कभी-कभी लगता है, भारत को आज़ादी तो 1947 में मिल गई थी, लेकिन उसके बाद एक लंबा ‘गेस्ट हाउस काल’ शुरू हुआ, जहां नीतियाँ तो भारत में बनी, पर उसका परामर्श विदेशों से आया। जहाँ काम तो भारत में हुआ, पर चेक पेमेंट दूसरे देशों से आया।
भारत में इसकी शुरुआत आज़ादी के बाद से ही हो गई थी। लॉर्ड माउंटबेटन समेत कई ब्रिटिश अधिकारी आजादी के बाद भी भारत में शीर्ष पदों पर रहे। स्वतंत्र भारत की सत्ता के गलियारों में गोरे साहबों की आवाजाही और टोका टोकी पहले जैसी ही रही। नेहरू युग में कभी अमेरिका की हां में हां मिलाई गई, तो कभी सोवियत रूस के संकेतों पर योजनाएं बनाईं गईं।
डैनियल पैट्रिक जैसे अमेरिकी राजनयिकों ने स्वयं स्वीकार किया कि केरल और बंगाल में वामपंथी उभार को रोकने के लिए अमेरिका ने कांग्रेस को आर्थिक सहायता दी थी। इसका चरम 1959 में दिखा, जब केरल की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई गैर कॉन्ग्रेसी सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। CIA की रिपोर्ट में यहाँ तक बताया गया कि कांग्रेस के 40% सांसद सोवियत के अनुदान पर पल रहे हैं।
सोनिया गाँधी के काल में यह विदेशी हस्तक्षेप और गहरा हुआ। 2008 में कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच एक MOU पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें क्या बातें हुई थीं, ये अब तक पता ही नहीं चल पाया।
कांग्रेस के नेतृत्व में राजीव गाँधी फाउंडेशन बनाया गया, जिसे चीन तक से फंडिंग मिली। इसके अलावा राहुल गाँधी के IAMC जैसे इस्लामी संस्था से संबंध भी किसी से छुपे नहीं है। वही IAMC, जिसकी जड़ें अलकायदा तक जाती हैं। राहुल गाँधी के सलाहकार सैम पित्रोदा के तार तो अमेरिका के डीपस्टेट तक से जुड़े हुए हैं।
कांग्रेस के ही एक बड़े नेता नटवर सिंह ने खुलासा किया कि CIA भारत के नीति निर्माण में घुसपैठ कर चुकी थी। विदेशी फंडिंग वाले अनेक NGOs ने भारत में चल रही परियोजनाओं का विरोध किया।
IB की रिपोर्ट में यह सामने आया कि इस प्रकार के आंदोलनों से भारत की GDP को 2-3% तक का नुकसान हुआ। ऐसा लग रहा था, मानो भारत को एक अंतरराष्ट्रीय लैब समझकर विदेशी संस्थाएँ यहाँ वर्क फ्रॉम होम कर रही हैं।
किन्तु 2014 में एक राजनीतिक परिवर्तन हुआ। नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने और देशवासियों को पता चला कि भारत में लग रही आग की चिंगारी विदेशी धरती से आ रही है।
पिछले 11 वर्षों में यह दिखा है कि कैसे मोदी सरकार ने इस स्थिति को पलटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण को अपनाया। प्रशासनिक स्तर पर FCRA कानून को सख्त किया गया, ताकि विदेशी चंदे पर पल रहे NGOs पर नकेल कसी जा सके।
2015 से लेकर 2025 तक 20,000 से अधिक NGOs के विदेशी फंडिंग लाइसेंस रद्द किए गए। ग्रीन रिवोल्युशन के नाम पर ग्रीन टेररिज्म फैलाने वाले ग्रीनपीस जैसी संस्थाओं की विदेशी फंडिंग रोकी गई।
साइबर युद्ध के मोर्चे पर मोदी सरकार ने 2020 में TikTok, WeChat, UC Browser जैसे 250 से अधिक चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाकर “डिजिटल सर्जिकल स्ट्राइक” की।
कूटनीतिक स्तर पर भारत ने विदेशी हस्तक्षेप को खुले शब्दों में खारिज किया। OIC की मुस्लिम राजनीति हो, कनाडा के ट्रूडो की खालिस्तानी हमदर्दी हो, या ट्रम्प का ‘सीज़फायर’ बयान, हर बार भारत ने सख्त, शांत और स्पष्ट उत्तर दिया। तुर्की की मुस्लिम ब्रदरहुड राजनीति को जवाब देने के लिए भारत ने ग्रीस, आर्मेनिया और साइप्रस जैसे राष्ट्रों से रक्षा संबंध गहराए।
वामपंथी नक्सलवाद, इस्लामी कट्टरता और ईसाई मिशनरियों की विदेशी मदद पर भी सरकार ने कड़ा प्रहार किया। ‘हिंडेनबर्ग रिपोर्ट’ जैसी संस्थाएं और जॉर्ज सोरोस जैसे बिलेनियर्स ने भारत की राजनीतिक स्थिरता पर हमले किए। अब भारत में जॉर्ज सोरोस के ठिकानों पर FCRA के उल्लंघन के मुद्दे पर ED नकेल कस रही है।
ये वही जॉर्ज सोरोस हैं, जिनके तार राहुल गाँधी तक से जोड़े जाते हैं। इसके अलावा न्यूज़क्लिक जैसे संस्थानों को मिल रही चीनी फंडिंग पर भी जाँच चल रही है।
पिछले 11 वर्षों में भारत ने यह स्पष्ट किया है कि देश अब किसी भी प्रकार के विदेशी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेगा।
मोदी सरकार ने विदेशी हस्तक्षेप को रोकने के लिए कानूनी, प्रशासनिक, कूटनीतिक और डिजिटल मोर्चों पर संगठित प्रयास किए हैं। चाहे बात मज़हबी प्रचार तंत्र की हो, नक्सली नेटवर्क की हो , विदेशी मीडिया के नैरेटिव युद्ध की हो या फिर साइबर जासूसी की, भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है, कि अब वह अपने निर्णयों में आत्मनिर्भर और अडिग है।
अब भारत किसी और की लिखी हुई स्क्रिप्ट नहीं बोलता। वह अपना संवाद खुद लिखता है, और उसे बोलने का मंच भी खुद तय करता है।




