pakistan being a mediator

सोवियत जासूसी से ‘प्रोजेक्ट जिहाद’ तक: अमेरिका को चूना लगाकर पाकिस्तान ने कैसे कमाए अरबों डॉलर

Summary
पाकिस्तान को ईरान-अमेरिका बातचीत होस्ट करने के बदले सऊदी और कतर से 5 बिलियन डॉलर की मदद मिल रही है। यह पाकिस्तान के पुराने ‘कमीशनखोरी’ के इतिहास का सबसे नया हिस्सा है, जिसने 1950 के दशक से लेकर अब तक अमेरिका और अन्य देशों के बीच दलाली करके अरबों डॉलर वसूले हैं।

आप कभी किसी तहसील या कोर्ट गए हैं? कोर्ट नहीं तो आरटीओ (RTO) के दफ़्तर ज़रूर गए होंगे। वहाँ आपको एक प्रजाति मिलती है, इसको हमारे यहाँ ‘दलाल’ कहते हैं। खैर! ये दलाल कमीशनखोरी के मास्टर होते हैं। लाइसेंस जल्दी बनवाना हो, अच्छे वकील से मिलना हो या पेशकार से फाइल निकलवानी हो, ये दलाल इसके एवज़ में कमीशन खाते हैं।

और दलाल सिर्फ़ आपसे यानी क्लाइंट से ही नहीं, बल्कि जिस वकील को केस दिलवाते हैं, उससे भी कमीशन खाते हैं। लेकिन क्या दलाल का केस पर कोई ज़ोर होता है? जवाब है नहीं। वह बस अपना फ़ायदा निकालता है और चलता बनता है। अब इस कहानी को कोर्ट-कचहरी और दफ़्तरों से निकाल कर जियोपॉलिटिक्स (Geopolitics) में ले जाइए।

यहाँ भी आपको एक कमीशनखोर एजेंट मिलेगा, जिसका इतिहास दो देशों के बीच दलाली करके कमीशन खाना ही रहा है और आज भी उसका प्राइम धंधा यही है। जी! आप सही समझ रहे हैं, मैं पाकिस्तान की ही बात कर रहा हूँ। ताज़ा ख़बर है कि पाकिस्तान को 5 बिलियन डॉलर की मदद सऊदी अरब और कतर मिलकर देने वाले हैं।

5 बिलियन डॉलर मतलब भारतीय रुपयों में लगभग ₹50 हज़ार करोड़ रुपए। यह पैसा उसे ‘इस्लामाबाद पीस टॉक्स’ (Islamabad Peace Talks) यानी ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत होस्ट करने के दौरान ही मिलने वाला है। इस पैसे से पाकिस्तान की इकॉनमी एक बार फिर डिफ़ॉल्ट करने से बच जाएगी और वह यूएई (UAE) को अपना बकाया भी चुका सकेगा।

लेकिन यह सिर्फ़ एक स्टैंडअलोन इवेंट नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की कमीशनखोरी के इतिहास में सबसे नया डेवलपमेंट है। असल में तो जब से यह मुल्क बना है, तब से इसका मॉडल ही कमीशनखोरी रहा है। कैसे? यह मैं आपको 1950 से लेकर अब तक के इवेंट्स और उसमें पाकिस्तान ने कितना कमीशन खाया, इससे समझाऊँगा।

1950 का दशक: अमेरिका की गोद में पाकिस्तान

सबसे पहले हम शुरू करेंगे 1950 के दशक से, जब दुनिया दो धड़ों में बंट गई। एक धड़ा यूएसएसआर (USSR) यानी सोवियत रूस का और दूसरा धड़ा अमेरिका का। अब भारत ने तो गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) की नीति अपनाई, लेकिन 1950s के अंत तक वह कुछ-कुछ USSR की तरफ़ झुक गया। अब इसके क्या कारण थे, इस पर कभी और बात करेंगे।

जब पाकिस्तान ने यह देखा तो उसे लगा कि यही वह मौक़ा है जब अमेरिका की गोद में बैठकर कमीशन खाया जा सकता है। कम्युनिज्म का प्रसार रोकने, USSR को वार्म वाटर्स (Warm Waters) का एक्सेस न होने देने और इससे भी ज़्यादा सोवियत जासूसी के लिए एक बेस के तौर पर पाकिस्तान ने सबसे पहले कमीशन खाना शुरू किया।

मैं आपको यह बताऊँ कि कमीशन के एवज़ में पाकिस्तान ने क्या किया, उससे पहले यह जानिए कि उसने कितना कमीशन खाया। एक अमेरिकी थिक टैंक ‘सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोग्रेस’ (Center for American Progress – CAP) की एक रिपोर्ट कहती है कि पाकिस्तान को अमेरिका ने 1954 से 1964 के बीच लगभग 3.2 बिलियन डॉलर, यानी आज के रुपयों में ₹28,000 करोड़ से ज़्यादा की मदद दी।

इसमें 2.5 बिलियन तो आर्थिक सहायता थी—यानी फ़ूड एड, इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए पैसा और बाक़ी डेवलपमेंटल प्रोग्राम, जबकि 700 मिलियन डॉलर से अधिक मिलिट्री एड (Military Aid) थी। इस मिलिट्री एड में सैकड़ों टैंक, हज़ारों राइफलें और दर्जनों की संख्या में फाइटर प्लेन्स शामिल थे। अब आते हैं कि कमीशन के एवज़ में पाकिस्तान ने क्या किया?

पेशावर बेस और सोवियत जासूसी

पाकिस्तान ने इस बीच 1955 में सेंटो (CENTO) जॉइन कर लिया था। CENTO बेसिकली नाटो (NATO) का ही एक सस्ता एशियन वर्जन कहा जा सकता है। यह अमेरिका का सोवियत रूस को एशिया में रोकने के लिए बनाया गया एक ऑर्गेनाइजेशन था, जिसमें उस समय ईरान और तुर्की जैसे देश भी शामिल थे।

लेकिन पाकिस्तान ने सिर्फ़ इतना ही नहीं किया। उसने इस पैसे के एवज़ में अपनी ज़मीन को USSR के ख़िलाफ़ इस्तेमाल होने के लिए दे दिया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है पेशावर का बड़ाबेर बेस। अमेरिका ने इसे 1950s में सोवियत और चीन के ख़िलाफ़ जासूसी के लिए तैयार किया था।

यहाँ अमेरिका के टोही विमान यू-2 (U-2) डिप्लॉयड थे और ये यहीं से उड़ान भरकर USSR यानी रूस, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान—जो तब USSR का हिस्सा थे—उसकी तस्वीरें निकालते थे। यहाँ रूस कहाँ नया बेस बना रहा है, कहाँ नई मिसाइलें तैनात की जा रही हैं, कहाँ नई न्यूक्लियर फैसिलिटी बन रही हैं, सब कुछ पता लगाया जाता था।

इन फैक्ट, 1 मई 1960 के दिन जिस U-2 विमान को USSR ने गिराया था और उसके अमेरिकी पायलट गैरी पावर्स को पकड़ लिया था, उसने भी पेशावर से ही उड़ान भरी थी। बेसिकली पाकिस्तान ने USSR के ख़िलाफ़ अमेरिका से कमीशन खाया और अपनी ज़मीन व संसाधन दे दिए।

और उसने तब सिर्फ़ इतना ही नहीं किया, बल्कि एक वफ़ादार दलाल की तरह उसने अपने घर में यानी स्थानीय राजनीति में भी कम्युनिस्टों को खदेड़ दिया। 1954 में पाकिस्तान के शासकों ने वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी, उसके स्टूडेंट यूनियन और ट्रेड यूनियन पर बैन लगा दिया और कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया सज्जाद जहीर को क़ैद कर लिया। इसके कुछ दिनों के बाद उन्हें भारत भेज दिया गया।

मुझे कम्युनिस्टों से कोई भी सिम्पथी नहीं है, लेकिन मैंने आपको ये दोनों उदाहरण इसलिए बताए ताकि आप जानें कि पाकिस्तान कमीशनखोरी में कितना प्रोफेशनल है। इन फैक्ट, आज उसके चीन के साथ बड़े अच्छे ताल्लुकात हैं, लेकिन मज़े की बात यह है कि तब अमेरिका USSR के साथ ही चीन की भी जासूसी इसी पाकिस्तान में बैठकर कर रहा था। चीन के मिसाइल और न्यूक्लियर प्रोग्राम के लिए सारी जानकारी जुटा रहा था। रेडियो सिग्नल्स से लेकर सैटेलाइट इमेजरी का जितना इस्तेमाल USSR के ख़िलाफ़ हो रहा था, उतना ही चीन के ख़िलाफ़ भी हो रहा था।

1965 में जब पाकिस्तान, भारत से हार गया तो अमेरिका ने कुछ समय के लिए उससे आँखें फेर लीं। लेकिन यह सिलसिला बंद नहीं हुआ। अमेरिका ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान का समर्थन किया, उसके लिए सातवां जहाज़ी बेड़ा भेजा। लेकिन पाकिस्तान तो कमीशनखोर देश है, और इसके लिए उसे हर बार एक नया क्लाइंट चाहिए होता है।

चीन-अमेरिका दोस्ती का ‘आइस ब्रेकर’

पाकिस्तान को कमीशनखोरी का दूसरा मौक़ा काफ़ी जल्द मिला। दरअसल, 1970 आते-आते अमेरिका को लग गया था कि उसे अगर USSR को नियंत्रित करना है, तो एशिया के भीतर एक बराबर की बड़ी ताक़त खड़ी करनी पड़ेगी। अब यह ताक़त भारत तो हो नहीं सकता था, क्योंकि इस समय तक USSR और भारत के रिश्ते काफ़ी अच्छे हो चुके थे।

बाक़ी के देश छोटे थे और USSR के सामने उनकी कोई बिसात नहीं थी। केवल चीन ही ऐसा देश था जो अमेरिका के काम आ सकता था, लेकिन चीन भी कम्युनिस्ट था। हालाँकि, अमेरिका के लिए अच्छी बात यह थी कि तब तक माओ का कम्युनिज्म और स्टालिन का कम्युनिज्म अलग-अलग रास्ते अख्तियार कर चुके थे। बेसिकली दोनों अलग-अलग कैम्प बन चुके थे।

इसी का अमेरिका ने फ़ायदा उठाने की सोची। लेकिन सवाल था कि जो अमेरिका अब तक चीन को देश का दर्जा देने तक में आनाकानी कर रहा था, वह भला उससे दोस्ती कैसे करे? क्योंकि अमेरिका का तो बीजिंग में राजदूत तक नहीं था, उसे अमेरिका ने 1949 में ही वापस बुला लिया था।

अब यहाँ एक आइस ब्रेकर (Ice Breaker) की ज़रूरत थी। और आइस ब्रेकर कौन बना? यह आइस ब्रेकर बना पाकिस्तान। अपनी शटल डिप्लोमेसी के लिए जाने जाने वाले अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने जब चीन को साधने का सीक्रेट प्लान बनाया, तो इसमें पाकिस्तान ने फिर से एक कमीशनखोर दलाल की भूमिका निभाई।

1970 में पाकिस्तानी तानाशाह जनरल याह्या ख़ान को इसके लिए इस्तेमाल किया गया। जब राष्ट्रपति निक्सन और याह्या की एक मीटिंग अक्टूबर 1970 में हुई, तो निक्सन ने याह्या से अपना संदेश चीनी प्रीमियर झाऊ एनलाई को देने की बात कही। इस प्रस्ताव में राजदूत वापस भेजने और रिश्ते शुरू करने को लेकर चीज़ें थीं।

अप्रैल 1971 में किसिंजर को झाऊ एनलाई से वापस जवाब मिला, यह जवाब पाकिस्तानी राजदूत लाया था। इस जवाब में झाऊ एनलाई ने लिखा था कि किसिंजर जैसे किसी आदमी को पीकिंग (जिसे अब बीजिंग कहते हैं) में रिसीव करने में कोई समस्या नहीं होगी।

इसके बाद कुछ और बातचीत और तैयारी पाकिस्तान के रास्ते चीन और अमेरिका ने की, जिसके बाद डिप्लोमेसी की दुनिया की एक बड़ी रोचक कहानी सामने आई। जुलाई 1971 में किसिंजर पाकिस्तान की एक यात्रा पर आए, इसे एकदम रूटीन विज़िट दिखाया गया। फिर कहा गया कि वह पहाड़ों की तरफ़ जा रहे हैं। इसके बाद ख़बर आई कि किसिंजर बीमार हो गए हैं और वह पाकिस्तान में एक दिन और रुकेंगे।

असल में न किसिंजर पहाड़ों की तरफ़ गए और न ही वह बीमार हुए। उन्होंने इस्लामाबाद आने के बाद ‘पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस’ (PIA) के एक विमान से बीजिंग के लिए उड़ान भर ली थी। यह पूरी तरह से सीक्रेट तरीक़े से किया गया था। इसके कुछ दिनों बाद अमेरिका ने इस विज़िट को पब्लिक भी कर दिया और चीन-अमेरिका संबंध इसी दिन से सुधरना शुरू हो गए।

इस पूरी क़वायद का फैसिलिटेटर बना पाकिस्तान। लेकिन याद रखिए, यहाँ पाकिस्तान सिर्फ़ और सिर्फ़ एजेंट का काम कर रहा था, न उसका अमेरिकी नीतियों पर कोई ज़ोर था और न ही चीन की नीतियों पर। पाकिस्तान को इस काम का भी कमीशन मिला। CAP की ही रिपोर्ट बताती है कि 1972 से लेकर 1979 तक अमेरिका ने पाकिस्तान को 1.1 बिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता दी। कुछ मिलिट्री एड भी दिया गया। यानी हर एक दौर में पाकिस्तान ने कमीशन खाने का जुगाड़ निकाल ही लिया।

अफ़ग़ानिस्तान संकट और ‘प्रोजेक्ट जिहाद’

लेकिन उसके लिए बंपर कमाई का मौक़ा आया 1979 में, जब सोवियत फ़ौजों ने अफ़ग़ानिस्तान में साम्यवादी सत्ता को बचाने के इरादे से डेरा डाल दिया। अमेरिका इस कार्रवाई से आतंकित हो गया और उसने तुरंत इसे रोकने के लिए जुगत लगानी चालू कर दी। हालाँकि, अमेरिका इस दौरान अपनी फ़ौज नहीं भेज सकता था, क्योंकि उसके वियतनाम के घाव अभी भरे नहीं थे।

ऐसे में फिर से कमीशनखोर एजेंट पाकिस्तान काम आया। पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान के एंटी-कम्युनिस्ट फोर्सेस को यूनाइट करना शुरू किया। ये बेसिकली वो लोग थे जो अफ़ग़ानिस्तान में नास्तिक कम्युनिस्टों को सत्ता में नहीं देखना चाहते थे। इनमें से कुछ कबीलाई सरदार थे तो कुछ इस्लाम के लिए लड़ने वाले मुजाहिद। इन अफ़ग़ान कम्युनिस्टों और सोवियत फ़ौजों के लिए दोनों ही दुश्मन थे। बस अमेरिका को अपना साथी मिल चुका था।

लेकिन फिर से एक समस्या थी। अब ये मुजाहिद्दीन तो नॉन-स्टेट एक्टर्स थे और अफ़ग़ानिस्तान में इनके पास मदद पहुँचाना टेढ़ा काम था। कमीशनखोर एजेंट पाकिस्तान तुरंत आगे आया और अमेरिका के लिए ‘प्रोजेक्ट जिहाद’ शुरू कर दिया। अमेरिका की स्टिंगर मिसाइल हो या सोवियत के बने ही हथियार, सब कुछ कहीं न कहीं से पाकिस्तान के रास्ते मुजाहिदों को मिलने लगा। अफ़ग़ान बॉर्डर पर कैंप बन गए, मदरसा इंडस्ट्री खुल गई और समी-उल-हक जैसे लोग उभरने लगे।

अब जब तक सोवियतों ने 1989 में अफ़ग़ानिस्तान नहीं छोड़ा, तब तक पाकिस्तान की बल्ले-बल्ले रही। CAP की रिपोर्ट कहती है कि 1980 से लेकर 1990 तक अमेरिका ने पाकिस्तान को लगभग 5 बिलियन डॉलर से ज़्यादा की मदद दी। इसमें 3 बिलियन के आसपास इकोनॉमिक एड और 2 बिलियन से ज़्यादा मिलिट्री एड थी। और पाकिस्तान को जो डायरेक्ट पैसा मिला, वह तो मिला ही, बल्कि उसने मुजाहिदों के लिए जो हथियार और पैसा आ रहा था, उसमें भी खूब घपले-घोटाले किए। यानी कमीशनखोर एजेंट पाकिस्तान एक बार फिर कमीशनबाज़ी करने में कामयाब रहा और एक दशक तक उसकी इकॉनमी इसी भरोसे चलती रही।

9/11 और ‘वॉर ऑन टेरर’ का कमीशन

1990 के बाद जब सोवियत टूट गया और पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम की भनक अमेरिका को लगी, तो पाकिस्तान के बुरे दिन आ गए। हालांकि उसने सद्दाम के ख़िलाफ़ सऊदी और अमेरिका का साथ दिया, लेकिन यहाँ से जो कमीशन आया वह उतना मलाईदार नहीं था।

लेकिन ‘सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें आगे क्या होता है’ की तर्ज पर कमीशनबाज़ी ज़्यादा दिन रुकी नहीं। अमेरिका की कारगुज़ारियों ने जो मुजाहिद पैदा किए थे, वे अब वापस अमेरिका को ही हिट कर रहे थे। साल 2001 में जब 9/11 का हमला हुआ, तो अमेरिका को याद आया कि उसने एक मॉन्स्टर खड़ा कर दिया है। जब अपने हज़ारों लोग मरे, तो अमेरिका को याद आया कि आतंकवाद एक समस्या है और उसे ख़त्म किया जाना चाहिए। 20 साल पहले जिन मुजाहिदों को अमेरिका राष्ट्रपति भवन में भगवान का दूत बता रहा था, अब उनके ख़िलाफ़ लड़ने के लिए उसने कमर कस ली।

और साफ़ ऐलान किया कि अगर आप इस लड़ाई में हमारे साथ नहीं हो, तो इसका मतलब है कि हमारे ख़िलाफ़ हो! पाकिस्तान इस समय कारगिल के झटके से निकला ही था और उसकी इकॉनमी फिर एक बार गोते खा रही थी। अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान में स्ट्राइक्स करने के लिए फिर ज़मीन की ज़रूरत थी। बस फिर क्या हुआ? क्लाइंट भी रेडी था, एजेंट भी रेडी था! एजेंट ने तुरंत दौड़कर क्लाइंट को पकड़ा।

मुशर्रफ़ ने हमले के सप्ताह भर बाद ही अमेरिका की ‘वॉर ऑन टेरर’ (War on Terror) में हिस्सा लेने को हामी भर दी। इसके बाद एक-एक करके हज़ारों अमेरिकी फ़ौजी पाकिस्तान के रास्ते अफ़ग़ानिस्तान जाने लगे। रसद से भरे कंटेनर कराची के बंदरगाह पर उतरते और यहाँ से उनको अफ़ग़ानिस्तान ले जाया जाता। इस पूरी क़वायद में पाकिस्तान ने जमकर फ़ायदा उठाया। 2001 से लेकर 2021 तक, जब तक अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से बाहर नहीं निकला, तब तक पाकिस्तान अलग-अलग तरीक़े से पैसा चूसता रहा।

अमेरिकी कांग्रेस (संसद) का डेटा कहता है कि पाकिस्तान को अमेरिका ने 2002 से 2016 तक लगभग 19 बिलियन डॉलर की मदद दी। इसमें 11 बिलियन डॉलर इकोनॉमिक एड और 8 बिलियन डॉलर मिलिट्री एड थी। इसी दौरान पाकिस्तान को अमेरिका ने 14 बिलियन डॉलर से ज़्यादा का वेपन रीइमबर्समेंट (Weapon Reimbursement) भी दिया।

2016 में जब ट्रम्प सत्ता में आए तो यह आँकड़ा घटा। लेकिन अपने 70 साल के इतिहास में पाकिस्तान इस कमीशनखोरी के धंधे में इतना पारंगत हो चुका है कि उसकी इकॉनमी ही इस पर बेस्ड है। अलग-अलग सोर्सेज अलग-अलग आंकड़े देते हैं, लेकिन पाकिस्तान संभवतः अपने इतिहास में सीधे तौर पर अमेरिका से 70-80 बिलियन डॉलर वसूल चुका होगा।

और इस कमीशनखोरी में मैंने आपको सिर्फ़ अमेरिका से वसूला कमीशन ही बताया है। सऊदी अरब, यूएई (UAE), कतर वग़ैरह से पाकिस्तान ने जो कमीशन वसूला है, उसका तो मैंने ज़िक्र ही नहीं किया है। और सबसे रीसेंट वही 5 बिलियन डॉलर हैं, जो उसने सऊदी और कतर से लिए हैं।

मध्यस्थ या सिर्फ़ एक दलाल?

अब सबसे आख़िरी और ज़रूरी बात। मैंने आख़िर पाकिस्तान को कमीशन एजेंट क्यों कहा है, उसे ब्रोकर या मध्यस्थ का दर्जा क्यों नहीं दिया? इसका कारण है हार्ड पॉवर (Hard Power) या इन्फ्लुएंस (Influence)। देखिए, मध्यस्थ वह हो सकता है जिसकी बात दोनों पक्ष मानें, और न मानें तो उसकी औक़ात बात मनवाने की हो। वे सिर्फ़ दो लोगों को सामने बिठाकर बात करवाना न जानते हों, बल्कि उस बातचीत को मोड़ देना भी जानते हों।

जैसे हालिया अब्राहम अकॉर्ड्स (Abraham Accords) ले लीजिए। अमेरिका ने UAE और इज़राइल के बीच समझौता करवाया, दोनों देश दोस्त बन गए। लेकिन पाकिस्तान की तरह उसने इनसे कोई कमीशन नहीं खाया। हाँ! अमेरिका का इस दोस्ती से फ़ायदा ज़रूर है, लेकिन वह पाकिस्तान नहीं है। पाकिस्तान का हर कदम कमीशन खाने के लिए ही होता है।

और सबसे ताज़ा मामले में भी इस बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला। ईरान और अमेरिका फिर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ बांहें चढ़ाकर खड़े हैं। फिर से हॉर्मुज़ की खाड़ी बंद हो रही है और फिर से तेल के भाव भागने लगे हैं। इसलिए ही वह मध्यस्थ नहीं बल्कि दलाल है, वह ब्रोकर नहीं बल्कि कमीशनखोर है, वह कोई शांतिदूत नहीं बल्कि मौक़ापरस्त है।

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