ICE-illegal immigration

अवैध अप्रवासन का संकट: अमेरिका की ICE से भारत के लिए सबक, और सांस्कृतिक मार्क्सवाद की चुनौती

Summary
केंद्र सरकार एक ऐसी ठोस संवैधानिक बॉडी तैयार करे, जिसका सिर्फ और सिर्फ यही काम हो - अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर का रास्ता दिखाना! क्यूँकि भारत सिर्फ भारतीयों का है और भारतीयों के लिए है, अवैध घुसपैठियों के लिए नहीं।

आप इस लिंक पर जो वीडियो फुटेज देख रहे हैं, वो किसी वॉर ज़ोन की नहीं है। ये है लॉस एंजेलिस। अमेरिका का सबसे ग्लैमरस शहर। जहाँ सैकड़ों गाड़ियों को आग लगाई गई, स्टोर्स लूटे गए और पूरा शहर जल उठा। लेकिन क्या आपको पता है, कि ये कहानी सिर्फ अमेरिका की नहीं है? अगर अभी हमारी आँख नहीं खुली, तो यही तस्वीरें 10-15 साल में भारत के अलग-अलग शहरों से आ सकती हैं।

सवाल ये है कि अमेरिका इस हालत तक आख़िर पहुँचा कैसे? इसके लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। साल 1986। अमेरिका के प्रेजिडेंट रॉनल्ड रेगन ने Immigration Reform and Control Act पास किया। इस कानून से 30 लाख अवैध प्रवासियों को ग्रीन कार्ड देकर उनके लिए अमरीकी नागरिकता का रास्ता खोल दिया गया। यानी One-Time Amnesty। ऐसा कर के जिन्हें नागरिकता दी गई, उनमें से ज़्यादातर प्रवासी लैटिन अमेरिकी देशों से आए थे। इस कानून के ज़रिए 90 से 95 प्रतिशत लोगों को अमेरिका महाद्वीप से ही नागरिकता मिली। और इस तरह से ये एमनेस्टी असल में अमेरिका के पड़ोसी देशों में रहने वालों के लिए एक बड़ा रास्ता बन गई।

पर इसका नतीजा क्या हुआ? जब एक बार सिस्टम झुकता है, तो लोग उसे तोड़ना भी सीख लेते हैं। लोगों को लगने लगा, कि अवैध रूप से घुसने पर भी, कभी न कभी माफी मिल ही जाएगी। और यही सोच बनी “Sanctuary Cities” की नींव – जहाँ शहर की सरकारें, अवैध प्रवासियों के खिलाफ, फेडरल एजेंसी ICE को काम ही नहीं करने देतीं।

Cultural Marxism/सांस्कृतिक मार्क्सवाद

अब यहाँ से कहानी का दूसरा पहलू शुरू होता है – सांस्कृतिक मार्क्सवाद। इस सांस्कृतिक मार्क्सवाद को जानने के लिए हमें एक और कहानी को सुनना होगा। 

1930 के दशक में, हिटलर ने जर्मनी से कुछ वामपंथी प्रोफेसरों को निष्कासित कर दिया। पहले तो ये सभी, जर्मनी के फ्रैंकफर्ट स्कूल से जुड़े थे; और निकाले जाने के बाद अमेरिका के कोलंबिया यूनिवर्सिटी में आकर बस गए। इनका मकसद था, समाज में लगातार संघर्ष बनाए रखना। जैसा कि आप जानते हैं – वामपंथी विचारधारा के अनुसार समाज के सर्वहारा वर्ग और बुर्जवा वर्ग के बीच निरन्तर संघर्ष बना रहता है. लेकिन इन प्रोफेसरों ने इस संघर्ष की सीमाओं का विस्तार किया. अब ये संघर्ष सिर्फ अमीर बनाम गरीब नहीं था; बल्कि अब ये बन गया- “श्वेत बनाम अश्वेत, पुरुष बनाम महिला, नागरिक बनाम अप्रवासी।”

ये दिखावे की क्रांति कभी रुक न जाए, इसलिए अब तो नए नए जेंडर्स भी ईजाद किये जा रहे हैं. और इस आंदोलन को एक प्यारा सा नाम दिया गया – Cultural Marxism यानी सांस्कृतिक मार्क्सवाद। ये एक लंबी, शांत, और सोची समझी चाल थी। ये दरअसल  क्रांति की शक्ल में एक ऐसी साजिश थी, जो समाज को अंदर से तोड़ दे।

साठ का दशक आते आते इस साजिश ने अपना असली रंग अमरीका में दिखाना शुरू कर दिया. यह वो दौर था जब हिप्पी आंदोलन, स्टूडेंट प्रोटेस्ट और “एंटी एस्टब्लिशमेन्ट प्रोटेस्ट” – ये सब फैशन में आ चुका था। लेकिन, इन आंदोलनों के पीछे कौन था? स्टूडेंट्स? नहीं! क्या इसमें बेरोजगार युवा थे? नहीं! भटके हुए नौजवान? बिलकुल नहीं! इसके पीछे थी जर्मनी से अमरीका में आयात की गयी भाड़े की विचारधारा – Cultural Marxism।

जिन प्रोफेसरों को हिटलर ने जर्मनी से बाहर फेंका था, वो अब अमेरिका में बैठकर नया युद्ध लड़ रहे थे – वैचारिक युद्ध। और इस युद्ध का सबसे ताक़तवर हथियार था – शिक्षा।

छात्र आंदोलनों की आड़ में इन प्रोफेसरों के स्टूडेंट्स सबसे पहले टीचर्स के ट्रेनिंग सेंटर्स में घुसे। उनका लक्ष्य साफ था – “अगर शिक्षक का ही ब्रेन वॉश कर दिया जाए, तो अगली पीढ़ी के विचारों को आसानी से बदला जा सकता है।”

तो ये हुई साठ के डिकेड तक की कहानी। आगे चलकर बीसवीं सदी समाप्त होते होते और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में, इसी वैचारिक बम को अमेरिका के सिस्टम में फिट करने वाले 2 नाम थे – बिल एयर्स और बर्नाडिन डोहर्न। अब नाम सुनकर लगेगा, कि किसी कॉलेज के प्रबुद्ध प्रिंसिपल होंगे? लेकिन ऐसा नहीं है।

बिल एयर्स वो आदमी था, जिसने कहा था कि “अमीरों को मार दो, उनकी कारें फूंक दो, क्रांति को घर ले आओ। और हाँ, अपने माता-पिता को भी मार दो…” और बर्नाडिन डोहर्न? वो तो उससे एक कदम आगे थी. एफबीआई ने उसे “अमेरिका की सबसे ख़तरनाक महिला” बताया था। और मज़े की बात देखिए- ये दोनों ओबामा कपल के बेहद करीबी थे। वही ओबामा जो कहता था – “Yes We Can”।

अब आप सोचिए, जब शिक्षक ही आग लगाने वालों से ट्रेनिंग लेंगे, तो सोच क्या सिखाई जाएगी? यही वजह है कि ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका की सोच बदलने लगी। अब कहानी कुछ ऐसे चली, कि कानून तोड़ने वाले को “व्यवस्था का शिकार” बताया जाने लगा और उसे रोकने वाली पुलिस को कहा जाने लगा “फासीवादी”.

कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में पुलिस का बजट काटा गया और दुकान लूटने वालों को ‘फ्रस्ट्रेटेड यूथ’ कहा गया। यानी एंग्री यंग मैन – सिस्टम से आक्रोशित भटका हुआ युवा। ठीक वैसे ही जैसे हमारे देश में कश्मीर और अन्य स्थानों पर पत्थरबाजी करनेवाले मुस्लिम युवाओं को भटके हुए नौजवान कहा जाता है. आतंकी बुरहान वाणी को गरीब हेडमास्टर का बेटा कहा जाता है, जिसके पास बन्दुक उठाने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं होता। और फिर ऐसे दंगाइयों और आतंकियों को कहा गया पीसफुल और इनके द्वारा प्रायोजित दंगों को कहा गया- Peaceful Protest। अमेरिका में कमला हैरिस तक ने इन्हें समर्थन दिया।

और इस तरह… क्रांति क्लासरूम में घुसी, पुलिस सिस्टम से किनारे लगा दी गई, और लोकतंत्र का संतुलन गली-मुहल्लों में यहाँ वहाँ गिरा पड़ा रहा।

अब लौटते हैं अमेरिका के वर्तमान की कहानी पर – जहाँ ICE बनाम Sanctuary Cities का मामला गर्म है।

ICE से टकराता एक्टिविज्म

ICE यानी Immigration and Customs Enforcement – अमेरिका की वो एजेंसी जिसका काम है अवैध अप्रवासियों को पकड़ना, डिटेन करना और डिपोर्ट करना। लेकिन Sanctuary Cities – जैसे कैलिफ़ोर्निया में ICE को काम ही नहीं करने दिया जाता। Sanctuary Cities को आप ऐसे ही समझ सकते हैं – जैसे कोई पार्क या जंगल – जहाँ हर तरह के पक्षी-पशु आकर बस जाते हैं। कोई शिकारी या सुरक्षा गार्ड उन्हें रोकने नहीं आता। बल्कि वहाँ के स्थानीय रेंजर (यानी लोकल सरकार) खुद ही कहती है, “हम इन्हें नहीं निकालेंगे, ये यहीं रहेंगे।” इसका नतीजा ये होता है, कि आज अमेरिका में लाखों ऐसे लोग रह रहे हैं, जिनके पास कोई वैध दस्तावेज़ नहीं है, और इनमें से बड़ी संख्या को डेमोक्रेटिक पार्टी वोट बैंक की तरह देखती है।

जब इन्हें निकालने की बात आती है, तब लोकल सरकार कहती है – “ये लोग व्यवस्था के शिकार हैं, हम इन्हें नहीं छेड़ेंगे।” और ये सब हो रहा है एक “सहानुभूति” और “इंसानियत” की चादर में लपेट कर। ठीक वैसे ही जैसे सांस्कृतिक मार्क्सवाद ने सिखाया था – कि “एक्टिविस्ट वही है, जो व्यवस्था से लड़ रहा है, भले ही वो कानून तोड़ रहा हो।”

अब इसका नतीजा क्या हो रहा है? ये जानने के लिए हमें अमेरिका में डेमोक्रेट्स का वोट बैंक देखना होगा. आज अमेरिका में लाखों अवैध अप्रवासी नागरिक बन चुके हैं। ये वही लोग हैं जो डेमोक्रेटिक पार्टी को मजबूत वोट बैंक देते हैं। साल 2020 में LA काउंटी में बाइडन को 71% वोट मिले, और ट्रंप को सिर्फ 27%.

साल 2024 में ट्रंप ने बढ़त ली, और 31.9% तक आए। लेकिन यहाँ पर डेमोक्रेट्स का पलड़ा अब भी भारी हैं। क्यों? क्योंकि वोटिंग पावर अब “संख्याबल” से आती है, नीतियों से नहीं। क्यों? क्योंकि लाखों अवैध अप्रवासी जिन्हें ओबामा और उनके पहले के या बाद के डेमोक्रेट सरकारों ने नागरिकता दी – आज वही डेमोक्रेट्स की एक मजबूत वोट बैंक हैं।

इसे आप भारत के उन हिस्सों से मिलकर देखिए, जहाँ मुस्लिम आबादी आज बहुसंख्यक है और कौन जीतेगा और कौन हारेगा, ये उनके वोट पर निर्भर करता है – और इसका उदाहरण है – उत्तराखंड का बनभुलपुरा, दिल्ली की सीलमपुर, पश्चिम बंगाल की सीमाएँ।

सब जगह एक ही पैटर्न है, एक ही चीज कॉमन है -और वो है अवैध प्रवासियों की समस्या! अब सोचिए भारत की स्थिति।

हम दुनिया और एशिया महाद्वीप की भी सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं। हमारे चारों तरफ़ बसे देश- पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार। या तो आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं या राजनीतिक रूप से अस्थिर।

इसका मतलब साफ़ है; प्रवासन का अगला टारगेट भारत है।

यूएन का अनुमान है कि 2060 तक भारत की जनसंख्या 166 करोड़ हो सकती है। अब पाकिस्तान की जनसँख्या देखिये, जो वर्तमान में लगभग 24 करोड़ है और अनुमान है कि साल 2075 तक 46 करोड़ से अधिक हो जाएगी।  लेकिन  वहां रोजगार, शिक्षा, और संसाधनों की भारी कमी। 

अब सोचिए; इतनी आबादी, लेकिन पाकिस्तान के पास न पैसे हैं, न नीति है, न रोजगार है। ऐसे में क्या होगा? ये लोग सोचेंगे कि ठिकाना बदलते हैं – और सबसे नज़दीकी और सुरक्षित देश कौन सा है? सिर्फ और सिर्फ भारत। और प्रोग्रेसिव वामपंथियों की वो थ्योरी तो आपने सुनी ही होंगी जिनमें वो समय समय पर अपनी सुविधा के अनुसार कहते हैं कि दुनिया की कोई बाउंड्री नहीं होती हैं। और इन्हें ये अधिकार है कि ये किसी भी देश में घुसें और उनके संसाधनों का दोहन करें। अब सोचिए कि ये लोग दूसरे पड़ोसी देशों को छोड़कर भारत क्यों आएँगे? यहां इन्वेस्टमेंट है। शिक्षा की व्यवस्था है। रोज़गार है सेफ्टी है। और सबसे ज़रूरी बात, विविधता के लिए स्पेस है

चाहे इंटरनेशनल प्रॉपगैंडा कोई भी हैशटैग चलाए कि भारत में लोग सुरक्षित नहीं हैं – लेकिन सच्चाई ये है कि भारत दुनिया का शायद सबसे टॉलरेंट देश है। हर धर्म, हर जाति, हर मानसिकता, भारत सबको जगह देता है। वरना चीन भी एशिया में ही आता है और आप खुद सोचिये कि वहां पर जरा सी भी आवाज बुलंद करने वालों के साथ क्या होता है।

अब आप कहेंगे, प्रवासी आ भी गए तो दिक्कत क्या है? दिक्कत तब शुरू होती है जब इनका रिकॉर्ड नहीं होता। ये घुसपैठ करके अपने गुट बनाते हैं। और फिर एक वक्त ऐसा आता है जब प्रशासन भी कुछ नहीं कर पाता – यानी ठीक वैसा ही , जैसा मैंने सांस्कृतिक मार्क्सवाद  का पैटर्न बताया।

इस बारे में यहाँ पर थोड़ा सा और जान लीजिए। साल 1960 के दशक में सांस्कृतिक मार्क्सवाद के विचारों से प्रभावित छात्रों ने अमेरिका और फ्रांस में छात्रों का बड़ा आंदोलन खड़ा किया।

बाद में उन्होंने यूनिवर्सिटीज, स्कूलों और मीडिया में घुसपैठ की। उनका टारगेट था– शिक्षक। कारण? “अगर शिक्षक बदल गया, तो पूरी पीढ़ी बदल जाएगी।” यही मॉडल आज भारत में दोहराया जा रहा है- जहाँ शिक्षा, मीडिया और न्याय के मंचों पर एक ही नैरेटिव फैलाया जा रहा है- “कानून तोड़ने वाला पीड़ित है, और कानून लागू करने वाला फासीवादी।”

CAA विरोधी दंगों में यही नैरेटिव चला। हर्ष मंदर ने कहा, “अब न्याय सड़कों पर मिलेगा।” और सचमुच, दिल्ली की सड़कों पर आग लगी। तो क्या आप अब अमेरिका के लॉस एंजेल्स से इन घटनाओं को जोड़ पा रहे हैं?

अब बड़ा सवाल – क्या भारत के पास ICE जैसी कोई एजेंसी है?

इसका जवाब है “नहीं।” आज भारत में अवैध प्रवासियों की निगरानी के लिए कोई सेंट्रलाइज्ड एजेंसी नहीं है। NIA और CBI जैसे संस्थान राज्यों की अनुमति से काम करते हैं… और बंगाल जैसे राज्य तो उन्हें घुसने भी नहीं देते। तो सोचिए, अगर कल कोई दंगा हुआ या किसी शहर में आतंकी हमले की साज़िश पकड़ी गई, तो कौन जिम्मेदार होगा?

ऑपरेशन सिंदूर के बाद से देश के अलग अलग हिस्सों में पाकिस्तानी जासूस निकल रहे हैं, रूस में ट्रक में ड्रोन भरकर बिछा दिया था और मुंबई वाला उदाहरण तो आपको पता होना ही चाहिए – यहाँ ठाणे के पडघा में अगर पुलिस  साकिब नाचन के ठिकानों पर छापा न मारती तो 2.5 फ्रंट तो कबसे बारूद और हथियार बना रहा था और मुंबई हमलों को दोहराने की तैयारी में लगा था। सरकार लम्बे समय से राज्यों की पुलिस से बोलते जा रहे थे कि रोहिंग्या निकालो लेकिन किसी ने काम नहीं किया।  दो चार दिन ड्राइव चलती है, फिर सब सो जाते हैं।

अगर लॉस एंजेल्स को आज इस तरह से जलाया जा रहा है तो कल के दिन इनके लिए भारत के अलग अलग शहरों को इसी तरह से जला देना कौनसी बड़ी बात है? और भारत में मोहब्बत का कैरोसीन बाँटने वालों ने इसे कई बार कई बहनों से जलाया भी है- चाहे तो आप दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों का उदाहरण देख सकते हैं- वो दंगे भी तो नागरिकता के नाम पर बन रहे कानून के लिए भड़काए गए थे। 

इसलिए जरूरत है- एक नई राष्ट्रीय एजेंसी की,  जो Bureau of Immigration (BoI) के साथ को-ऑर्डिनेट करे
– डिटेंशन से लेकर डिपोर्टेशन तक पूरा प्रोसेस मैनेज करे
– और ये संस्था राज्यों की राजनीतिक सीमाओं से ऊपर हो

और मजे की बात देखिए- एमनेस्टी इंटरनेशनल ने तो विश्व शरणार्थी दिवस से पहले ही एक बयान में कह दिया है कि भारतीय सरकार को तुरंत सभी रोहिंग्या पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की देश से निकाले जाने की प्रक्रिया (निर्वासन) को रोक देना चाहिए, उन्हें शरणार्थी के रूप में मान्यता देनी चाहिए और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत उन्हें सम्मान और सुरक्षा देनी चाहिए। यानी, कम से कम इन्हें तो अपनी प्राथमिकताएं अच्छी तरह से पता हैं। 

आज अगर हम इस खतरे को नहीं पहचानेंगे तो कल भारत के शहर भी वही हालत भुगतेंगे जो आज लॉस एंजेलेस भुगत रहा है। आप सोचिए, जब आज हम हाईवे बना रहे हैं, तो लोग परेशान होते हैं। सड़कें बंद होती हैं, ट्रैफिक रुकता है, धूल उड़ती है। लेकिन ये दिक्कतें क्यों हो रही हैं? क्योंकि 30 साल पहले किसी के पास विज़न ही नहीं था कि ये बनाना चाहिए। 

अगर तब सोच लिया होता, तो आज समस्या इतनी बड़ी न होती। वैसे ही अगर आज अवैध प्रवासन को लेकर एक संस्थागत विज़न नहीं बना, तो कल ये समस्या बेकाबू हो जाएगी।

हम ये विषय इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि हाल ही में सोशल मीडिया पर राष्ट्रवादियों ने कावेरी इंजन का टॉपिक उठाया  था- अब खुद गृहमंत्री और रक्षा मंत्री ने इस पर विचार करने की बात कहीं है – तो अब एक ऐसी ही नई मुहिम, जिसकी जरूरत है उसका नाम Illegal Free India  होना चाहिए । 

आप ये वीडियो शेयर करें, अपने सांसदों को टैग करें, और पूछें कि “अगर अमेरिका के पास ICE है, तो भारत के पास क्यों नहीं?” और जब कोई ये कहे कि ये सब “अमानवीय” है, तो याद रखिए कि कानून का पालन ही मानवता है और अव्यवस्था से ज्यादा अमानवीय चीज़ कुछ नहीं हो सकती। 

एक केंद्रीय जिम्मेदार संस्था का होना क्यों आवश्यक है उसकी वजह ये हैं कि हर बार जब भी अवैध प्रवासियों को पकड़ने या चिह्नित करने की बारी आती है तो संस्थाओं की आपसी फुटबॉल शुरू हो जाती है।

आज ही मान लीजिए गृह मंत्रालय किसी स्टेट से कि कहता है कि उन्हें अवैध प्रवासियों की डिटेल्स भेजे, तो सभी एक दूसरे का मुँह देखने लगेंगे, टाल मटोल करते हुए पुलिस वाले थोड़ी बहुत कार्रवाई करेंगे और कुछ दिन बाद चुप हो जाएँगे, दूसरी संस्थाएं कहेंगी कि ये तो उनका काम ही नहीं है और ऐसे में ये सब ठन्डे में चला जाएगा क्योंकि सभी की जिम्मेदारी मतलब किसी की भी जिम्मेदारी नहीं।

इसलिए जरुरी है कि केंद्र सरकार एक ऐसी ठोस संवैधानिक बॉडी तैयार करे, जिसका सिर्फ और सिर्फ यही काम हो – अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर का रास्ता दिखाना। क्यूँकि भारत सिर्फ भारतीयों का है और भारतीयों के लिए है, अवैध घुसपैठियों के लिए नहीं।

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