आज बात करेंगे एक विडंबना की। हम सभी जानते हैं कि भारत ने दुनिया को युद्धनीति सिखाई। भारत ने दुनिया को शब्दाभेदी बाण चलाने से लेकर पुष्पक विमान चलाने तक का सिद्धांत दिया। भारत ने आग्नेय अस्त्र से लेकर ब्रम्हास्त्र तक का सिद्धांत दिया।
विडंबना देखिये कि वही भारत आजादी के बाद अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हो गया। 2014 से पहले भारत का रक्षा क्षेत्र आयात आधारित तंत्र रूपी लोहे की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ था। भारत दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा आयातक था। हर संकट में भारत को विदेशी निर्यातकों पर निर्भर रहता था।
इस आयात निर्भरता के पीछे वैसे तो कई कारण थे लेकिन इसमें एक और तड़का यह लगा दिया गया कि रक्षा खरीद “राष्ट्रीय सुरक्षा” का नहीं, बल्कि “राष्ट्रीय दलाली” का साधन बन गई थी। बोफोर्स, अगस्ता वेस्टलैंड, और टाट्रा ट्रक जैसे घोटालों ने रक्षा मंत्रालय को कमीशनखोरी का अड्डा बना दिया था। इन घोटाले से पैसे की बर्बादी तो होती ही थी, साथ ही भारत की वैश्विक छवि को भी चोट पहुँचती थी।
एक तरह से भारत अपनी सुरक्षा के लिए लाचारी की अवस्था में पहुँच गया था। इसका एक उदाहरण यह है कि कांग्रेस सरकार में रक्षा मंत्री एके अंटनी से जब राफेल खरीदने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि सरकार के पास पैसे नहीं थे।
यह हालत थी उस भारत की, जिसके पूर्वजों की सिखाई गई युद्धनीति का पूरी दुनिया अनुसरण करती है। जिस राष्ट्र ने दुनिया को ‘धनुर्वेद’ और ‘सप्तशक्ति सिद्धांत’ दिया, वह राष्ट्र 21वीं सदी में विदेशी हथियारों की वेटिंग लिस्ट में खड़ा था, इतिहास की इससे बड़ी विडंबना भला क्या हो सकती है?
हर राष्ट्र को कभी न कभी अपनी परछाइयों से निकलकर खड़ा होना पड़ता है, भारत के लिए यह क्षण 2014 में आया। 2014 के बाद, एक मौलिक परिवर्तन शुरू हुआ।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में ‘मेक इन इंडिया’ और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का नारा दिया गया। रक्षा उत्पादन में निजी उद्योगों की भागीदारी को बढ़ावा दिया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने यह समझा कि कोई भी राष्ट्र सही मायने में तब तक स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक वह अपने हथियार खुद निर्मित न करे।
इसलिए सरकार ने स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर ध्यान दिया। 2014 तक हमारा रक्षा उत्पाद मात्र 46 हजार करोड़ रुपये था, वहीं आज यह बढ़कर 1 लाख 27 हज़ार करोड़ रुपए के आँकड़े तक पहुँच चुका है।
हम रक्षा उत्पाद बढ़ाकर आत्मनिर्भर तो हो ही रहे हैं। साथ ही हम दूसरे देशों को भारत में बने हथियार भी बेच रहे हैं।
2013-14 में जहां भारत का रक्षा निर्यात ₹600 करोड़ के आसपास था, वहीं 2024-25 में यह ₹23,000 करोड़ तक पहुँच गया है, यानी हमारे रक्षा निर्यात में लगभग 3500% की वृद्धि हुई।
अब भारत न केवल फिलीपींस, अर्मेनिया, ब्राज़ील, मिस्र और वियतनाम जैसे देशों को, बल्कि अमेरिका और फ्रांस जैसी महाशक्तियों को भी अपने रक्षा उत्पाद बेच रहा है। ब्रह्मोस, तेजस, पिनाक, आकाश और ध्रुव जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म भारत से निकलकर पूरी दुनिया में जा रहे हैं।
सबसे बड़ी बात कि निजी क्षेत्र भी रक्षा क्षेत्र में बढ़-चढ़ कर योगदान दे रहे हैं। आज भारत के कुल रक्षा निर्यात का लगभग 65% हिस्सा निजी क्षेत्रों से आता है।
यह वृद्धि सिर्फ आंकड़ों की नहीं है, यह संकेत है भारत की यात्रा का, जो उसने पिछले 11 वर्षों में तय की है, जिसमें वह एक रक्षा आयातक से रक्षा निर्यातक बनकर उभरा है।
यह यात्रा आत्मनिर्भरता से आत्मिक उत्कर्ष तक की है, जिसमें हमने बोफोर्स के कलंक को धोकर ब्रह्मोस की चमक पैदा की है। हमने अपने भविष्य का निर्माण स्वयं किया है। एक समय था जब भारत आयात करता था और दुनिया हमारा निर्णय करती थी; आज भारत निर्यात करता है और दुनिया हमपर भरोसा करती है।





