27 सेकंड का एक वीडियो, 2 मिलियन व्यूज़ और 40 साल के एक इंसान की आत्महत्या। और मैं कह रहा हूँ कि अगर आप बस या मेट्रो से सफ़र करते हैं, तो साइबर ट्रायल के नतीजे की यही कहानी आपकी भी हो सकती है।
तो कहानी यूँ है—
केरल में चालीस साल के दीपक एक टेक्सटाइल फर्म में काम करते थे। काम के सिलसिले में वे सरकारी बस से कन्नूर में ट्रैवल कर रहे थे। उसी बस में एक और महिला होती है, नाम होता है शिम्जिता मुस्तफा। बस में जगह नहीं थी, लोग एक-दूसरे से सटकर खड़े थे। इसी दौरान मुस्तफा ने वीडियो बनानी शुरू कर दी। शायद दीपक को अंदाज़ा नहीं था कि यह वीडियो क्या करने वाला है।
रील वायरल हो गई। 20 लाख व्यूज़ आ गए। दीपक ने भी वह वीडियो देखी। उन्हें समझ नहीं आया कि इस वीडियो में मैं क्या कर रहा हूँ, मैंने क्या गलती की है। लेकिन उस वीडियो का मक़सद और वीडियो के नीचे के कमेंट्स उन्हें दुराचारी साबित कर रहे थे।
मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ मुस्तफा ने उस वीडियो में दिखाने की कोशिश की थी कि दीपक ने जानबूझकर उसे ग़लत तरीके से छुआ था। जबकि कोई भी पुरुष, महिला या जेंडर-न्यूट्रल इंसान अगर सामान्य बुद्धि के साथ इस वीडियो को देखेगा, तो उसे साफ़ पता नहीं चलेगा कि क्या ग़लत हो रहा है। वह ज़रूर सोचेगा—अगर ग़लत हो रहा था तो मुस्तफा मुस्कुरा क्यों रही थी? अगर ग़लत हो रहा था तो उसने विरोध क्यों नहीं किया?
ये हमारे-आपके मन में उठने वाले सवाल हैं। लेकिन अपने आप को एक ऐसे वायरल वीडियो में पाकर दीपक के मन में जो सवाल उठे होंगे—उन्हीं सवालों ने दीपक की जान ले ली। उन्होंने ख़ुद को एक कमरे में बंद किया और फाँसी के फंदे पर लटककर आत्महत्या कर ली।
मुस्तफा नाम की इस महिला ने मौत के हथियार बने उस वीडियो को अब डिलीट कर दिया है। जिस टॉक्सिसिटी के ज़रिए उसने दीपक की जान ली, जब उसकी अकाउंटिबिलिटी की बात आई तो उसने अपना अकाउंट ही बंद कर दिया।
अगर मैं किसी वर्डिक्ट पर पहुँचना चाहूँ, तो बिल्कुल इनकार नहीं करूँगा कि इसमें कोई संदेह नहीं—महिलाओं के लिए बाहर निकलना पुरुषों से अधिक चैलेंजिंग है। लेकिन यह इंगेजमेंट-फार्मिंग के दौर का अपने किस्म का एक अलग मामला है। यह केस महिलाओं से अधिक पुरुषों के लिए बाहर निकलना चैलेंजिंग बना रहा है।
कोई भी महिला किसी रैंडम एंगल से किसी रैंडम पुरुष का वीडियो बनाकर अगर उस पर रैंडम आरोप लगाए कि इसने मेरे साथ व्यभिचार किया, तो उस महिला से कोई सवाल किए बिना यह सर्टिफिकेट दे दिया जाएगा कि हाँ, यह तो व्यभिचारी होगा ही।
मीडिया ट्रायल तो सभी ने सुना था, मगर अब यह इंगेजमेंट-फार्मिंग ट्रायल का दौर है। यही हमारी सभ्यता का इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा हासिल है।





