क्या भारत की सौर ऊर्जा नीति वास्तव में विफल हो गई है?

Summary
आज भारत में 33 लाख से अधिक घरों पर रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाए जा चुके हैं। इसके अलावा, एक करोड़ से अधिक परिवार पीएम सूर्य घर योजना के लिए पंजीकरण करा चुके हैं।

जिस भारत को संयुक्त राष्ट्र (UN) ने “Solar Superpower” कहा है, उसी भारत की सौर ऊर्जा यात्रा को The Wire ने अपने एक लेख में लगभग असफल बताया है। लेख का दावा है कि भारत सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अपेक्षित प्रगति नहीं कर पाया और सरकार की नीतियों ने इस सेक्टर को नुकसान पहुँचाया। लेकिन क्या वास्तव में तस्वीर इतनी नकारात्मक है? यदि उपलब्ध आँकड़ों, नीतिगत उद्देश्यों और दीर्घकालिक रणनीति को साथ रखकर देखा जाए, तो स्थिति कहीं अधिक संतुलित दिखाई देती है।

लेख का पहला प्रमुख तर्क Approved List of Models and Manufacturers (ALMM) और आयात शुल्क (Import Duties) को लेकर है। इसमें कहा गया है कि इन नीतियों के कारण सोलर पैनल महंगे हो गए और परियोजनाओं की लागत बढ़ गई। यह बात पूरी तरह गलत नहीं है। घरेलू स्तर पर निर्मित सोलर मॉड्यूल की कीमतों में शुरुआती बढ़ोतरी देखी गई है। लेकिन केवल इसी तथ्य के आधार पर पूरी नीति को असफल घोषित करना उचित नहीं होगा। यदि भारत लगातार सस्ते चीनी सोलर पैनलों पर निर्भर रहता, तो घरेलू विनिर्माण उद्योग के विकसित होने की संभावना बेहद सीमित रहती। यही कारण है कि आज अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देश भी चीनी सोलर आयात पर टैरिफ और अन्य प्रतिबंध लगा रहे हैं। इसके पीछे केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे रणनीतिक कारण भी हैं।

लेख यह भी उल्लेख करता है कि भारत आज भी चीन से सोलर सेल आयात करता है। यह तथ्य सही है, लेकिन इसे संदर्भ से अलग करके देखना उचित नहीं होगा। किसी भी देश में आत्मनिर्भरता एक दिन में हासिल नहीं होती। सौर उद्योग का विकास चरणबद्ध तरीके से होता है। पहले सोलर मॉड्यूल का निर्माण शुरू होता है, फिर सोलर सेल, उसके बाद वेफर और अंत में पॉलीसिलिकॉन जैसी महत्वपूर्ण सामग्री का उत्पादन विकसित किया जाता है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने Production Linked Incentive (PLI) योजना और ALMM जैसी नीतियाँ लागू की हैं, ताकि देश धीरे-धीरे पूरी सोलर सप्लाई चेन में आत्मनिर्भर बन सके।

कीमतों में बढ़ोतरी की चर्चा करते समय एक महत्वपूर्ण तथ्य अक्सर अनदेखा रह जाता है कि इसी अवधि में भारत की घरेलू सोलर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। वर्ष 2020-21 तक भारत की सोलर मॉड्यूल निर्माण क्षमता 10 गीगावॉट से भी कम थी। आज यह बढ़कर लगभग 60 गीगावॉट तक पहुँच चुकी है। यह केवल उत्पादन क्षमता का विस्तार नहीं है, बल्कि भारत के भीतर एक मजबूत विनिर्माण इकोसिस्टम विकसित होने का संकेत भी है। इसी वजह से भारत अब दुनिया के सबसे बड़े सौर ऊर्जा बाजारों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा चुका है।

यदि स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता की बात करें, तो भारत ने मार्च 2026 तक लगभग 150 गीगावॉट सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित कर ली है। वर्ष 2014 में यह क्षमता केवल लगभग 3 गीगावॉट थी। यानी एक दशक से कुछ अधिक समय में भारत ने अपनी सौर क्षमता में लगभग 50 गुना वृद्धि दर्ज की है। यह उपलब्धि दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते नवीकरणीय ऊर्जा कार्यक्रमों में से एक मानी जाती है और यह दर्शाती है कि भारत ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।

रूफटॉप सोलर के क्षेत्र में भी भारत ने महत्वपूर्ण विस्तार किया है। आज देश में 33 लाख से अधिक घरों पर रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाए जा चुके हैं। इसके अलावा एक करोड़ से अधिक परिवार पीएम सूर्य घर योजना के लिए पंजीकरण करा चुके हैं। देश में 12 गीगावॉट से अधिक रूफटॉप सोलर क्षमता भी जोड़ी जा चुकी है। ये आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि सौर ऊर्जा अब केवल बड़े औद्योगिक या सरकारी प्रोजेक्ट्स तक सीमित नहीं रही, बल्कि आम नागरिकों के घरों तक भी पहुँच रही है।

यह भी सच है कि भारत के सौर ऊर्जा क्षेत्र में अभी कई चुनौतियाँ मौजूद हैं। डिस्कॉम सुधारों की आवश्यकता बनी हुई है। कुछ परियोजनाओं में देरी हुई है और कई क्षेत्रों में नीति क्रियान्वयन को और बेहतर बनाने की आवश्यकता है। इन समस्याओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन केवल इन्हीं चुनौतियों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल देना कि भारत की पूरी सौर ऊर्जा नीति विफल हो गई है, उपलब्ध तथ्यों के साथ न्याय नहीं करता।

भारत ने अल्पकाल में कुछ अतिरिक्त लागत अवश्य उठाई है, लेकिन उसका उद्देश्य दीर्घकाल में चीन पर निर्भरता कम करना, घरेलू विनिर्माण को मजबूत बनाना और देश की ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना है। किसी भी औद्योगिक नीति का मूल्यांकन केवल तत्काल लागत के आधार पर नहीं किया जा सकता। उसके दीर्घकालिक रणनीतिक परिणाम, औद्योगिक क्षमता निर्माण और राष्ट्रीय हित भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए भारत की सौर ऊर्जा नीति का आकलन करते समय केवल वर्तमान चुनौतियों पर नहीं, बल्कि उसके व्यापक और दीर्घकालिक प्रभावों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

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