राहुल गाँधी PM मोदी Operation Sindoor

Operation Sindoor: PM नरेंद्र मोदी पर क्यों दबाव बनाना चाहते हैं राहुल गाँधी?

Summary
Operation Sindoor को लेकर राहुल गाँधी PM मोदी पर दबाव बना रहे हैं कि वे डोनाल्ड ट्रम्प को जवाब दें, लेकिन PM मोदी उनकी राजनीति समझते हैं।

Chapter 1: राहुल गांधी का बयान

बीते दिनों ऑपरेशन सिंदूर पर संसद में हुई चर्चा के दौरान राहुल गांधी का एक बयान लगातार सुर्खियों में रहा। उन्होंने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में डोनाल्ड ट्रम्प का नाम लें। दिलचस्प बात यह है कि जिस समय राहुल गांधी यह मांग कर रहे थे, उसी समय भारत की एक बड़ी ऑयल रिफाइनरी कंपनी अमेरिका की टेक दिग्गज Microsoft के ख़िलाफ़ दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा चुकी थी।

पहली नज़र में ये दोनों घटनाएँ बिल्कुल असंबंधित लगती हैं — एक राजनीतिक बयान और दूसरा एक कॉर्पोरेट-टेक्नोलॉजी विवाद। लेकिन गहराई से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि ये दोनों घटनाएँ एक गहरे रणनीतिक स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

इस पूरे घटनाक्रम को समझने पर यह भी सवाल उठता है कि राहुल गांधी आखिर क्यों बार-बार मोदी को ट्रम्प का नाम लेने की चुनौती दे रहे हैं। यह केवल बयानबाज़ी नहीं है।

राहुल गांधी यह भली-भांति जानते हैं कि भारत इस समय आर्थिक और भू-राजनीतिक स्तर पर अमेरिका से सीधे टकराव की स्थिति में नहीं है। ऐसे में उनका प्रयास भारत को उकसाकर एक ऐसे टकराव की ओर धकेलने का है, जो देश के दीर्घकालिक हितों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

Chapter 2: मोदी की रणनीति — संतुलन, आत्मनिर्भरता और धैर्य

इसके उलट प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका नीति पूरी तरह स्पष्ट और संतुलित रही है। उनका रुख यह है कि भारत न तो किसी के आगे झुकेगा और न ही अनावश्यक रूप से किसी को उकसाएगा। मोदी यह समझते हैं कि जैसे-जैसे भारत का वैश्विक कद बढ़ेगा, वह स्वाभाविक रूप से अमेरिका की नज़र में एक प्रतिस्पर्धी शक्ति के रूप में उभरेगा। इसलिए वे सीधे टकराव के बजाय चुपचाप विकास, रणनीतिक स्वायत्तता और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

भारत भले ही खुलकर अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने की घोषणा न करे, लेकिन BRICS जैसे मंचों पर अपनी भूमिका को मजबूत करना और Global South के नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरना इस बात का संकेत है कि भारत एक वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्था के निर्माण पर शांतिपूर्वक काम कर रहा है।

जब पूरा पश्चिमी जगत अमेरिका के नेतृत्व में रूस पर प्रतिबंध लगा रहा था, तब भारत ने रूस से अपने संबंध नहीं तोड़े। यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का स्पष्ट उदाहरण है।

Chapter 3: रूस का उदाहरण

अमेरिका का वैश्विक वर्चस्व केवल सैन्य या आर्थिक ताकत की वजह से नहीं है, बल्कि दशकों से टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में उसकी सर्वोच्चता इसका सबसे बड़ा आधार रही है। यही कारण है कि अमेरिका पूरी दुनिया को — सिर्फ भारत को ही नहीं — आसानी से दबाव में ले सकता है। यूक्रेन–रूस युद्ध ने यह साफ कर दिया कि टेक्नोलॉजी अब केवल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि एक प्रभावी जियोपॉलिटिकल हथियार बन चुकी है।

Google, Microsoft, Meta और Amazon जैसी कंपनियों ने रूस को अपने प्लेटफॉर्म्स से बाहर कर दिया, सिर्फ इसलिए क्योंकि अमेरिकी सरकार रूस के खिलाफ थी। ये कंपनियाँ भले ही निजी हों, इनके पास न कोई दूतावास है और न ही औपचारिक राजनीतिक अधिकार, फिर भी ये अमेरिकी हितों के अनुरूप काम करती हैं। यह स्थिति बताती है कि टेक्नोलॉजी किस तरह वैश्विक राजनीति का औज़ार बन चुकी है।

Chapter 4: Nyara केस और Tech Sovereignty

यह दबाव केवल रूस तक सीमित नहीं है। भारत में भी हाल ही में ऐसा ही एक मामला सामने आया। जिस समय राहुल गांधी संसद में मोदी पर ट्रम्प का नाम लेने का दबाव बना रहे थे, उसी समय Nyara Energy — भारत की एक बड़ी ऑयल रिफाइनरी कंपनी — दिल्ली हाई कोर्ट पहुंची। आरोप यह था कि Microsoft ने रूस से व्यावसायिक संबंध होने के कारण कंपनी को अचानक ब्लैकलिस्ट कर दिया।

Nyara Energy ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी है, लेकिन यह घटना इस बात का संकेत है कि वैश्विक टेक कंपनियों की दादागिरी किस स्तर तक पहुँच चुकी है।

यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि भारत ने अपना स्वदेशी टेक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित नहीं किया, तो भविष्य में भारत को भी रूस जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।

Chapter 5: मोदी सरकार की तैयारी

इसी खतरे को भांपते हुए मोदी सरकार टेक्नोलॉजी क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। भारत में बने प्लेटफॉर्म्स को बढ़ावा दिया जा रहा है और विदेशी निर्भरता को धीरे-धीरे कम किया जा रहा है।

Microsoft Teams के विकल्प के रूप में Zoho जैसे भारतीय प्लेटफॉर्म्स को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। डेटा लोकलाइजेशन नीति लागू की गई है, ताकि भारतीय डेटा भारत में ही सुरक्षित रहे।

RuPay और UPI जैसे स्वदेशी भुगतान सिस्टम्स को बड़े पैमाने पर विस्तार दिया गया है। सेमीकंडक्टर मिशन की शुरुआत की गई है, जिससे भारत में ही चिप निर्माण संभव हो सके।

Digital Personal Data Protection Act लागू कर विदेशी कंपनियों को भारतीय कानून के दायरे में लाया गया है। ChatGPT के विकल्प के रूप में BharatGPT और स्वदेशी क्लाउड समाधान विकसित किए जा रहे हैं। कुल मिलाकर भारत टेक्नोलॉजी संप्रभुता की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा रहा है।

Chapter 6: कांग्रेस, अमेरिका और राहुल गांधी का असली मकसद

इसके विपरीत राहुल गांधी चाहते हैं कि भारत इन सभी रणनीतिक प्रयासों से ध्यान हटाकर ट्रम्प की खुली आलोचना करे और अमेरिका से सीधी आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक लड़ाई में कूद पड़े। इसी पर याद आता है अकबर इलाहाबादी का मशहूर शेर:

“हमारा ईमान तुम क्या पूछती हो मुन्नी,
हम शिया के साथ शिया, सुन्नी के साथ सुन्नी”

यह शेर राहुल गांधी के राजनीतिक आचरण पर सटीक बैठता है। वे हर उस व्यक्ति, संस्था या देश के साथ खड़े दिखाई देते हैं, जो किसी न किसी रूप में भारत के विरुद्ध हो।

इस बार राहुल गांधी उस बंदर की भूमिका निभाना चाहते हैं, जो दो बिल्लियों को आपस में लड़ाकर रोटी खुद खा जाता है। यह कोई मासूम राजनीतिक हरकत नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चाल है, जिसे Deep State की स्क्रिप्ट कहा जा सकता है।

अमेरिका का Deep State भी नहीं चाहता कि भारत एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर शक्ति के रूप में उभरे, और राहुल गांधी की हालिया गतिविधियाँ इसी दिशा में जाती दिखाई देती हैं।

यह कोई रेटोरिक सवाल नहीं है। कांग्रेस और अमेरिकी Deep State के संबंध किसी से छिपे नहीं हैं। संसद सत्र शुरू होने से पहले किसी अंतरराष्ट्रीय NGO की संदिग्ध रिपोर्ट आते ही संसद का बाधित होना और बाद में उसके तार राहुल गांधी तक जुड़ना, इस पैटर्न को और मजबूत करता है। उनके राजनीतिक सलाहकार सैम पित्रोदा के संबंध भी पहले से ही अमेरिकी Deep State से जोड़े जाते रहे हैं।

आज भारत राजनीतिक रूप से स्थिर है। ऐसी स्थिति में कोई भी Deep State भारत में सीधे शासन परिवर्तन की क्षमता नहीं रखता, लेकिन अस्थिरता पैदा करने की कोशिशें लगातार जारी रहती हैं।

कांग्रेस और अमेरिकी Deep State का यह गठजोड़ भारत को भीतर से कमजोर करने और भारत–अमेरिका संबंधों को बिगाड़ने की कोशिश में लगा हुआ है। ऐसे समय में भारत एक लंबी और स्पष्ट सोच के साथ आगे बढ़ रहा है — एक तकनीकी, रणनीतिक और आर्थिक रूप से स्वतंत्र राष्ट्र बनने की दिशा में। इसी संदर्भ में राहुल गांधी जैसे चेहरों को पहचानना जरूरी है, जो अपने निजी राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश तक को दांव पर लगाने से नहीं हिचकते।

Editorial team:
Production team:

More videos with Rohit Pandey as Anchor/Reporter