ईरान-अमेरिका के बीच PAK बना ‘नेता’ तो UAE ने माँग लिया अपना पैसा

Summary
इन जंग के हालातों के बीच UAE यानी यूनाइटेड अरब एमिरेट्स ने पाकिस्तान से अपना 3.5 बिलियन डॉलर यानी लगभग 33 हज़ार करोड़ का कर्ज वापस माँग लिया है। और ये कर्ज पाकिस्तान को अप्रैल महीने में ही वापस करना है।

कहते हैं आदमी कितना भी बदल जाए लेकिन उसके जेनेटिक गुण नहीं जाते, गुण नहीं जाते तो उसके दोष भी नहीं जाते। ऐसी ही एक आदत है चौधराहट की। चौधराहट की ये आदत भारतीय उपमहाद्वीप में काफ़ी प्रीवेलेंट है। चाहे यूपी का कोई गांव हो या सिंध के वडेरे मतलब बड़े किसान, हर आदमी चौधरी बनना चाहता है। और मैं यहाँ किसी जाति के सेंस में नहीं बल्कि अपने को दूसरे से ऊँचा मानने वाली सामंती मानसिकता के संबंध में बात कर रहा हूँ। 

हर आदमी चाहता है कि गांव के फैसले उसके दरवाज़े पर हों, लोग उसके पी-आस फ़रियाद लेकर आएँ। और चौधराहट की चाहत सिर्फ़ लोगों में नहीं है , बल्कि यहाँ की जनता का एक बड़ा हिस्सा इसी चौधराहट को अन्तरराष्ट्रीय राजनेती में भी यूज करना चाहता है। 

अब इसका एक एग्जाम्पल पिछले दिनों हमें दिखा। मार्च 2026 की शुरुआत में जब इजरायल और ईरान ने एक दूसरे पर बम बारूद बरसाना चालू किया तो दुनिया में हलचल मच गई। स्ट्रैट ऑफ़ हॉर्मुज़ बंद हुई तो तेल और गैस की क़िल्लत हो गई, ऊपर से ईरान ने इजरायल का बदला खाड़ी के देशों पर ड्रोन और रॉकेट बरसा के निकाला।

अब इस सब झगड़े के बीच एक चौधरी की जरूरत थी। वैसे तो दुनिया का डी फैक्टो चौधरी अमेरिका है, लेकिन इस मामले में वो ख़ुद पार्टी था तो पाकिस्तान ने ये बीड़ा उठाया। उसने अपनी राजधानी इस्लामाबाद में ईरान, इजिप्ट, UAE, सऊदी और अमेरिका के राजदूत और साथ ही विदेश मंत्रियों का भी जमावड़ा जमाया। 

बेसिकली ये इस आधार पर किया गया कि हमारे तो सबसे ताल्लुकात हैं। अब पाकिस्तान दो-तीन दिन चौधरी बन लिया, इससे भारत में fomo यानी फियर ऑफ़ मिसिंग आउट आ गया, बड़े वर्ग ने कहा कि हमारी तो डिप्लोमेसी फेल हो गई। देखो पाकिस्तान अब फैसले करवा रहा है और हम यहाँ अपने एक-एक जहाज़ की गिनती करने बैठे हैं। 

कुछ नामी गिरामी मीडिया आउटलेट्स ने पाकिस्तान की प्रशंसा में कोरस भी गा दिया। लेकिन ये चाँदनी चार दिन ही टिक पाई। अब सबको समझ आ रहा है कि भारत आख़िर इस चौधराहट के गेम में क्यों नहीं कूदा और पाकिस्तान ने आख़िर अपना कितना बड़ा नुकसान, इस चक्कर में कर लिया है।

साथ में ये भी मैं आपको अभी बताऊँगा कि आख़िर भारत ने ये मीडिएशन जैसे कोई कदम क्यों नहीं उठाए और कैसे वो एकदम सही फैसला था। लेकिन पहले पार्ट पर अभी बात करते हैं। 

तो खबर है कि इन जंग के हालातों के बीच UAE यानी यूनाइटेड अरब एमिरेट्स ने पाकिस्तान से अपना 3.5 बिलियन डॉलर यानी लगभग 33 हज़ार करोड़ का कर्ज वापस माँग लिया है। और ये कर्ज पाकिस्तान को अप्रैल महीने में ही वापस करना है। हालाँकि, UAE ने कोई ग़लत माँग नहीं की है। 

पाकिस्तानी अख़बार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट कहती है कि इस 3.5 बिलियन डॉलर में 450 मिलियन डॉलर तो 1996-97 में उधार लिए गए थे। यानी पाकिस्तान ने उन दोस्तों को पीछे छोड़ दिया जो पैसा लेकर भूल जाते हैं। इस कर्ज की  मियाद तो बहुत दिन पहले ही ख़त्म हो गई थी, लेकिन अब UAE ने नो मींस नो वाला रूख अपनाया है।

दरअसल, UAE ये कर्ज रोल ओवर करने से मना कर दिया है, यानी कर्ज वापस करने की मियाद बढ़ाने से इनकार कर दिया है। और ये तब हुआ है जब पाकिस्तान की इकॉनमी इस वेस्ट एशिया क्राइसिस से उभरे शॉक को झेल रही है। जब पेट्रोल डीजल के प्राइसेस एक दिन में सैकड़ों में बढ़ाए जा रहे हैं। 

लेकिन कुछ दिन पहले तक जो पाकिस्तान UAE और ईरान को एक मेज पर बिठा रहा था, आख़िर उसे UAE ने इतना बड़ा झटका क्यों दिया? UAE ने ऐसा क्यों किया है, इसके पीछे कई थ्योरी हैं! तो UAE ने साफ़ साफ़ ना कुछ कहा है और ना कुछ कहेगा लेकिन मैं आपको ये थ्योरीज जरूर बता सकता हूँ। 

सबसे पहली और सबसे मजबूत है सऊदी और UAE की नूराकुश्ती और उसमें पाकिस्तान का पिसना। दरअसल, यमन के मुद्दे से लेकर ईरान तक, लगातार सऊदी और UAE एक दूसरे से अलग व्यूज रखते रहे हैं। इन फैक्ट हाल ही में सऊदी और uae ने एक दूसरे पर बकायदा बयान देकर कई आरोप लगाए थे। 

सऊदी ने कहा था कि यमन में UAE के सपोर्ट वाले लड़ाके उसकी सुरक्षा के लिए खतरा हैं तो वहीं UAE ने इस बात को नकार दिया था। यहाँ तक कि सऊदी के UAE समर्थन वाले फोर्सेज पर स्ट्राइक की तक खबर आई थी। अब इस कहानी में पाकिस्तान कहाँ आता है? 

दरअसल, पाकिस्तान UAE के मुक़ाबले हमेशा ही सऊदी के ज़्यादा करीब रहा है और पिछले साल जब उसने सऊदी के साथ एक डिफेंस एग्रीमेंट किया तो ये रिश्ते और मजबूत होने की बात कहीं गई। ईरान ने जब सऊदी में हमले करना शुरू किया तो भी पाकिस्तान भले ही बयानों में सही लेकिन खुले तौर पर उसके समर्थन में उतरा। 

लेकिन UAE के साथ उसने मामला निंदा तक निपटा लिया। अब सऊदी से उसका क्लोज होना और युद्ध के टाइम में केवल लिप सर्विस देना शायद UAE को पसंद नहीं आया और इसीलिए उसने खुले तौर पर तो कुछ नहीं कहा लेकिन हाँ! अपना पैसा जरूर वापस माँग लिया और ये चोट पाकिस्तान को किसी बयान से ज़्यादा घायल करेगी। 

इसके अलावा एक और थ्योरी है कि पाकिस्तान का ईरान से ऐसे समय में चिपकना और मंकी बैलेंसिंग करना शायद उसे ज़्यादा समझ आया और उसने ये कदम उठा लिया। उधर ईरान भी इस बातचीत के बीच हमले किए जा रहा है, ना अमेरिका रुक रहा है और ना इजरायल। 

आपको जो भी थ्योरी ज़्यादा मजबूत लगती हो, उसे सच मान लीजिए! लेकिन अंतिम सत्य ये है कि पाकिस्तान को कंगाली के बीच ये पैसा वापस करना पड़ेगा जो 30 सालों से वो दबा के बैठा हुआ था। अब इस कर्ज को वापस पाकिस्तान के स्टेट बैंक रिजर्व में से दिया जाएगा जो अभी लगभग 16 बिलियन डॉलर है। 

जब ये पैसा दे दिया जाएगा तो उसके रिजर्व घट जाएँगे और उसे फिर कर्ज लेने की जरूरत पड़ेगी, जिसके लिए वह मारा-मारा घूमेगा। साथ ही उसको ऐसे कठिन समय में तेल और गैस इंपोर्ट करना भी कठिन हो जाएगा। यानी उसने जितनी भी चौधरियों वाली हरकतें की थी, वो अब बैकफ़ायर कर गई हैं। 

अब हम अपनी कहानी के दूसरे चैप्टर पर आते हैं, ये चैप्टर है कि आख़िर भारत ने क्यों इस कुकुरहाँव के बीच दोनों पार्टियों में समहौते की पेशकश नहीं की और ये कैसे ठीक कदम था। मैं आपको भारत की मजबूती और कमजोरी बताऊँ, उससे पहले चीन का एक उदाहरण देता हूँ। 

चीन की आर्थिक तरक्की के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले नेता डैंग जियाओपेंग की एक थ्योरी है। हाईड योर स्ट्रेंथ, बाइड योर टाइम। यानी अपनी ताक़त छुपाओ और उसे बढ़ाते रहो और दिखाओ तब जब अनुकूल समय हो। दुनिया के पचड़ों में ना पड़ के अपना घर पहले ठीक करो, ज्यादा नेता ना बनो। 

चीन ने 1980 से लेकर आज तक इस नियम का पालन किया है। चीन ने तब तक किसी अन्तरराष्ट्रीय मामले में अपना हाथ नहीं डाला, जब तक उसके सीधे तौर पर इंटरटेस्ट प्रभावित ना हो रहे हों। फिर चाहे नार्थ कोरिया का मामला हो 1990 के शुरुआती दशक में कंबोडिया से जुड़ी शांति वार्ता। 

इन फैक्ट चीन के मॉडर्न इतिहास में किसी भी बड़ी अन्तरराष्ट्रीय समस्या में हाथ नहीं डाला है। लेकिन इस बीच उसने अपनी इकॉनमी को 20 ट्रिलियन का कर लिया है, आज वो EV स्पेस में दुनिया में लीडर है, कई तकनीकों पर उसका एकाधिकार है और इस ताक़त का इस्तेमाल वह समय समय पर करता भी है। 

इन फैक्ट उसने अब तक सबसे बड़ा अन्तरराष्ट्रीय समझौता 2023 में ईरान और सऊदी अरब के बीच ही करवाया था, जो अब ताश के पत्तों की तरह बिखरता दिख रहा है। आप इस उदाहरण से कुछ समझे? इसका मतलब है कि पहले अपना घर ठीक करो, फिर मजबूती जुटाओ और तब दूसरे के मामले में चौधरी बनो! 

क्योंकि जब आपने समझौता करवाया और एक पार्टी ने उस समझौते की इज्जत नहीं की तो आपके पास ये ताक़त होनी चाहिए कि आप उसे दंड भी दे सको। और ये ताक़त अन्तरराष्ट्रीय राजनेती में आती है मिलिट्री से, मजबूत और बड़ी इकॉनमी से। जो कम से कम पाकिस्तान के पास नहीं हैं।

अब आते हैं भारत पर! भारत के पास बड़ी इकॉनमी है ये सच बात है, हमारे पास ठीकठाक बड़ी आर्मी, नेवी और एयरफोर्स है, ये भी ठीक बात है। हमारे सभी देशों से अच्छे रिश्ते हैं फिर चाहे इजरायल हो या UAE या फिर ईरान। लेकिन हम आख़िर वो चौधरी क्यों नहीं बने जो पाकिस्तान बना? 

दरअसल, हमारे या कहें मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी प्रायोरिटी है उसके हित। और हमारे इस युद्ध के बीच हित हैं कि हमारे लगभग 1 करोड़ लोग जो खाड़ी देशों में रहते हैं वो सुरक्षित रहें। हमारे तेल और गैस के टैंकर की सप्लाई ना रुके, हमारे 140 करोड़ भारतीयों के लिए जितना आसानी और जल्दी से जल्दी तेल और गैस मिल सके। 

ये भी प्रियोरोटी है कि हमारे एक्सपोर्ट ना हो हिट हों, हमारे यहाँ जो 45 बिलियन डॉलर गल्फ के देशों में कमा कर भारतीय भेजते हैं, उस पर इम्पैक्ट ना आए। इसके साथ ही इस रीजन में शांति हो, ये भी हमारी प्रियोरोटी है। यानी हमारा पूरा फ़ोकस है कि इस क्राइसिस में हम शांति से नेविगेट करें। 

अपनी सप्लाई सिक्योर करें, अपने लोग सिक्योर करें। अब आप सोचिए! क्या हमारे तेल और गैस की सप्लाई रुकी है? इसका जवाब है नहीं! ईरान ने भी हमारे जहाज़ों को शांति से निकलने दिया है। सवाल है कि क्या हमें किसी देश ने तेल और गैस बेचने से मना किया है? 

इसका जवाब है नहीं, इन फैक्ट हम इस समय रूस, ईरान और अमेरिका सबसे तेल और गैस ख़रीद रहे हैं। अगला सवाल, क्या हमारे देश के लोगों पर कोई दूसरा देश कोई पाबंदी लगा रहा है, इसका जवाब है नहीं। और इन सबके बीच पीएम मोदी हों या विदेश मंत्री जयशंकर, सभी इन देशों से लगातार बातचीत कर रहे हैं। 

हम ईरान से भी बात कर रहे हैं, हम सऊदी पर हुए हमले की निंदा भी कर रहे हैं और हम इजरायल के साथ भी खड़े हैं, साथ ही हमारे फ़ॉरेन सेक्रेट्री खामनेई की मौत पर शोक जताने भी जा रहे हैं। कुल मिलाकर हमने अपने सारे इंटरेस्ट्रस कवर कर लिए हैं। और पाकिस्तान, जो कुछ दिन पहले तक चौधरी बना फिर रहा था। 

वो अंत में लूजर बन कर निकला है। चाहे अफ़ग़ानिस्तान में फौज ना भेजने का फैसला हो या फिर रूस के ख़िलाफ़ यूक्रेन युद्ध के बाद क्रांति का, भारत ने हमेशा अपने हित में काम किया है जबकि पाकिस्तानी हर बार जज्बाती होकर काम करते आए हैं। 

नतीजा ये है कि आज अफ़ग़ानिस्तान उनका दुश्मन है, आज UAE उनसे पैसा वापस माँग रहा है, आज अमेरिका उन्हें सिर्फ़ दलाल की तरह इस्तेमाल कर रहा है और भारत इस सबसे अलग मजबूत होकर लगातार खड़ा है, इसलिए खड़ा है क्योंकि उसे चौधराहट की चाहत नहीं है। 

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