आजकल अक्सर लोग पूछते हैं कि अमेरिका के तो दुनिया भर में 700 से ज्यादा बड़े-बड़े मिलिट्री बेस हैं, जहां अमेरिका के हजारों सैनिक रहते हैं, और उनके एयरप्लेन्स और नेवी भी हमेशा तैनात रहती है। अमेरिका के ये मिलिट्री बेस यह दर्शाते हैं कि वह कितना ताकतवर है। तो यहीं से एक सवाल उठता है कि क्या भारत के भी ऐसे सैन्य ठिकाने विदेशों में मौजूद हैं?
सबसे पहले एक बात साफ कर दूं, भारत के पास अमेरिका, चीन या रूस जैसे पूरी तरह से स्थापित सैन्य बेस नहीं हैं। इसका मतलब यह हुआ कि ऐसा नहीं है कि किसी विदेशी जमीन पर भारत का झंडा लगा हो, वहां हमारे हजारों सैनिक तैनात हों और वह जगह पूरी तरह से भारत के नियंत्रण में हो। हमारी रणनीति ही अलग है। हम गुटनिरपेक्ष यानी नॉन-अलाइन्ड रहते हैं, जिसका मतलब है कि हम किसी एक देश के साथ पूरी तरह गुटबाजी नहीं करते। हमारा मुख्य ध्यान सिर्फ अपनी सुरक्षा पर है, विशेषकर हिंद महासागर की सुरक्षा पर, जहां चीन लगातार अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।
साल 2002 में ताजिकिस्तान का फरखोर या आयनी एयरबेस भारत का पहला पूर्ण विदेशी एयरबेस बना था। यह अफगानिस्तान के नजदीक था, इसलिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण भी था। भारत ने वहां रनवे का निर्माण कराया और जरूरी सुविधाएं विकसित कीं। लेकिन साल 2022 में इसकी लीज खत्म हो गई और ताजिकिस्तान ने इसे आगे बढ़ाने से मना कर दिया। इसके बाद धीरे-धीरे 2023 तक भारत ने अपने उपकरण और कर्मियों को वापस बुलाना शुरू कर दिया और अक्टूबर 2025 तक भारत वहां से पूरी तरह बाहर आ गया। अब वहां हमारा कोई नियंत्रण नहीं बचा है। यह भारत का एकमात्र पूर्ण सैन्य बेस था, जो अब नहीं रहा।
तो फिर अब हमारे पास विदेशी जमीन पर क्या है? हमारे पास रणनीतिक रूप से बेहद उपयोगी छोटी-छोटी सुविधाएं हैं, जो ज्यादातर हिंद महासागर क्षेत्र में स्थित हैं। इनमें मुख्य रूप से रडार स्टेशन, लिसनिंग पोस्ट यानी सुनने वाले केंद्र और जहाजों के रुकने के ठिकाने शामिल हैं।
मॉरिशस के अगालेगा द्वीप पर साल 2024 में एक नई एयरफील्ड और जेटी का निर्माण पूरा हुआ है। यहां तीन किलोमीटर लंबा रनवे बनाया गया है, जिसे भारत के सहयोग और निवेश से तैयार किया गया है। वहां आधुनिक रडार भी लगाए गए हैं, जहां भारतीय नौसेना के जहाज और छोटे विमान रुक सकते हैं। हालांकि यह पूरी तरह से भारत का सैन्य बेस नहीं है, लेकिन इससे हमारी नौसेना को बहुत बड़ी रणनीतिक मदद मिलती है।
सेशेल्स के असम्प्शन द्वीप पर भी भारत का रडार स्टेशन और अन्य सैन्य सुविधाएं मौजूद हैं। इसके साथ ही वहां 6 अलग-अलग जगहों पर कोस्टल रडार लगाए गए हैं। इसकी मदद से समुद्री लुटेरों, अवैध रूप से मछली पकड़ने वाले जहाजों और चीनी नौसेना की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने में मदद मिलती है।
मेडागास्कर के उत्तरी हिस्से में साल 2007 से भारत का एक लिसनिंग स्टेशन और रडार काम कर रहा है। यह केंद्र हिंद महासागर में जहाजों की आवाजाही पर लगातार निगरानी रखता है।
ओमान के रास अल हद्द में भी भारत की एक लिसनिंग पोस्ट सक्रिय है। इसके अलावा ओमान के मस्कट और दुकम पोर्ट पर भारतीय युद्धपोत रुक सकते हैं, जहां उन्हें ईंधन लेने और मरम्मत कराने की सुविधा मिलती है।
मालदीव और श्रीलंका, दोनों ही पड़ोसी देशों में भारत ने समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कोस्टल रडार सिस्टम स्थापित किए हैं।
वहीं पड़ोसी देश भूटान में ‘IMTRAT’ यानी इंडियन मिलिट्री ट्रेनिंग टीम सालों से भूटानी सेना को ट्रेनिंग देने का काम कर रही है।
इन सब के अलावा, भारत के पास ईरान के चाबहार पोर्ट में लॉजिस्टिक्स एक्सेस मौजूद है। सिंगापुर के चांगी नेवल बेस पर भी हमारे जहाजों को रुकने की सुविधा मिली हुई है। वहीं अमेरिका के साथ भारत का ‘LEMOA’ समझौता है, जिसके तहत जरूरत पड़ने पर दोनों देश एक-दूसरे के सैन्य बेसों से साजो-सामान और ईंधन संबंधी मदद ले सकते हैं।
अब सवाल यह आता है कि आखिर भारत बड़े सैन्य बेस बनाने के बजाय यह रणनीति क्यों अपनाता है?
इसकी वजह यह है कि भारत की समुद्री सीमा लगभग साढ़े सात हजार किलोमीटर लंबी है और हमारा 90% व्यापार समुद्र के रास्ते ही होता है। चीन इस क्षेत्र में भारत को घेरने के लिए ‘String of Pearls’ रणनीति पर काम कर रहा है, जिसके तहत वह ग्वादर, हम्बनटोटा और जिबूती जैसे स्थानों पर अपने बेस बना रहा है। भारत इसका जवाब अपनी ‘Necklace of Diamonds’ रणनीति से दे रहा है। लेकिन हम चीन की तरह बड़े सैन्य बेस बनाने के बजाय मित्र देशों के साथ साझेदारी को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसा करने के पीछे मुख्य वजह है आर्थिक बचत और यह संदेश देना कि भारत किसी की जमीन पर कब्जा नहीं करना चाहता।
भारत का रक्षा बजट अमेरिका की तुलना में बहुत कम है। इसलिए हम दुनिया भर में विशाल बेस बनाकर संसाधन खर्च करने के बजाय सिर्फ रणनीतिक रूप से जरूरी जगहों पर निगरानी रख रहे हैं, ट्रेनिंग दे रहे हैं और रडार लगा रहे हैं। कम खर्च में अधिकतम सुरक्षा सुनिश्चित करना ही हमारी ताकत है, जिसे स्मार्ट पावर कहा जाता है।
आखिर में, भले ही हमारे पास अमेरिका की तरह 800 मिलिट्री बेस न हों, लेकिन हम अपनी समुद्री सुरक्षा को पूरी तरह से मजबूत कर रहे हैं। जब भी देश की सुरक्षा पर कोई आंच आएगी, हम अपने मित्र देशों के सहयोग से उसका सामना करने के लिए तैयार हैं। यही भारत का अपना और सबसे कारगर तरीका है।





