25 जून 1975 की रात, दिल्ली के बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर स्थित कई इमारतों की बिजली काट दी गई। उन इमारतों से इंडियन एक्सप्रेस, स्टेट्समैन और जनसत्ता जैसे देश के बड़े-बड़े अख़बार छप कर निकलते थे।
अख़बारों की बिजली काटने का सबसे बड़ा कारण यह था कि उसी रात इंदिरा गाँधी ने देश में आपातकाल लगा दिया था और वह नहीं चाहती थीं कि देश के लोगों को कोई भी सरकार विरोधी खबर पता चले। देश की राजधानी में दो दिन तक कोई भी बड़ा अख़बार प्रकाशित नहीं हुआ। दो दिन बाद 28 जून को अख़बार छापने की इज़ाज़त दी गई, लेकिन तब तक समाचार पत्रों को सेंसर कर दिया गया था। मीडिया को केवल वही छापने की अनुमति थी, जो सरकार छपवाना चाहती थी।
भारत की आज़ादी की लड़ाई में जिस प्रेस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, आज़ादी के केवल तीस वर्षों के भीतर उसी प्रेस को कांग्रेस ने अपने सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
प्रेस पर पहरा और दमन
जिन लोगों और संस्थाओं ने सरकार के सामने घुटने नहीं टेके, उन्हें यातनाएँ दी गईं। समाचार पत्र तब तक नहीं छपते थे जब तक कांग्रेस मुख्यालय से उस सामग्री को छापने की अनुमति नहीं मिलती थी। और अगर बिना सेंसर किए अख़बार छपते थे तो फिर संपादकों और मालिकों को उसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ता था। स्टेट्समैन अख़बार को तो सिर्फ़ इसलिए सज़ा दी गई, क्योंकि उसने पहले पन्ने पर पर्याप्त मात्रा में इंदिरा गाँधी की तस्वीरें नहीं छापी थीं।
सरकारी दमन केवल मीडिया तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि जिन लोगों ने भी इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी के विरुद्ध आवाज़ उठाई, उन्हें इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ा।
नेताओं और कार्यकर्ताओं पर यातनाएँ
जॉर्ज फर्नांडिस के भाई लॉरेंस फर्नांडिस को आधी रात को पुलिस ने जॉर्ज फर्नांडिस के बारे में पूछताछ करने के लिए उठा लिया। उन्हें हिरासत में लेकर कई दिनों तक डंडे, बेंत, बरगद की जड़ों और न जाने किन-किन वस्तुओं से पीटा गया। कई दिनों तक किसी से उन्हें मिलने नहीं दिया गया। लगभग दो हफ़्ते बाद जब उन्हें छोड़ा गया तो उनका वज़न 22 किलो तक कम हो चुका था।
एक किस्सा तत्कालीन छात्र नेता और आज के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का भी है। उन्हें आपातकाल के दौरान जेल में बंद कर दिया गया और इस सदमे में जब उनकी माताजी की मृत्यु हो गई तो दाह संस्कार और तेरहवीं जैसे क्रियाकर्म के लिए भी उन्हें जेल से रिहा नहीं किया गया।
तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन के करीबी चोकलिंगा चित्तिबाबू को पुलिस ने गिरफ्तार कर तब तक यातना दी, जब तक वह मर नहीं गए। यातना किसलिए दी गई? केवल स्टालिन के बारे में जानकारी देने के लिए। चित्तिबाबू ने प्राण गँवा दिए लेकिन मुँह नहीं खोला। विडंबना देखिए, आज वही स्टालिन उसी कांग्रेस के साथ खड़े हैं जिसने चित्तिबाबू को मौत के घाट उतार दिया।
उस समय के छात्र नेता हेमंत कुमार विश्नोई को सिर्फ़ इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि उन्होंने इंदिरा गाँधी की आलोचना कर दी थी। उन्हें हिरासत में लेकर उल्टा लटकाकर पीटा गया। उनके तलवों को मोमबत्ती से जलाया गया। उनकी नाक और गुदाद्वार में मिर्च पाउडर डाला गया।
गर्भवती महिलाओं तक पर अत्याचार
गर्भवती महिलाओं को भी नहीं छोड़ा गया। नारसम्मा नाम की एक महिला को 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस के दिन सरकार के ख़िलाफ़ बोलने पर गिरफ्तार किया गया। वह गर्भवती थी। प्रसव के समय जब उसे अस्पताल में ले जाया गया, तब भी उसके पैरों को लोहे की ज़ंजीरों से बाँधा गया था।
नसबंदी अभियान और खौफ़
आपातकाल का प्रकोप केवल असहमति को दबाने तक ही नहीं रहा, बल्कि कई दूसरे उद्देश्यों के लिए भी हुआ। संजय गाँधी के आदेश पर पूरे देश में नसबंदी अभियान चलाया गया। जबरदस्ती लोगों को पकड़-पकड़ कर उनकी नसबंदी कर दी जाती थी।
पुलिस जबरदस्ती युवाओं को उठा ले जाती थी और उनकी नसबंदी करवा देती थी। लोग डर के मारे घर से दूर खेतों में सोना शुरू कर देते थे। इतना खौफ़ तो किसी ज़माने में डाकुओं का भी नहीं था। सुल्तानपुर ज़िले में जब लोगों ने नसबंदी का विरोध किया तो पुलिस ने उन पर गोलियाँ चला दीं, जिससे 13 लोगों की जान चली गई।
गुड़गाँव में एक युवक अपने परिवारवालों को समझा रहा था कि नसबंदी न कराएँ, तो उसे पुलिस उठा ले गई। हिरासत में उसके बाल और नाख़ून नोच लिए गए और एक महीने बाद जब वह जेल से वापस आया, तब उसकी सुनने की क्षमता भी समाप्त हो चुकी थी।
पी. राजन नामक एक इंजीनियरिंग छात्र को पुलिस ने बिना किसी ठोस आरोप के उठा लिया। उसका शव आज तक नहीं मिला।
जनता का संघर्ष
ऐसी नारकीय यातनाएँ लोगों ने आपातकाल के दौरान सही. ….सिर्फ़ इस उम्मीद में कि इस देश का लोकतंत्र बचेगा, यह देश दोबारा लड़ेगा। लोगों ने यातनाएँ सहीं, लेकिन सिर नहीं झुकाया। क्योंकि उन्हें यक़ीन था, यह देश फिर उठ खड़ा होगा। और यह देश लड़ा भी।



