किया जा रहा था, वहाँ चर्चा बार-बार कुछ चुनिंदा राजनीतिक और वैचारिक विषयों की ओर मोड़ दी जा रही थी। पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं और युवाओं के भविष्य से जुड़े प्रश्नों की जगह बार-बार वही पुराने राजनीतिक नैरेटिव सामने आ रहे थे। यही वह बिंदु था जिसने मेरे प्रयोग को और महत्वपूर्ण बना दिया।
पत्रकारिता की सबसे बड़ी परीक्षा
पत्रकारिता का पहला सिद्धांत है, संदेह करना। यदि कोई व्यक्ति भीड़ में मौजूद है तो क्या वह वास्तव में उसी विचारधारा का समर्थक है जिसका दावा किया जा रहा है? क्या पत्रकार ने उसकी पहचान, मंशा और संदर्भ को समझने की कोशिश की?
मेरे मामले में ऐसा नहीं हुआ।
मैं स्वयं एक प्रयोग के तहत वहाँ मौजूद थी, लेकिन मुझे बिना किसी गंभीर जाँच के एक राजनीतिक खांचे में फिट कर दिया गया।
यहीं से यह सवाल पैदा होता है कि यदि एक पत्रकार अपने सामने मौजूद व्यक्ति की वास्तविकता तक नहीं पहुँच पा रहा, तो वह बड़े सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर कितनी विश्वसनीय रिपोर्टिंग कर रहा है?
नैरेटिव बनाम तथ्य
यह कोई रहस्य नहीं है कि भारत में कुछ पत्रकार और एक्टिविस्ट वर्षों से कुछ विशेष राजनीतिक मामलों और चेहरों को लेकर लगातार सक्रिय रहे हैं। समस्या किसी व्यक्ति का समर्थन या विरोध नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब पत्रकारिता तथ्य खोजने के बजाय पहले से तय निष्कर्षों को साबित करने का माध्यम बन जाए। जब भीड़ में मौजूद हर व्यक्ति को एक ही चश्मे से देखा जाता है, तब पत्रकारिता नहीं, बल्कि एक्टिविज़्म शुरू हो जाता है।
मेरा निष्कर्ष
इस पूरे प्रयोग ने मुझे एक बात स्पष्ट रूप से समझा दी। आज सोशल मीडिया और वैकल्पिक मीडिया के दौर में केवल जनता ही नहीं, पत्रकार भी परखे जा रहे हैं। जो लोग वर्षों से दूसरों की जाँच करते आए हैं, अब उनकी अपनी कार्यप्रणाली भी जनता के सामने सवालों के घेरे में है।
जंतर-मंतर का यह प्रयोग किसी एक व्यक्ति के बारे में नहीं था। यह इस बात की परीक्षा थी कि क्या आज का मीडिया अभी भी जिज्ञासा, तथ्य-जांच और निष्पक्षता जैसे मूल पत्रकारिता सिद्धांतों पर खरा उतर रहा है। कम-से-कम मेरे अनुभव ने इस प्रश्न को और गंभीर बना दिया है। और शायद अब कुछ लोगों को भीड़ में अपना नैरेटिव बेचने से पहले दो बार सोचना पड़ेगा, क्योंकि उन्हें यह नहीं पता होगा कि उस भीड़ में कोई ऐसा व्यक्ति भी मौजूद हो सकता है जो उनके दावों की वास्तविकता को परख रहा हो।





