आज हम बात करेंगे एक ऐसी रिपोर्ट की, जो भारत में हेट स्पीच यानी नफरती भाषण को लेकर काफी हंगामा मचा रही है। ये रिपोर्ट अमेरिका के वॉशिंगटन से आई है, एक NGO ने जारी की है, नाम है “Centre for the Study of Organised Hate”, या शॉर्ट में CSOH। रिपोर्ट का टाइटल है “हेट स्पीच इवेंट्स इन इंडिया 2025″।
इसमें दावा किया गया है कि 2025 में भारत में 1318 ऐसे केस रिकॉर्ड हुए, जहां लोग नफरती भाषण दे रहे थे। और चौंकाने वाली बात? इस रिपोर्ट के अनुसार इनमें से 88% मामले BJP शासित राज्यों में हुए, और 98% मुस्लिम्स को टारगेट करते हुए ये नफ़रती बयान दिए गए। साथ ही, 23% स्पीच में हिंसा का आह्वाहन थी, और कुछ में तो हथियार उठाने की बात भी कहीं गई।
अमेरिका से जारी इस रिपोर्ट में आरोप लगाया है कि पिछले सालों से ये संख्या काफी बढ़ी है, खासकर उत्तराखंड के CM पुष्कर सिंह धामी जैसे लीडर्स को हेट स्पीच देने वालों में टॉप पर दिखाया गया है, और योगी आदित्यनाथ के UP में सबसे ज्यादा ऐसे केस दर्ज हुए।
लेकिन, क्या ये रिपोर्ट वाकई निष्पक्ष है? या ये एक तरफा नजरिया पेश कर रही है? चलिए, थोड़ा गहराई से देखते हैं। ये रिपोर्ट कहती है कि हिंदू संगठनों, धार्मिक इवेंट्स, पॉलिटिकल कैंपेन और सोशल मोबिलाइजेशन से जुड़ी बातों को हेट स्पीच माना गया है। लेकिन सवाल ये है – क्या ये वाकई हेट है, या सिर्फ हिंदुओं का अपनी संस्कृति और अधिकारों की रक्षा करने का तरीका? रिपोर्ट UN के फ्रेमवर्क का हवाला देती है, जहां किसी ग्रुप के खिलाफ नेगेटिव या डिस्क्रिमिनेटरी बात को हेट स्पीच कहते हैं। लेकिन यहां समस्या ये है कि ये डेफिनेशन बहुत ब्रॉड है, और इसे सिर्फ एक साइड पर अप्लाई किया गया है।
देखिए, रिपोर्ट की मेथडोलॉजी यानी तरीका खुद biased लगता है। ये मुख्य रूप से हिंदू राइट-विंग ग्रुप्स और पॉलिटिकल फिगर्स को ट्रैक करती है – सोशल मीडिया स्क्रैपिंग, एक्टिविस्ट नेटवर्क्स और सेलेक्टेड मीडिया रिपोर्ट्स से डेटा कलेक्ट करती है। लेकिन क्या ये इस्लामिस्ट ग्रुप्स, जिहादी मौलवियों या हिंदुओं के खिलाफ हिंसा करने वाले संगठनों को उतनी ही नजर से देखती है? नहीं।
ये असिमेट्री है – एक तरफ परमानेंट सर्वेलेंस, दूसरी तरफ इग्नोर। और डेटा कलेक्शन में एक्टिविस्ट्स और जर्नलिस्ट्स का नेटवर्क इस्तेमाल होता है, लेकिन उनकी अपनी आइडियोलॉजी या कन्फर्मेशन बायस को कैसे हैंडल किया जाता है, ये नहीं बताया गया। रिपोर्ट खुद मानती है कि डेटा पूरा नहीं है, और कई इंसिडेंट्स में वेरिफायबल कंटेंट नहीं है। फिर भी, ये बड़े-बड़े क्लेम्स कर रही है।
अब आते हैं स्पेसिफिक मुद्दों पर। सबसे पहले लव जिहाद। रिपोर्ट इसे “बेसलेस कन्स्पिरेसी थियरी” कहकर खारिज कर देती है। लेकिन ग्राउंड पर क्या हो रहा है? ‘Hinduphobia Tracker‘ जैसे प्लेटफॉर्म्स ने 2025 में ही 300 से ज्यादा ऐसे केस डॉक्यूमेंट किए हैं, जहां हिंदू महिलाओं को धोखे से रिलेशनशिप में फंसाया गया, उनकी आईडेंटिटी छिपाई गई, और कन्वर्जन का प्रेशर डाला गया।
ये केस पुलिस कंप्लेंट्स, FIRs, कोर्ट प्रोसीडिंग्स और विक्टिम टेस्टिमोनीज पर बेस्ड हैं। दिसंबर 2025 में अकेले 14 ऐसे केस रिकॉर्ड हुए – भोपाल, बिजनौर, फतेहपुर, पटना जैसे जगहों से, जहां आरोपी ने फेक आईडेंटिटी यूज की, ब्लैकमेल किया, और सेक्शुअल एक्सप्लॉइटेशन किया। लेकिन CSOH ने इन सबको इग्नोर कर दिया, और इनके खिलाफ बोलने वालों को ही हेट स्पीच देने वाला बता दिया। ये कैसे फेयर है? ये तो रियल क्राइम्स को डिसमिस करके रेस्पॉन्स को क्रिमिनलाइज कर रहा है।
फिर शौर्य दिवस का मसला भी आता है। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी के विवादित ढाँसे के डेमोलिशन को याद करने वाले इवेंट्स को भी ये रिपोर्ट हेट स्पीच कहती है। लेकिन हिंदुओं के लिए ये शौर्य दिवस है – सिविलाइजेशनल सेल्फ-रिस्पेक्ट का सिंबल।
ये एक लंबे हिस्टोरिकल और लीगल डिस्प्यूट का हिस्सा था, जो कोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष में सॉल्व किया, और वहां भव्य श्रीराम मंदिर बना। रिपोर्ट इसे हिंसा की धमकी से जोड़ती है, साथ ही हिस्टोरिकल इंटरप्रिटेशन को क्रिमिनलाइज कर रही है। क्या ताज महल को ‘सिंबल ऑफ लव’ कहना ठीक है, लेकिन बाबरी को हिस्टोरिकल सब्जुगेशन का सिंबल मानना गलत? क्या ये हिंदुओं के आराध्य पर जबरन अधिकार स्थापित करने का मामला नहीं कहा जाएगा? ये डबल स्टैंडर्ड है, जहां हिंदुओं को अपनी हिस्ट्री को अपनी नजर से देखने का स्पेस नहीं दिया जा रहा।
इसी तरह, क्रिश्चियन मिशनरी कन्वर्जन के खिलाफ विरोध को भी हेट स्पीच बता दिया गया। रिपोर्ट लॉ-फुल प्रोटेस्ट्स, अवेयरनेस कैंपेन्स और warnings को एंटी-क्रिश्चियन हेट कहती है, लेकिन कन्वर्जन के तरीकों – जैसे दबाव बनाना, फॉरेन फंडिंग, या धर्मांतरण विरोधी क़ानूनों की अनदेखी पर कुछ नहीं कहती।
दिसंबर 2025 में ही ऑपइंडिया ने कम से कम 5 केस रिपोर्ट किए – फतेहपुर, नडियाड, श्री गंगानगर जैसे जगहों से, जहां पुलिस ने लव जिहाद के आरोपित जिहादी दबाव और इंटिमिडेशन के आरोप में अरेस्ट किए। ये FIRs और इन्वेस्टिगेशंस पर बेस्ड हैं, लेकिन CSOH ने इन्हें इग्नोर कर दिया, और विरोध करने वालों को ही विलेन बना दिया।
यहाँ तक कि हिंदुओं की झाँकी और शोभायात्राओं तक को इन्होंने Organised Hate Ecosystem नाम दिया हुआ है। जबकि ये सभी संवैधानिक और धार्मिक यात्राएँ या कार्यक्रम होते हैं।
अब सवाल ये है – इस रिपोर्ट को जारी करने वालों के पीछे कौन है? तो इसका जवाब है रकीब हमीद नाइक। ये इस CSOH का फाउंडर है, जो इंडिया हेट लैब और हिंदुत्वावॉच नाम के अकाउंट भी चलाता है। वो अमेरिका से ऑपरेट करता है, और Bard College, UC Berkeley जैसे जगहों से असोसिएटेड है।
न्यूयॉर्क टाइम्स, Al Jazeera, CNN जैसे पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने इस आदमी को कई बार जगह दी है। लेकिन वो आख़िर में एक इस्लामिस्ट है, और उसका X अकाउंट भारत में मिसइनफॉर्मेशन फैलाने के लिए विथहेल्ड है।
Disinfo Lab की एक रिपोर्ट में हिंदुत्वावॉच को पाकिस्तान-बेस्ड प्रोपगैंडा नेटवर्क्स से लिंक्स का आरोप लगा है। वो हिंदू लीडर्स जैसे T राजा सिंह, काजल हिंदुस्तानी को टारगेट करता है, उनके स्टेटमेंट्स को तोड़ मरोडकर पेश करता है। यहां तक कि कश्मीर फाइल्स फिल्म पर वो विक्टिम कार्ड खेलता है, और कश्मीरी हिंदुओं के जेनोसाइड को deny करता है।
अब संयोग देखिए- इस जिहादी की लेटेस्ट हेट स्पीच वाली रिपोर्ट को 17 जनवरी को कर्नाटक के कांग्रेस MLA प्रियांक खड़गे ने सोशल मीडिया पर शेयर किया, और दावा किया कि ज्यादातर हेट स्पीच BJP स्टेट्स से हैं, जो माइनॉरिटीज को टारगेट करते हैं। और ये सब ऐसे समय में, जब कर्नाटक सरकार ने हेट स्पीच एंड हेट क्राइम्स (प्रिवेंशन) बिल 2025 पास किया है।
इस बिल के खड़गे और CM सिद्धारमैया जैसे समर्थक कहते हैं कि ये कम्यूनल फ्लेयर-अप्स रोकने का सुप्रीम कोर्ट के ऑब्जर्वेशंस पर बेस्ड लॉन्ग-टर्म विजन है,। लेकिन BJP इसे “काला कानून” कहती आई है – कारण ये है कि ये एक ड्रैकोनियन टूल है, जो 2028 इलेक्शंस से पहले हिंदू एक्टिविस्ट्स और ऑपोजिशन लीडर्स को टारगेट करेगा। ये कर्नाटक सरकार के ख़िलाफ़ जायज़ मांगों और जरूरी विरोध को या ये कहिए कि डेमोक्रेटिक क्रिटिसिज्म को क्रिमिनलाइज करने की कांग्रेसी योजना है।
तो कुल मिलाकर ये CSOH रिपोर्ट क्या चीज है? ये न्यूट्रल रिसर्च नहीं, सिर्फ़ और सिर्फ़ Narrative Building है।
जहां कन्क्लूजन पहले डिसाइड कर लिया जाता है, और डेटा को उसी हिसाब से अरेंज किया जाता है। रियल क्राइम्स और विक्टिम्स को इग्नोर करके, लीगल रूप से सही स्पीच और हिंदू रेस्पॉन्स को हेट बना दिया गया है। और मीडिया – जैसे The Quint, Alt News, The Wire इसे एम्प्लिफाई करते हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि ये हिंदू विरोधी रिपोर्ट एक आइडियोलॉजिकल लेंस से फिल्टर्ड है। हमें ऐसे रिपोर्ट्स को क्रिटिकली देखना चाहिए, ताकि सच्चाई छिपी हुई ना रह जाए।




