कथामंजरी में आज हम एक ऐसे राजपूत युवराज की कहानी के बारे में जानेंगे, जिसके पौरुष पर अलाउद्दीन खिलजी की बेटी शहजादी फ़िरोज़ा मोहित हो गई थी। यह कहानी हरिशंकर राजपुरोहित की एक पुस्तक से प्रेरित है, पुस्तक का नाम है, ‘जालोर गढ़ में जौहर’।
यह कहानी राजस्थान के जालौर की है। राजस्थान की वीरभूमि में के बारे में तो हम सबको पता है कि यहाँ इंसान तो छोड़िये, पशुओं की नाड़ी में भी रक्त के स्थान पर स्वाभिमान बहता है। 13वीं शताब्दी की बात है। जब दिल्ली पर खिलजी सल्तनत का शासन था, तो उस समय राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्र में जालौर नाम का एक छोटा सा राज्य हुआ करता था।
यहाँ के चौहान राजा कन्हड़ देव, अपनी वीरता के लिए पूरे भारतवर्ष में विख्यात थे। एक दिन की बात है। महाराज की सभा बैठी थी, और सभा एक विशेष मुद्दे पर चिंतित थी। वह मुद्दा ये था कि अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने सेनापति उलुग खान के नेतृत्व में, सोमनाथ मंदिर में तोड़फोड़ की थी और वहां पर असंख्य स्त्रियों के साथ बलात्कार किया था। और वह लुटेरे सोमनाथ का शिवलिंग भी अपने साथ उठा कर ले गए थे।
मंदिर का और स्त्रियों का यह अपमान जालौर की प्रजा को और जालौर के राजा को मन ही मन कचोट रहा था। अब जबकि सभा में सभी लोग उपस्थित थे तो महाराज ने सब की ओर उम्मीद की नजरों से देखा और पूछा, तो उलुग खाँ को दण्डित करने कौन जायेगा?
पूरी सभा की नजरें, सभा के अंतिम सिहांसन पर बैठे एक युवक की ओर गईं। वह बलिष्ट युवक अपने आसन से उठा और शीश झुका कर बोला- मुझे आज्ञा मिले पिताश्री, आपका ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते यह मेरा ही कर्तव्य है।
महाराज ने मुस्कुरा कर अपने ज्येष्ठ पुत्र युवराज वीरम देव की ओर देखा और कहा, सोच लो वीर, खिलजी की सेना वर्तमान विश्व की सबसे क्रूर सेना है, और उनके पास से किसी भी परिस्थिति में सोमनाथ का पवित्र शिवलिंग जालोर लाना ही है। हम किसी भी परिस्थिति में उन्हें शिवलिंग ले जाने नहीं दे सकते।
युवराज वीरम ने म्यान से तलवार खींचकर हवा में लहराई और बोले- युद्धभूमि से मैं वापस आऊं या न आऊं, भगवान सोमनाथ का शिवलिंग अवश्य आएगा, यह आपके पुत्र की शपथ है महाराज! आप हमें अवसर दीजिये।
महाराज की छाती फूल उठी। उन्होंने सिहांसन से उतर कर बेटे को गले लगा लिया। महाराज ने वीरम से पूछा- कितनी सेना ले जाओगे वीर?
वीरम बोले- बस सिर्फ अपनी टुकड़ी ले जाऊँगा।
महाराज चिंतित हो गए, बोले- सिर्फ पांच सौ की सेना से आप उलुग खां से कैसे लड़ेंगे युवराज? उसके पास कम से कम आठ हजार की सेना है।
वीरन देव ने कहा, डरने की बात नहीं है, महाराज! अपने पुत्र पर विश्वास रखिये।
महाराज थोड़ा हिचके लेकिन अंततः उन्होंने युवराज वीरम देव को जाने का संकेत किया। उनके जाने के बाद सेनापति से बोले- समूची सेना को तैयार रहने का आदेश दीजिये सेनापति, हम गुप्त रूप से वीरम की टुकड़ी के पीछे ही तैयार रहेंगे।
इसके बाद वीरन देव तैयारी में लग गए। सोमनाथ में भीषण रक्तपात करके मंदिर को लूटने के बाद उलुग खान के नेतृत्व में खिलजियों की सेना जिस रास्ते से वापस लौट रही थी, वह जालोर की सीमा में ही पड़ता था। उसकी सेना के पास लूटे गये स्वर्ण भंडार के साथ-साथ सोमनाथ में कैद की गईं हजारों स्त्रियां थीं, जिन्हें वो वहशी राक्षस गुलाम बना कर ले जा रहे थे।
शाम का समय था। दिन भर की थकान के बाद विश्राम के लिए खिलजी सेना ने अभी तंबू गाड़ना शुरू ही किया था कि युवराज वीरम ने सिर्फ 500 सैनिकों के साथ धावा बोल दिया।
इतिहास साक्षी है, धर्म में बहुत शक्ति होती है। वीरम के सैनिक अपने धर्म की रक्षा के लिए आये थे। वे किसी को तलवार के बल पर हिन्दू बनाने नहीं, बल्कि सोमनाथ का शिवलिंग लेने आये थे। और यही कारण था कि घण्टे भर के छापामार युद्ध के बाद, जब उलुग खां जान बचा कर भागा, तो उसके साथ सिर्फ सौ सैनिक भाग पाये थे। वीरमदेव की सेना ने शिवलिंग भी वापस लिया और 3000 स्त्रियों को उलुग खाँ के चंगुल से मुक्त भी कराया। जालोर उत्सव मनाने लगा। युवराज वीरम देव की प्रतिष्ठा भारतवर्ष में फैल गई।
इस घटना के कई महीने बाद, जालौर की राजसभा में अलाउद्दीन खिलजी का दूत मित्रता का संदेश ले कर आया। खिलजी ने मित्रता के निवेदन के साथ युवराज वीरम को भी दिल्ली आने का निमंत्रण दिया था। पूरी सभा ने एक स्वर में खिलजी के निमंत्रण को ठुकरा देने का सुझाव दिया, किन्तु वीरम तो किसी और ही मिट्टी के बने थे।
उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा- किसी अज्ञात षड्यंत्र के डर से निमंत्रण अस्वीकार कर देना, हम राजपूतों को शोभा नही देगा महाराज! हम क्षत्रिय हैं, और हमें हर निमंत्रण चाहे वह भोजन का हो या युद्ध का, स्वीकार होना चाहिए। इसलिए महाराज निर्भय होकर मुझे जाने की आज्ञा दें।
महाराज ने वीरम को जाने की आज्ञा दे दी। पर इस बार भी उन्होंने आपात स्थिति से निपटने के लिए सेना को तैयार होने का आदेश दे दिया।
खिलजी के दरबार में जब बाइस वर्ष का अपूर्व सुन्दर राजपूत युवराज पंहुचा, तो दरबार के सभी लोग मंत्रमुग्ध होकर युवराज वीरम देव की तरफ देखने लगे। उसी दरबार में झरोखे के पास, अलाउदीन की बेटी फिरोजा भी बैठी थी।
फिरोजा की नजरें वीरम देव के चेहरे से हट ही नहीं रही थीं। उसके होंठ बार बार बिना बताए मुस्कुरा उठते थे, हृदय धड़क उठता था। फिरोजा ने अब तक अपने आस पास क्रूर और दैत्याकार चेहरे देखे थे। कोई पुरुष इतना सुन्दर भी हो सकता है, इसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।
वीरम को देर तक एकटक निहारने के बाद फिरोजा को लगा कि उसे वीरम देव से प्रेम हो गया है। राजकुमारी फिरोजा वीरम देव पर इस कदर फ़िदा हो गयी थी कि वो मन ही मन उन्हें अपना पति मानने लग गई।
दिल्ली में वीरम देव का प्रवास पूरा हुआ, वो जालोर चले गए। लेकिन इधर शहजादी फ़िरोज़ा ने खाना-पीना छोड़ दिया।
अब यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि फिरोजा उस समय दुनिया के सबसे ताकतवर सुल्तानों में से एक खिलजी की बेटी थी। अलाउद्दीन का रक्त फिरोजा की नसों में बह रहा था। उस फ़िरोज़ा में इतना साहस तो था ही कि वह अपने पिता से वीरम देव को मांग सके।
जब अलाउद्दीन को पता चला कि शहजादी खाना नहीं खा रहीं तो उसने कारण पूछा। इस पर शहजादी ने कहा – “वर वरुँ तो विरमदेव, ना तो रहुँगी अकन कूँवारी।”
शहजादी की बात सुनकर खिलजी हिल गया और बोला कि तुम सुल्तान की बेटी हो, किसी राजपूत से निकाह करोगी? खिलजी ने बहुत समझाया, लेकिन फ़िरोज़ा नहीं मानी।
अलाउद्दीन भले एक बर्बर लुटेरा था, पर इतना दरिद्र भी नहीं था कि अपनी बेटी की मांग पूरी न कर सके।
खिलजी ने अपना राजनैतिक फायदा भी देखा कि अगर बेटी नहीं मान रही, तो ठीक है। जालौर के युवराज वीरम से अगर बेटी का निकाह हो जाएगा तो जालौर की तरफ से भविष्य में कोई दिक्क़त भी नहीं आएगी। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी की तरफ से फ़िरोज़ा और वीरम देव के निकाह का प्रस्ताव जालोर दुर्ग पहुँचाया गया।
जब वीरम देव के पास यह प्रस्ताव पंहुचा तो उन्होंने यह कहते हुए प्रस्ताव को ठुकरा दिया:
“मामा लाजै भाटिया, कुल लाजै चौह्वान, जौ मै परणुँ तुरकणी तो पश्चिम उगे भान”
अर्थात मैं किसी तुर्कण से विवाह करके अपने मामा के कुल भाटी और अपने कुल चौहान को कलंकित नहीं कर सकता और यह होना संभव नहीं है कि मैं तुर्की राजकुमारी से विवाह करूँ, ऐसा संभव तभी होगा, जब सूर्य पश्चिम से उगेगा।
वीरम देव की यह बात जब खिलजी के पास पहुंची तो यह सुनते ही खिलजी आगबबूला हो गया और उसने जालोर के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
खिलजी की सेना जालोर के लिए निकल चुकी थी। लेकिन अगले दिन जालोर में एक और घटना हुई।
महाराज कन्हड देव की सभा में युवराज वीरम देव को बुलाया गया और महाराज ने उनसे कहा कि उस दिन युद्ध में तुमने उलुग खान से जिन 3000 स्त्रियों को मुक्त कराया था, आज की सभा उन तीन हजार युवतियों के भविष्य का निर्णय करने के लिए एकत्र हुई है।
दरअसल उन स्त्रियों से कोई भी व्यक्ति अब विवाह करने को राजी नहीं है। यदि कोई एक समर्थ युवक उनमें से किसी एक से भी शादी कर ले, तो अनेक युवक उसका अनुसरण कर लेंगे। इससे उन तीन हजार कन्याओं का तो उद्धार होगा ही, भविष्य के लिए भी एक आदर्श स्थापित हो जायेगा।
युवराज वीरम देव ने पूछा- “तो क्या किसी एक भी युवक ने अपनी स्वीकृति नहीं दी महाराज?”
महाराज ने अपनी दृष्टि वीरम के मुखड़े पर गड़ाई और बोले- “हमारी आशा तो तुमसे ही है वीर, अगर तुम किसी से विवाह कर लो तो 3000 कन्याओं का उद्धार हो जाए।”
युवराज वीरम देव ने बिना कुछ सोचे दृढ़ होकर कहा – “ठीक है महाराज।”
महाराज ने पुत्र को गले लगा लिया। सभा जयजयकार कर उठी।
अगले 2-3 दिनों में अलाउद्दीन की डेढ़ लाख की सेना जालोर के 10000 राजपूतों की तलवारों से टकराने वाली थीं।
जालोर के राजपूत खिलजी के आक्रमण की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनकी प्रतीक्षा लम्बी नहीं चली, वीरम के विवाह के अगले ही दिन खिलजी सेना जालोर की सीमा पर पहुँच चुकी थी।
जालौर भी युद्ध के लिए तैयार खड़ा था। अब आप यहाँ ठहर कर कुछ देर सोचिये। जालोर के राजपूतों को पता था कि खिलजियों की डेढ़ लाख की सेना के सामने 10 हज़ार की सेना ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाएगी।
फिर भी वो युद्ध कर रहे थे। क्यों?
अगर राजपूत चाहते तो अलाउद्दीन के पास यह संदेशा भिजवा देते कि ठीक है, अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारी बेटी फ़िरोज़ा से हमारे युवराज वीरम देव की शादी हो, तो हमें यह मंज़ूर है। फ़िरोज़ा से वीरम देव की शादी हो जाती, यह युद्ध भी रुक जाता और जालोर भी सुरक्षित हो जाता। लेकिन राजपूतों ने अपने पूर्वजों की पहचान, अपने वंश, अपने भविष्य की मर्यादा और अपनी रक्त की शुद्धता के साथ समझौता नहीं किया।
राजपूत उस सनातन परंपरा के कारण खिलजी के सामने नहीं झुके, जिस परंपरा में रक्त को सिर्फ मांस के बीच में दौड़ते हुए द्रव्य के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि रक्त में पूर्वजों के संस्कार, पूर्वजों के तप, पूर्वजों के व्रत प्रवाहित होते हैं। राजपूत जानते थे कि यदि यह रक्त दूषित हो गया, सिर्फ देह नहीं बदलेगी बल्कि धर्म और संस्कार भी बदल जाएंगे।
राजपूत जानते थे कि डेढ़ लाख की खिलजी सेना के सामने उनके 10000 सैनिक चाहे कितनी भी वीरता से लड़ें, लेकिन जीत नहीं पाएंगे, लेकिन उसके बावजूद उन्होंने वीरता से लड़ते हुए खुद को रणभूमि को समर्पित कर देना ज्यादा उचित समझा।
राजपूतों ने अपने महाराज कन्हड़ देव और अपने युवराज वीरम देव के साथ माता भवानी के सामने शपथ ली कि वो अपने धर्म के लिए लड़ेंगे, सत्य सनातन के लिए लड़ेंगे, राजपूतों की परम्परा को बचाने के लिए लड़ेंगे और अपने आप को युद्धभूमि में आहूत कर देंगे।
खिलजी ने जब डेढ़ लाख की सेना के साथ जालौर पर आक्रमण किया, तो उस युद्ध में जीत की कोई संम्भावना ना देखकर हमारी क्षत्राणी माताओं ने भी मलेछों के सामने आत्म समर्पण करने के बजाय जौहर कर देना ज्यादा उचित समझा।
अग्नि वेदी सजाई गई।
जालौर के राजपूत योद्धा अपना हृदय कठोर करके, पथराई आँखों से अपनी पत्नियों, माताओं, बहनों एवं पुत्रियों को एक जुलूस के रूप में, अपने सामने जौहर के पथ पर, मोक्ष के पथ पर जाते हुए देख रहे थे।
बापों ने बेटियों के माथे चूमे। अंतिम बार अपनी बेटियों को देखकर उनकी आत्माएँ तरंगित हुईं। पतियों ने अपनी पत्नियों की माँग अंतिम बार भरी। जालौर का हर पुरुष असहाय भी था और निश्चिंत भी। असहाय इसलिए क्योंकि उनके घर की स्त्री जौहर के लिए जा रही थी, और निश्चिंत इसलिए कि अब दुर्गंध से युक्त कोई म्लेच्छ उनके घर की स्त्री के साथ दरिंदगी नहीं कर पाएगा।
दूसरी ओर जौहर से पहले उन सब वीरांगनाओं ने भी अपने पुरोहितों और अपने गुरुओं से आशीष लिया, ताकि परीक्षा की इस घड़ी में उनके चित्त में कायरता का कोई कंपन न आ जाए !
जालौर के पुरुषों ने अपना हृदय पाषाण का कर, सब संवेदनाओं से रिक्त कर लिया कि यदि दुर्बलता की एक लकीर भी चेहरे पर दिखी, तो हमारी नारियों की अंतिम यात्रा कष्टपूर्ण हो जाएगी।
कहा जाता है कि वीर अपनी मृत्यु स्वयं चुनते हैं तो फिर ये तो वीरों को जन्म देने वाली क्षत्रानियाँ थीं, अपने सतीत्व की रक्षा करने के लिए जालौर की हज़ारों क्षत्राणियों ने केसरिया वस्त्र पहन कर खुद को अग्नि को समर्पित कर दिया। अग्निदेव ने उस दिन एक साथ हज़ारों आहुतियाँ स्वीकार कीं।
उस शाम जब जौहर हो रहा था, और जालौर के किले से आग की लपटें उठ रही थीं, तो जालौर की सीमा पर खड़ी खिलजी सेना भी सोच में पड़ गई कि ये कैसी आग है।
उस समय खिलजी सेना को किसी ने बताया कि ये आग जौहर की है। राजपूत स्त्रियां खुद को अग्नि को समर्पित कर रही हैं। तैयार हो जाओ, अब राजपूत कल सुबह आक्रमण करेंगे।
अगले दिन सुबह हुई और 10 हजार राजपूत अपनी नंगी तलवारे लहराते हुए जय भवानी के उद्घोष के साथ खिलजी की डेढ़ लाख की सेना पर टूट पड़े। खिलजी की डेढ़ लाख की सेना से जालोर की दस हजार की सेना कैसे लड़ी, उस युद्ध के विषय में कुछ भी कह पाना मेरे सामर्थ्य से बाहर है।
कहा जाता है कि उस युद्ध में एक राजपूत सैनिक का पैर कट गया तो दूसरे राजपूत ने अपना कंधा आगे करके उससे कहा कि मेरे कंधों पर बैठ जाइए और अपनी तलवार की प्यास इन मलेच्छों के रक्त से बुझाइए।
मैं उस युद्ध में घटित ऐसी हजारों शौर्य पूर्ण कृतियों में से किसी एक का भी घटना उचित वर्णन नहीं कर पाऊंगा। मेरे पास शब्द नहीं हैं कि मैं राजपूतों की वीरता को शब्दों के उन धागों में पिरो पाऊँ। युद्ध हुआ और क्या खूब युद्ध हुआ। कई दिनों तक चले इस युद्ध में समूचे जालोर को वीरगति प्राप्त हुई।
उसके बाद जब युवराज वीरम का कटा शीश खिलजी दरबार में लाया गया तो अलाउदीन ने भाले की नोक में फंसे शीश को फिरोजा की गोद में डाल कर कहा, “ले तुझे जिंदा वीरम तो न दे सका फिरोजा, पर उसका सिर ले, और इसे ही मेरा तोहफा समझ।”
फिरोजा अवाक रहकर एकटक वीरम के कटे शीश को देखती रही।
अलाउद्दीन के चले जाने पर फिरोजा ने एक बुजुर्ग दासी से पूछा- “दासी, तुम जानती हो, राजपूत राजाओं के मरने के बाद उनकी बेवाएं क्या करती हैं?”
दासी बोली- “करती क्या हैं शहजादी, जो अपने शौहर को बहुत प्यार करती हैं, वो उनकी लाश गोद में लेकर उनकी चिता के साथ सती हो जाती हैं।”
अगले दिन मछुआरों ने देखा कि यमुना में फिरोजा का शव बहा जा रहा था। और फ़िरोज़ा की गोद में युवराज वीरम का शीश पड़ा हुआ था।
ऐसा कहा जाता है कि धर्म वह तत्व है, जो हमें धारण करता है। लेकिन वो समय ऐसा था, जब जालौर में 10000 राजपूतों ने और हज़ारों क्षत्राणियों ने धर्म को अपने वक्ष पर धारण किया था।
क्या हिंदुओं में आज वह सामर्थ्य, वह साहस, वह निष्ठा है कि वह अपने धर्म को धारण करके अपनी पुरखों की स्मृतियों के साथ न्याय कर पाएं?





