नमस्कार! मैं हूँ राहुल रौशन, और आप देख रहे हैं ऑपइंडिया।
आज से 11 साल पहले, सितंबर 2014 में, नरेन्द्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री पहली बार यूएस गए थे। मौक़ा था United Nations General Assembly के debate में हिस्सा लेने का जो New York में हो रही थी। साथ ही में New York के Madison Square Garden में नरेन्द्र मोदी के स्वागत में एक इवेंट भी होना था।
उस इवेंट को कवर करने पहुंचे थे कई सारे पत्रकार, जिसमें से एक थे इंडिया टूडे ग्रुप के राजदीप सरदेसाई। अब मोदी समर्थकों और राजदीप सरदेसाई में कितना प्यार मोहब्बत है ये बात किसी से छुपी नहीं है, और वो मुहब्बत तब भी खुल के सामने आयी।
सरदेसाई 20,000 की भीड़ में मोदी के क्रिटिक ढूंढने निकले, लेकिन मिला कोई नहीं। उल्टा एक बंदे ने उन्हें न्यूज़ ट्रेडर बोल दिया। बस इस बात पे राजदीप की सटक गई। राजदीप ने उसे asshole बोल दिया, तो उस बंदे ने बोला कि “you are asshole too”.
अब तो राजदीप की पूरी तरह सटक गई। वो फिल्मी अंदाज़ में उगंली और गर्दन हिलाते मुड़े और उस बंदे को धक्का देकर उसे घूंसा मारने की कोशिश की। वो तो वहां पे मौजूद भीड़ ने बीच-बचाव कर दिया, वरना लोगों को फ्री में लंबा बॉक्सिंग मैच दिखने वाला था।
ये सब कुछ हज़ारों लोगों के सामने हुआ और कैमरे पे रिकार्ड भी हुआ, लेकिन मीडिया ने हेडलाइन बनायी कि Rajdeep Sardesai assaulted या राजदीप सरदेसाई पे हमला।
ये सरासर झूठ था क्योंकि अगर किसी ने assault या हमला किया था, तो वो थे राजदीप सरदेसाई। He was the aggressor, not the victim.
2014 तक सोशल मीडिया अपने पैर जमा चुका था। वीडियो सब ने देखा, लेकिन उस घटना के बारे में कोई गुगल करता तो यही लगता की राजदीप तो बेचारे थे। आपके आंखो देखी को आपके सामने ही झूठ बताया जा रहा था।
और ये एक छोटी सी घटना थी। मीडिया का एक बड़ा और प्रभावी तबका सालों से ऐसा करता आया था। सच का रंग वही होता था जो ideology के लाल चश्मे से दिखे। ज़रूरत थी कि एक ऐसा मीडिया प्लैटफ़ार्म बनाया जाए जो अलग राह चले, जिसका चश्मा अलग हो। और लगभग तीन महीने बाद ऑपइंडिया का जन्म हुआ।
11 साल हो गए हैं आज ऑपइंडिया को। मैंने सोचा बस इस मौक़े पर इस छोटे से सफ़र की छोटी सी कहानी सुना दी जाए।
शुरुआत तो बर पार्ट-टाइम ही थी। मुझे ख़ुद पता नहीं था क्या रूप लेगा ऑपइंडिया। पर एक चीज़ शुरू से ही तय थी कि न्यूट्रैलिटी का चोंगा हम नहीं ओढेंगे, और न ही वो template use करेंगे जो कि mainstream media करता आया है।
जैसे कि समुदाय विशेष नाम को कोई समुदाय नहीं होता, छात्रों का प्रदर्शन सिर्फ़ SFI नहीं ABVP भी करता है, राजदीप सरदेसाइ allegedly नहीं सीधे धक्का मुक्की करते हैं, और आतंकवाद का धर्म तो बिलकुल होता है।
Launch के डेढ़-दो साल तक part-time, office hours के बाद जैसा सिलसिला चलता रहा और फिर 2016 में मैंने नौकरी छोड़ दी और फुल-टाइम इसमें लग गया। स्वराज्य मैगजीन की मदद से एक छोटी टीम खड़ी की और काम पे लग गए हालांकि दो साल के अंदर ही हमने अलग कंपनी बना ली।
अगले 4-5 साल तक हमने खूब पटाखे फोड़े। रिपोर्ट किया कि कपिल सिबल ने कैसे दिल्ली के posh जोर बाग इलाके में एक बंगला कौड़ियों के भाव ले लिया। सिबल ने कहा हम पर केस कर देंगे। नहीं किया।
कई मीडिया हाउसेज़ ने अपने रिपोर्ट्स को सुधारा क्योंकि ऑपइंडिया ने उनके झूठ या गलतियों पर रिपोर्ट बना दी, फिर आप लोग उनके पीछे पड़ गए। इसमें बीबीसी, टाइम्स ऑफ़ इंडिया से लेकर द वायर तक के नाम शामिल हैं।
हमारी ताक़त हमेशा से हमारे supporters रहे हैं। Ad revenue से ज़्यादा हमें आपके voluntary support से पैसा मिला जबकि हर महीने हम कोई अपील भी नहीं करते थे कि हमें पैसा दो। कोविड के दौरान भी हमें कोई दिक्कत नहीं हुई आप के सपोर्ट के कारण।
फिर 2022 के आस पास का माहौल, खास कर के इंटरनेट पे, कुछ बदला। so-called Right Wing के अंदर ही कई तरह के मतभेद निकल कर आने लगे। चाहे बंगाल चुनाव के बाद की हिंसा की बात तो, किसानी के नाम पर खालिस्तानियों की गुंडागर्दी की बात हो या फिर नुपूर शर्मा के खिलाफ मुसलमानों के पागलपन की बात हो।
इन सब पे आज भी मतभेद कम नहीं हुए हैं, उल्टा और भी परतें जुड़ती जा रही हैं, जैसे कि आजकल जाति और आरक्षण को लेकर।
यहां हमारे लिए थोड़ा धर्मसंकट था। वामपंथियों को कूटने में तो हमने कभी कमी नहीं बरती, पर इधर क्या किया जाए। न कोई पूरी तरह सही था न पूरी तरह गलत। कुछ भी बोलो तो कोई तो नाराज़ हो ही जाएगा। और ऐसा हुआ भी कुछ बार।
व्यक्तिगत तौर पे मैंने तो इन सब बहसों से अपने को दूर ही कर लिया, और नुपूर, ऑपइंडिया की एडिटर-इन-चीफ़, को भी सलाह दी की इन लफ़ड़ों से दूर रहो। पता नहीं, शायद कुछ और करना चाहिए था?
लेकिन एक अच्छी बात ये हुई कि हमारी नज़र कुछ ऐसी चीजों पे भी गई जो शायद इन बहसो में पड़ कर न जाती। जैसे कि कैसे विकीपीडिया वामपंथी प्रोपेगैंडा का इस वक्त सबसे बड़ा मैदान है।
हमें अंदेशा तो था। CAA के विरोध के नाम पर जो दिल्ली दंगे हुए थे, उसमें हिन्दुओं की आपबीती रिपोर्ट करने वालों में सबसे आगे ऑपइंडिया ही था। सिर्फ़ वही नहीं, शरजील इमाम, उमर ख़ालिद जैसों ने जो ज़हरीले भाषण दिये थे, उन सबको न्यूज़ रिपोर्ट के रूप में document करने वालों में सबसे आगे भी ऑपइंडिया ही था। इसकी वजह से कोर्ट में भी prosecution की तरफ से ऑपइंडिया की कुछ रिपोर्ट्स का हवाला दिया गया था। वामपंथियों को तभी लग गया था कि ऑपइंडिया का इलाज करना ज़रूरी है।
एक सोची समझी रणनीति के इन्होंने पहले ऑपइंडिया के वीकिपीडिया पेज को वापस लाया। वापस लाया मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इन्होंने खुद ही ऑपइंडिया के वीकिपीडिया पेज को कुछ महीने पहले ये कह कर डिलीट करवाया था कि हम बहुत ही छोटे हैं और अलग से पेज deserve नहीं करते। वापस लाके, उसे एडिट के लिए लॉक करके, उसपे फेक न्यूज़ और दूसरी अनाप शनाप बातें लिखी गयी थीं। ताकि कोर्ट में Prosecution के evidence या annexure को discredit किया जा सके।
कई लोग हमसे पूछते थे कि आप अपना वीकीपीडिया पेज ठीक क्यूं नहीं करते। उन्हें लगता था कि वीकीपीडिया तो कोई भी एडिट कर सकता है। थोड़ा बहुत हमें भी लगता था। पर जब हमने रिसर्च किया तो पता चला कि वीकीपीडिया कैसै बस चंद लोगों की मुट्ठी में कैद है। जो वो कुछ दर्ज़न भर लोग चाहेंगे, वही सच के रूप में लिखा जाएगा। मेनस्ट्रीम मीडिया से भी बड़ा स्कैम है वीकीपीडिया।
हमने वीकीपीडिया पे एक DOSSIER तैयार किया और फिर सरकार ने वीकीपीडिया को नोटिस भी इश्यू किया।
फिर हाल में हमने CSDS नाम की संस्था पर एक DOSSIER तैयार किया, जिसके इनाम में RSF यानी REPORTERS WITHOUT BORDERS ने तो हमें प्रेस फ्रीडम का Predator ही बता दिया। हमारे अलावा इलोन मस्क, इजरायली आर्मी, और अदाणी समूह का नाम है इस लिस्ट में। बहुत मज़ा आया, भले ही हमारे पास इजरायली आर्मी की तरह हथियार या फिर मस्क और अदाणी की तरह पैसा नहीं है।
इसके साथ ही हमने multimedia पे भी ध्यान देना शुरू किया। Bihar elections में हमारी टीम ने काफ़ी अच्छा काम किया है और दूसरे जगहों से भी हमनें एक्यक्लूसिव ग्राउंड रिपोर्ट्स की हैं। ये वीडियो भी उसी प्रकिया का हिस्सा है।
ये सारे काम आगे हम जारी रखेंगे अगर आपका सपोर्ट मिलता रहा। हम उन मुद्दों पे भी बात करेंगे जिससे पहले हम बचते रहे।
और जल्द ही हम एक ऐसी व्यवस्था करेंगे जिससे आप लोग ख़ुद इस प्रकिया का हिस्सा बनें की ऑपइंडिया को किन मुद्दों पर बात करनी चाहिए। सब कुछ ठीक रहा, तो इस साल के अंत तक ही।
तो फिलहाल इस 11 साल तक जुड़े रहने के लिए धन्यवाद, please keep supporting us, and keep watching this space for more.




