Indira Gandhi was a dictator but Nehru started the dictatorship

Emergency Part 4: इंदिरा गाँधी तानाशाह थी… लेकिन तानाशाही की शुरुआत की थी नेहरू ने

Summary
आपातकाल इंदिरा गाँधी ने थोपा था। लेकिन शुरुआत नेहरू से हुई थी। नेहरू घोषित तानाशाह भले नहीं थे, पर उनकी हर शैली में तानाशाही की झलक थी।

अब तक के videos में हमने बात की है, कि emergency किन परिस्थितियो में लगी। Emergency के दौरान इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी ने जनता पर कैसे अत्याचार किये और Emergency के दौरान मीडिया, विपक्ष, बुद्धिजीवी वर्ग तथा जनता के एक बड़े हिस्से ने कैसे विद्रोह किया।

आज हम ये जानेंगे कि भारत में इंदिरा गाँधी द्वारा emergency impose एक नई घटना जरूर थी, लेकिन तानाशाही की यह मानसिकता कोई नई बात नहीं थी। दरअसल नेहरू-गांधी परिवार के राजनीतिक व्यवहार में यह मानसिकता हमेशा से छिपी रही थी, Emergency ने तो बस उसका पर्दा गिरा दिया।”

आज़ादी से लेकर आज तक, भारत की सत्ता पर लंबे समय तक जिस परिवार का कब्ज़ा रहा है, वह परिवार स्वभाव से ही एक dictator रहा है।

Dictator, यह word सुनकर हम सबके जेहन में हिटलर, स्टालीन और माओत्शे तुंग जैसे लोगों का चेहरा आता है। ये सभी लोगों घोषित रूप से तानाशाह थे, इनलोगों ने अपने विरोधियो को मारा, उनका genocide करवाया, इसलिए इनकी तरफ हमारा ध्यान जाना obvious है। लेकिन आमतौर पर हमारा ध्यान उन तानाशाहों पर नहीं जाता जो लोकतंत्र की छाव में उपजे।

वैसे तो तानाशाह चाहे लोकतंत्र की छाँव में उपजे या किसी और तरीके से, उनके गुण लगभग एक जैसे ही होते हैं।

तानाशाहों को अपनी तारीफ पसंद होती है, वह खुद को ही राज्य, अपने शब्दों को ही क़ानून मानते हैं। तानाशाहों की सबसे बड़ी विशेषता ही यह होती है, कि वह जनता को गाजर-मूली की तरह समझते हैं। जनता उनके लिए साध्य नहीं, बल्कि साधन होती है, अपने उद्देश्यों तक पहुंचने का एक साधन।

असल में तानाशाही की बुनियाद, किसी भी देश में तब रखी जाती है, जब कोई यह मान ले कि उसके विचार देश के interest से भी ऊपर हैं।

यदि हम भारत की बात करें, तो आजादी के बाद से ही हमें भारत में एक indirect dictatorship दिखने लगी थी।

आजादी मिलने के बाद सबने अपने-अपने सपनों के भारत की कल्पना की थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद उस स्वप्न का नेतृत्व एक ऐसे व्यक्ति के हाथों में गया, जिन्होंने इस देश में अघोषित तानाशाही की नींव रख दी।

हालाँकि वैसे तो नेहरू की छवि ‘विचारशील राजनेता’ की थी, लेकिन practically देखें, तो उन्होंने कांग्रेस से सरकार तक ऐसा माहौल तैयार कर दिया था, जहाँ वो ही सब कुछ थे। आप सोचिये, जिस party में कई स्वतंत्रता सेनानी थे, उस पार्टी में, सिर्फ एक व्यक्ति सर्वेसर्वा बन चुका था। हालात ऐसे थे, कि नेहरू की आलोचना करना, राष्ट्र की आलोचना करने जैसा बना दिया गया।

जहाँ एक तरफ संयुक्त राज्य अमेरिका में पहला संविधान संशोधन अपने नागरिकों के बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है। वहीं दूसरी तरफ नेहरू के नेतृत्व में, mother of Democracy भारत में, पहला संविधान संशोधन ही नागरिकों के बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार पर अंकुश लगाने के लिए लाया गया था।

एक तानाशाह की सबसे बड़ी कोशिश ही यही होती है कि लोग क्या बोले और कितना बोले यह तानाशाह ही तय करें। नेहरू ने पहले संविधान संशोधन के तहत यही ensure किया था।

नेहरू की तानाशाही के यूं तो कई उदाहरण है, लेकिन एक घटना का जिक्र यहां पर जरूरी है।  1951 में प्रसिद्ध कवि मजरूह सुल्तानपुरी को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार करवा लिया गया था क्योंकि उन्होंने नेहरू की तुलना हिटलर से कर दी थी।

यह कितनी बड़ी irony है कि प्रधानमंत्री मोदी को न जाने कितनी गालियां दी गईं, न जाने कितनी बार हिटलर से भी बुरे नाम दिए गए, लेकिन अब तक एक भी व्यक्ति मोदी को गाली देने के आरोप में गिरफ्तार नहीं हुआ। मोदी को पानी पी-पी कर कोसने वाले लोग, dictator कहने वाले लोग ये बातें शायद भूल जाते हैं।

बहरहाल नेहरू घोषित तानाशाह भले नहीं थे, पर उनकी हर शैली में तानाशाही की झलक थी। नेहरू के समय से ही भारत में तानाशाही की पहली ईंट रखी गई।

वही दूसरी तरफ इंदिरा गाँधी की तानाशाही के बारे में तो क्या ही बात की जाय, वही तो इस गाँधी नेहरू परिवार रूपी गुप्त वंश की समुद्रगुप्त थीं। उन्होंने ही तो इस तानाशाही को नई ऊँचाइयाँ दीं। इसलिए उनके बारे में तो सबको पता है, लेकिन जब तानाशाहों की बात हो रही है, तो उनके बेटे संजय गाँधी का जिक्र यहाँ पर जरूरी है।

यह पूरा देश जानता है कि emergency के दौरान जो कुछ भी हुआ वह इंदिरा गाँधी की सहमति पर संजय गाँधी के इशारे से हुआ। संजय गाँधी ने उस दौरान इतनी तानाशाही दिखाई, जिसका वर्णन करते-करते इतिहासकारों की कलम घिस गई।

एक किस्सा मैं आपको सुनाता हूँ। Emergency के दौरान संजय गांधी इस चीज को मॉनिटर करते थे कि media में कौन सी चीज़े जाएंगी।

उस समय देश के information and broadcasting minister थे, इंद्र कुमार गुज़राल।

संजय गाँधी ने उनको मिलने के लिए बुलाया। संजय गाँधी न तो प्रधानमंत्री थे और न ही senior leader, लेकिन प्रधानमंत्री के बेटे थे, तो इस हैसियत से उन्होंने गुजराल को बुलाया और गुजराल को जाना भी पड़ा। संजय गांधी ने इंद्र कुमार गुजराल से कहा कि आप ऑल इंडिया रेडियो को सही से हैंडल नहीं कर रहे हैं, ऑल इंडिया रेडियो आजकल इंदिरा गाँधी से जुड़ी हुई खबरें कम सुना रहा है। तो आज के बाद ऑल इंडिया रेडियो पर जो भी न्यूज़ सुनाई जाएगी वह पहले आप मुझे भेजेंगे।

गुजराल को संजय गांधी का यह टोन पसंद नहीं आया। उन्होंने संजय गांधी से कहा कि तुम मेरे बेटे की उम्र के हो, इसलिए अगर बात करनी है तो थोड़ा politely करो, और दूसरी बात कि मैं इंदिरा गांधी का मिनिस्टर हूं तुम्हारा नहीं।

अगले दिन वही हुआ जो होना था, गुजराल से उनका मंत्रालय छिन लिया गया और उन्हें योजना आयोग में भेज दिया गया। ऐसी अनेक कहानियां हैं, जो संजय गाँधी की तानाशाही को बताती है। दुर्भाग्य यह रहा, कि देश पर उनकी तानाशाही उनकी मृत्यु तक चलती रही।

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में जो हुआ, वह एक नरसंहार था। सिखों को खुलेआम मारा गया, जलाया गया, उनके घर लूटे गए। और राजीव गांधी ने उस त्रासदी पर क्या कहा? “जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती है।”

राजीव गाँधी का यह कथन उनकी तानाशाही मानसिकता को दिखाता है। बहुत पहले मैंने एक शे’र सुना था

लगा कर आग शहर को, ये बादशाह ने कहा,

उठा है आज दिल में तमाशे का शौक़ बहुत…

झुका के सर…सभी शाहपरस्त बोल उठे,

हुज़ूर का शौक सलामत रहे, शहर और बहुत हैं

राजीव गाँधी के समय में यही हुआ। उनकी मौन सहमति पर सिखों का नरसंहार हुआ। उनकी सरकार ने उन दंगों के दोषियों को बचाया। दोषियों को टिकट तक दिए। यह खुलेआम तानाशाही थी, जिसमें भारत के लोगों को गिनी पिग्स के रूप में एक experiment की तरह treat किया गया।

राजीव गाँधी की तानाशाही के और भी कई उदाहरण हैं। शाहबानो केस में जब सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया था कि muslim महिलाओं को तलाक के बाद आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जाय, तो उस समय राजीव गाँधी ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट कर इस देश की muslim महिलाओं को नारकीय जीवन जीने पर मज़बूर कर दिया था।

इसके अलावा राजीव गाँधी तो post office bill लेकर भी आए थे, जिसके अंतर्गत सरकार की हर letter और mails तक पहुँच थी। वो तो सौभाग्य था इस देश का कि राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह ने उस पर veto लगा दिया, नहीं तो राजीव गाँधी तो पूरी तरह से लोगों के दिमाग़ तक में घुसने की तैयारी कर चुके थे।

गाँधी परिवार की तानाशाही को एक नए रूप में सोनिया गांधी के समय देखा गया।

सोनिया गाँधी जब PM नहीं बनी तो उनके कुछ चाटुकार मीडिया संस्थानों ने इसे “बलिदान” कहा।

लेकिन सच यह है कि उन्होंने बलिदान नहीं दिया, बल्कि तानाशाही का एक ऐसा मॉडल गढ़ा—जिसमें सत्ता के सारे निर्णय उन्होंने किये, लेकिन जवाबदेही किसी और पे गई।

उस दौरान देश में बन रहे किसी भी क़ानून पर आखिरी निर्णय संसद में नहीं, 10 जनपथ में होता था। एक तानाशाह के लिए इससे बेहतर क्या हो सकता है? जहाँ उसके पास कोई जवाबदेही नहीं है, जबकि अधिकारी असीमित मात्रा में हों।

सोनिया गाँधी सरकार में नहीं थी,, लेकिन पूरी सरकार उनकी मर्ज़ी से चलती रही।

सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री नहीं बनीं, लेकिन प्रधानमंत्री उन्हीं की सलाह पर चलने लगे।

सोनिया गाँधी किसी फैसले पर signature नहीं करती थीं, लेकिन हर फैसले की जननी वही थीं।

और आज जो गाँधी परिवार की स्थिति है, उसमें भी तानाशाही का यह भाव पीछे नहीं छूटा है। कांग्रेस के युवराज आज जो सुविधाएँ भोगते हैं, वह तो माध्यकालीन राजाओं के पास भी नहीं हुआ करती थी।  पार्टी के भीतर उन्हें कोई आलोचना नहीं करता। मीडिया का बड़ा वर्ग उनके खिलाफ कुछ नहीं बोलता। पूरी कांग्रेस इतनी असफलताओं के बाद भी उन्हें अपना नेता मानती है।

जो लोग राहुल गाँधी से मिलने जाते हैं, उन्हें पता होगा कि इतना प्रोटोकॉल तो शायद प्रधानमंत्री का भी नहीं होता, जितना बड़ा प्रोटोकॉल इनका है।

जब प्रोटोकॉल की बात हो ही रही है, तो यह बताना भी जरूरी है कि लोकसभा में 2017 में दिए गए गए एक आँकड़े के अनुसार राहुल गाँधी ने 2014 se लेकर 2017 तक security, protocol को 100 से भी अधिक बार तोड़ा था। यह अहंकार ही तो है, कि security agencies कौन होती हैं, जिन्हें मैं कुछ बताऊं।

“अहंकार और दूसरों को छोटा समझने का भाव राहुल गाँधी को विरासत में मिला है। तभी तो वो मनमोहन सिंह की सरकार में cabinet द्वारा मंज़ूर किये गए अध्यादेश को मीडिया के सामने फाड़ देते हैं, ताकि यह message भेजा जा सके, कि यहाँ मालिक और गुलाम कौन है।

राहुल गांधी घोषित तानाशाह नहीं हैं, लेकिन उनकी मानसिकता, congres पर उनका control, और जवाबदेही से बचाव—ये सभी उस “तानाशाही DNA” का हिस्सा हैं, जो नेहरू से शुरू होकर इंदिरा, संजय, राजीव और सोनिया से होते हुए राहुल गाँधी तक आती है।

एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है कि इतिहास उनको याद रखता है जिन्होंने अपने पूर्वजों की legacy को नई ऊँचाईयों तक पहुंचाया हो। वैसे तो यह कहावत बड़ी positive है, लेकिन तानाशाही की legacy देने वाले गाँधी परिवार की विरासत को राहुल गाँधी वाकई में ऊंचाइयों पर ले गए हैं। इतिहास कम से कम इस वजह से तो उन्हें जरूर याद रखेगा।

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