Kashmiri Pandits Block Highway in Jammu

19 जनवरी 1990 से आज तक… कश्मीरी पंडितों की अलग केंद्रशासित प्रदेश की मांग, जम्मू में हंगामा

Summary
36 साल पहले इसी दिन हजारों कश्मीरी पंडित परिवारों को अपनी जड़ों, अपने घरों और अपने सपनों को छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया था।

1990 के दशक के कश्मीर में हिंदुओं के साथ जो अत्याचार हुए, उसका जिम्मेदार कौन है? हजारों हिंदू मारे गए, महिलाओं और बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ, लाखों हिंदुओं को अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा—मगर उसकी सज़ा किसे मिली? कितने कश्मीरी हिंदू वापस अपनी ज़मीन पर लौट पाए?

जवाब साफ़ है—कोई जिम्मेदार नहीं ठहराया गया, किसी को सज़ा नहीं मिली और बेहद कम हिंदू ही वापस जा पाए। इसी को लेकर कश्मीर में एक आंदोलन चल रहा है। कल कश्मीरी पंडित पलायन की 36वीं बरसी पर जम्मू–श्रीनगर हाईवे को लंबे समय तक जाम रखा गया।

उपराज्यपाल के आने के बाद लोगों ने हाईवे खाली किया। यह आंदोलन पनुन कश्मीर नाम की संस्था चला रही है। इनकी माँग है कि सबसे पहले 1990 के दशक में हुए पलायन को केवल विस्थापन नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नरसंहार के रूप में देखा जाए। उन्हें आधिकारिक तौर पर नरसंहार पीड़ित के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। इसके लिए उनकी माँग है कि एक एंटी जेनोसाइड बिल लाया जाए और उसके ज़रिए नरसंहार के गुनहगारों को सज़ा दी जाए।

इसी क्रम में साल 2019 में Panun Kashmir Genocide and Atrocities Prevention Bill 2020 का ड्राफ्ट इस संस्था की ओर से जारी कर उसकी प्रतिलिपि केंद्र सरकार को भेजी गई थी। इसका मूल उद्देश्य यह था कि जिन लोगों ने उस समय कश्मीरी हिंदुओं के साथ अत्याचार किए थे, उन्हें जेल की सज़ा मिले। इसमें एक मुख्य माँग यह भी है कि कश्मीर डिवीजन के सभी हिंदू धार्मिक स्थलों के सामान्य मामलों का प्रबंधन इस बिल के प्रावधानों के अनुसार एक गवर्निंग बोर्ड द्वारा किया जाए।

इसके अलावा इनकी माँग है कि कश्मीरी हिंदुओं के लिए एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाए। उनका तर्क है कि इसके बिना कश्मीर में हिंदुओं की ससम्मान वापसी संभव नहीं है।

दरअसल, केंद्र सरकार द्वारा लगातार कश्मीर से विस्थापित हिंदुओं की वापसी को लेकर प्रयास किए जा रहे हैं। केंद्र सरकार की ओर से कई विशेष राहत पैकेज दिए गए हैं और करीब 6000 ट्रांजिट आवास भी बनाए गए हैं। लेकिन 1990 के दशक में वहाँ मुसलमानों द्वारा किए गए अत्याचारों की स्मृतियाँ इतनी भयावह हैं कि आज भी उनमें डर बना हुआ है। उनका कहना है कि आज की केंद्र सरकार तो उन्हें बचा सकती है, लेकिन आने वाले भविष्य को लेकर वे आश्वस्त नहीं हैं।

अब देखने वाली बात यह है कि सरकार इस मुद्दे को लेकर आगे क्या कार्यवाही करती है।

Editorial team:
Production team:

More videos with Anurag Mishra as Anchor/Reporter