गौतम अडानी पर सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने और निवेशकों के साथ धोखाधड़ी करने का जो मामला अमेरिका की फेडरल कोर्ट में चल रहा था, उसने अब एक नया मोड़ ले लिया है। 2024 में जब यह केस फाइल हुआ था, तब राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सीधे अडानी की गिरफ्तारी की मांग कर दी थी। कांग्रेस नेताओं, एक्टिविस्टों और कई मीडिया आउटलेट्स ने मिलकर ऐसा माहौल बना दिया था जैसे किसी अदालत ने उन्हें पहले ही दोषी मान लिया हो।
अब आप सोचेंगे कि अडानी भारतीय हैं, उनकी कंपनी भारतीय है और कथित तौर पर रिश्वत भी भारत में दी गई थी, तो फिर केस अमेरिकी अदालत में क्यों? यही तो उस ‘इंटरनेशनल इकोसिस्टम’ का जादू है। लेकिन अब जो खबर अमेरिका से आई है, उसने उन सभी लोगों की बोलती बंद कर दी है जो इस पर शोर मचा रहे थे।
अमेरिकी न्याय विभाग (US Department of Justice – DOJ) ने अब खुद जज से आधिकारिक तौर पर मांग की है कि अडानी पर लगे सभी आरोपों को स्थायी रूप से हटा दिया जाए। DOJ ने खुले तौर पर स्वीकार किया है कि यह केस कभी लाया ही नहीं जाना चाहिए था। उन्होंने इसे सिर्फ एक ‘नेम एंड शेम’ केस बताया है, जिसका ट्रायल में जाने का कोई वास्तविक चांस ही नहीं था। यानी यह कोई गंभीर जांच नहीं, बल्कि सिर्फ बदनाम करने का एक एजेंडा था।
सवाल यह है कि इस राजनीतिक ड्रामे की कीमत किसने चुकाई? जब इन नेताओं ने किसी विदेशी एजेंसी के आरोपों को बिना किसी अदालती फैसले के हवा दी, तो अडानी ग्रुप की मार्केट वैल्यू कुछ ही दिनों में 55 बिलियन डॉलर गिर गई। इस क्रैश का सबसे बड़ा नुकसान किसी नेता को नहीं, बल्कि उन आम रिटेल निवेशकों और म्यूचुअल फंड वालों को हुआ, जिनकी खून-पसीने की कमाई इसमें डूब गई।
अमेरिका का तो समझ आता है कि वे बढ़ते हुए भारत को नहीं देख सकते, लेकिन भारत में इस मामले को कांग्रेस नेताओं ने हवा दी। यह वही कांग्रेस इकोसिस्टम है, जिसने कभी भारत की 3% जीडीपी वाली धीमी वृद्धि को ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ नाम से बदनाम किया था। इनके डीएनए में भारत के खिलाफ नफरत आज भी उतनी ही है।
अमेरिकी न्याय विभाग का ताजा बयान साबित करता है कि भारत को बदनाम करने के लिए ये लोग किसी के भी साथ खड़े होने को तैयार हैं और विदेशी ताकतों को अपना आधार बनाने में इन्हें जरा भी संकोच नहीं होता।






