तमिलनाडु में हाल ही में 27 वर्षीय दलित आईटी इंजीनियर काविन सेल्वगणेश की ऑनर किलिंग की घटना सामने आई, लेकिन इस खबर ने राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी बहस नहीं छेड़ी। इसका कारण यह था कि हत्या किसी “ऊँची जाति” ने नहीं, बल्कि पिछड़ी जाति के लोगों ने की थी।
प्रश्न यह नहीं है कि अपराध किसने किया, बल्कि यह समझना ज़रूरी है कि जब तमिलनाडु में दलितों के खिलाफ अधिकांश हिंसा गैर-ब्राह्मण जातियों द्वारा होती है, तब भी दोष हमेशा “ब्राह्मणवाद” पर ही क्यों मढ़ा जाता है?
इस प्रश्न का उत्तर तमिलनाडु के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में मौजूद है। तमिलनाडु को अक्सर भारत का ‘सोशल जस्टिस लैब’ कहा जाता है, क्योंकि पेरियार, अन्नादुरै और करुणानिधि जैसे नेताओं ने यहां एक ऐसे आंदोलन की शुरुआत की थी, जिसका घोषित उद्देश्य ब्राह्मण वर्चस्व को समाप्त करना और एक समानतामूलक समाज का निर्माण करना था। लेकिन यह आंदोलन समय के साथ जाति-उन्मूलन से हटकर ब्राह्मण-विरोध, फिर हिंदू परंपराओं के विरोध और अंततः धार्मिक दुराग्रह में बदल गया।
इस पूरे दौर में मूर्तिपूजा और रामायण का मज़ाक उड़ाया गया, भगवान राम के प्रति अपमानजनक बातें कही गईं और एक सुधारवादी आंदोलन नकारात्मक पहचान की राजनीति में बदलता चला गया।
1960 के दशक के बाद तमिलनाडु में ब्राह्मणों का राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव लगभग समाप्त हो गया। आज तमिलनाडु में ब्राह्मण राजनीति में न के बराबर हैं, नौकरशाही और शिक्षा प्रणाली में उनका प्रभाव नगण्य है, और वे न्यायपालिका से भी लगभग गायब हैं।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इससे सामाजिक न्याय स्थापित हुआ? दुर्भाग्य से इसका उत्तर ‘नहीं’ है। दलितों पर हिंसा आज भी उतनी ही है, बल्कि कई मामलों में और अधिक। जिन जातियों ने खुद को ‘शोषित’ बताया था, वही आज ‘उग्र जाति’ बन चुकी हैं — जैसे वन्नियार, थेवर और गोंडर। दलितों पर होने वाले अधिकतर सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक अत्याचार इन्हीं जातियों द्वारा किए जाते हैं।
तमिलनाडु के प्रमुख ऑनर किलिंग मामलों में भी — चाहे 2013 का इलवरासन–दिव्या केस हो, 2016 में शंकर की सरेआम हत्या, 2019 का प्रिया–कनगराज मामला या 2024 में अलगेंद्रन की निर्मम हत्या — इनमें से किसी भी घटना में अपराधी ब्राह्मण नहीं थे। कई बार तो दलित बनाम दलित हिंसा भी सामने आती है। फिर भी राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में आरोप वही — ब्राह्मणवाद।
दलित अधिकार कार्यकर्ता ए. कथिर के अनुसार, तमिलनाडु में SC/ST पर होने वाले 90% अपराध गैर-ब्राह्मण जातियों द्वारा किए जाते हैं। फिर भी यह नैरेटिव क्यों बनता है कि हर समस्या की जड़ ब्राह्मणवाद है?
इसका कारण यह है कि ब्राह्मण तमिलनाडु में 2% से भी कम हैं। वे न आंदोलन करते हैं, न हिंसक विरोध, और न राजनीतिक शक्ति रखते हैं। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए वे एक ‘सुरक्षित दुश्मन’ बन गए हैं। राजनीति को हमेशा एक खलनायक की आवश्यकता होती है, और तमिलनाडु में यह भूमिका ब्राह्मणों पर थोप दी गई है — चाहे वास्तविक अपराधी कोई भी क्यों न हों।
वास्तविक समस्या जाति नहीं, बल्कि वह सामंती मानसिकता है, जो हर समाज में किसी न किसी रूप में मौजूद रहती है। आज दलितों को प्रताड़ित करने वाली जातियाँ स्वयं गैर-ब्राह्मण हैं, ऑनर किलिंग करने वाले परिवार अधिकतर OBC या DNC समुदायों से आते हैं, और राजनीतिक संरक्षक भी इन्हीं ‘उग्र जातियों’ को मिलता है।
इसी तरह की स्थिति बिहार, यूपी और महाराष्ट्र में भी दिखाई देती है, जहाँ भोजपुरिया पॉप संस्कृति में जातीय श्रेष्ठता का महिमामंडन किया जाता है, और कई बार यह हिंसा में भी बदल जाता है। महाराष्ट्र में ’फुले-शाहू-आंबेडकर’ के नाम पर राजनीति चलती है लेकिन दलित हिंसा के बड़े मामले, जैसे खैरलांजी, ब्राह्मणों ने नहीं किए थे। इसके बावजूद एंटी-ब्राह्मण संगठनों को राजनीतिक संरक्षण मिलता रहता है। यह साफ है कि ब्राह्मणवाद एक राजनीतिक कथा है, सामाजिक यथार्थ नहीं।
अंततः सवाल ब्राह्मण बनाम गैर-ब्राह्मण का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम सच में जातिवाद समाप्त करना चाहते हैं, या फिर सिर्फ एक काल्पनिक दुश्मन बनाकर वास्तविक सामाजिक अपराधियों को बचाना चाहते हैं?
तमिलनाडु का अनुभव बताता है कि सामाजिक न्याय का आंदोलन ब्राह्मण-विरोध तक सीमित रह गया है, जबकि दलित सुरक्षा, सामाजिक समरसता और न्याय — आज भी अधूरे हैं। ‘उग्र जातियाँ’ स्वयं वर्चस्ववादी बन चुकी हैं और हिंसा का बड़ा हिस्सा उन्हीं से आता है। इसके बावजूद राजनीतिक नैरेटिव अभी भी ब्राह्मणों को ही दोषी ठहराता है।
यह स्थिति बताती है कि जब सामाजिक न्याय राजनीति का औजार बन जाता है, तब न्याय नहीं — एक नया वर्चस्व पैदा होता है, और पुराने अन्याय नए चेहरे के साथ जारी रहते हैं।





