UP नौकरियां

69,000 शिक्षक भर्ती विवाद: जानिए क्या है आरक्षण और मेरिट का वो टकराव जिसने बढ़ाया अभ्यर्थियों का ग़ुस्सा

Summary
उत्तर प्रदेश की 69,000 शिक्षक भर्ती का मामला एक बार फिर गरमा गया है। आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के प्रदर्शन के बीच जानिए क्या है आरक्षण और मेरिट का असल विवाद, इसकी पूरी टाइमलाइन और इस पर सरकार व विपक्ष का राजनीतिक पक्ष।

उत्तर प्रदेश की 69,000 शिक्षक भर्ती का मुद्दा पिछले कई सालों से एक बड़ी कानूनी और राजनीतिक कहानी बन चुका है। एक बार फिर यह मामला सुर्खियों में है, क्योंकि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने लखनऊ में बड़े प्रदर्शन का ऐलान किया है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आख़िर असल विवाद क्या है?

असल में, यह पूरा मामला आरक्षण (Reservation) और मेरिट (Merit) के टकराव से जुड़ा है। आरोप है कि ओबीसी (OBC) और एससी (SC) वर्ग को तय प्रतिशत के अनुसार सीटें नहीं मिलीं, और ‘ओवरलैपिंग’ की वजह से आरक्षित वर्ग के मेधावी उम्मीदवारों को नुक़सान उठाना पड़ा। नाराज़ छात्रों का मानना है कि OBC को जहाँ 27% आरक्षण मिलना चाहिए था, वहाँ सिर्फ करीब 3.86% दिया गया, और SC को 21% के बजाय लगभग 16.2% सीटें ही मिलीं।

क्या है इस भर्ती की टाइमलाइन?

इस पूरे विवाद को समझने के लिए इसकी टाइमलाइन पर नज़र डालना ज़रूरी है:

  • 5 दिसंबर 2018: शिक्षक भर्ती का आधिकारिक विज्ञापन जारी हुआ।
  • 6 जनवरी 2019: लिखित परीक्षा आयोजित की गई, जिसमें करीब 4 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए।
  • 12 मई 2020: परीक्षा का परिणाम घोषित किया गया।

परिणाम आने के बाद अभ्यर्थी गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए हाई कोर्ट पहुँच गए, और बाद में पिछड़ा वर्ग आयोग ने भी इन विसंगतियों की पुष्टि की। विवाद को बढ़ता देख साल 2022 में सरकार ने 6,800 अभ्यर्थियों की एक अतिरिक्त सूची (Additional List) जारी की, लेकिन साल 2023 में हाई कोर्ट ने इस सूची को रद्द करते हुए नए सिरे से मेरिट लिस्ट बनाने का आदेश दे दिया।

इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) पहुँचा, जिसने हाई कोर्ट के उस आदेश पर स्टे (Stay) लगा दिया। यानी यह मामला अभी भी शीर्ष अदालत में है और अंतिम फ़ैसला आना बाक़ी है। यही वजह है कि अभ्यर्थियों का सब्र टूट रहा है और उनका ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा है। स्थिति यह है कि कुछ अभ्यर्थी 600 दिनों से भी ज़्यादा समय से धरने पर बैठे हुए हैं।

सरकार का पक्ष और पारदर्शी नीतियां

इस पूरे मामले पर अगर सरकार का पक्ष देखें, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले भी अभ्यर्थियों से मुलाक़ात की है और अधिकारियों को ‘त्वरित और निष्पक्ष समाधान’ निकालने के कड़े निर्देश दिए हैं। सरकार का साफ़ कहना है कि किसी भी अभ्यर्थी के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा और आरक्षण का लाभ हर पात्र उम्मीदवार को मिलना चाहिए।

योगी सरकार का दावा है कि पूरी भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और मेरिट आधारित रही है। कई सफल अभ्यर्थियों ने भी सामने आकर यह बात दोहराई है कि उन्हें बिना किसी सिफ़ारिश या घूस के पूरी ईमानदारी से नौकरी मिली है। इसके अलावा, सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड को देखें तो अब तक बिना किसी बड़े भ्रष्टाचार के आरोप के 9 लाख से ज़्यादा सरकारी नौकरियां दी जा चुकी हैं। साथ ही, पेपर लीक पर सरकार ने ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति अपनाई है, जिसके तहत कड़े क़ानून बनाए गए हैं, गिरफ़्तारियाँ हुई हैं और परीक्षा सिस्टम में बड़े बदलाव किए गए हैं।

लेकिन दूसरी तरफ़, अभ्यर्थियों की नाराज़गी को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि पिछले 18 महीनों से यह केस कोर्ट में लटका हुआ है, जिससे उनका भविष्य अधर में है और यही उनकी हताशा का मुख्य कारण है।

मुद्दे पर शुरू हुई सियासी बयानबाज़ी

अब इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति भी पूरी तरह हावी हो चुकी है। समाजवादी पार्टी इसे एक बड़ा ‘आरक्षण घोटाला’ बता रही है। लेकिन विपक्ष पर भी यह सवाल उठता है कि अगर भर्ती प्रक्रियाओं में गड़बड़ी की बात करनी है, तो साल 2012 से 2017 के उस दौर को भी देखना होगा जब सूबे में उनकी सरकार थी।

उस कार्यकाल के दौरान कई भर्तियों पर गंभीर आरोप लगे थे, जैसे:

  1. PCS भर्ती: इंटरव्यू के आधार पर चयन में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के आरोप।
  2. RO/ARO परीक्षा: परीक्षा के आयोजन में गंभीर विसंगतियाँ (Irregularities)।
  3. एक्स-रे टेक्नीशियन भर्ती: एक ही पहचान (Identity) पर कई लोगों की नियुक्तियों का मामला।
  4. शिक्षामित्रों का समायोजन: सबसे बड़ा विवाद शिक्षा मित्रों का बिना किसी नई परीक्षा के बड़े पैमाने पर रेगुलराइजेशन करना था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह रद्द कर दिया था।

इसके अलावा, उस दौर में कई महत्वपूर्ण परीक्षाएँ पेपर लीक होने के कारण रद्द भी करनी पड़ी थीं, जिनमें पीसीएस (PCS) 2015, मेडिकल एंट्रेंस और इंजीनियरिंग एग्ज़ाम जैसे बड़े उदाहरण शामिल हैं।

कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ़ 69,000 नौकरियों का नहीं रह गया है। यह प्रशासनिक सिस्टम की विश्वसनीयता, आरक्षण के नियमों की सही व्याख्या और राजनीतिक नैरेटिव्स की एक बड़ी लड़ाई बन चुका है।

सच तो यह है कि मामला अभी देश की सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है। इसलिए, जब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फ़ैसला नहीं आ जाता, तब तक किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाज़ी होगी। सरकार भी साफ़ कर चुकी है कि सुप्रीम कोर्ट का जो भी आदेश होगा, उसे पूरी तरह अक्षरशः माना और लागू किया जाएगा।

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