एक ट्रैकर बनाने के लिए Claude AI पर लॉगिन करते ही उसमें तुरंत एक नोटिफिकेशन आया कि CLAUDE पर अब FABLE 5 एंड MYTHOS 5 मॉडल्स डिसेबल हो गए हैं।
जब पड़ताल की गई कि ऐसा क्यों हुआ तो पता चला कि अमेरिका की ट्रम्प सरकार ने एंथ्रॉपिक को बोला है कि वो अपने इन दोनों लेटेस्ट मॉडल्स को यूएस के बाहर किसी को भी ना यूज करने दे, यहाँ तक कि अपने एंप्लॉयीज को भी नहीं। इस घटना से टेक्नोलॉजी डिनायल की आज से लगभग 76 साल पहले की घटना याद आती है।
जैसे आज AI को स्ट्रेटेजिक वेपन बना कर उसका एक्सेस कंट्रोल करने का प्रयास हो रहा है, 1950 के दशक में ऐसा ही प्रयास कम्यूटर्स को लेकर हुआ था। और तब भी अमेरिका ने भारत को सालों तक कंप्यूटर देने से मना कर दिया था। निखिल मेनन की किताब प्लानिंग डेमोक्रेसी में इस पर जानकारी दी हुई है।
निखिल ने बताया है कि असल में तब भारत के कम्यूटर मिशन के मुखिया पीसी महालनोबिस को अमेरिका शक की नजर से देखता था, उन्हें सोवियत संघ का नजदीकी समझता था, और ऐसे में उसने अपना कंप्यूटर UNIVAC-1 भारत को देने से मना कर दिया था! भारत इस कम्प्यूटर को सांख्यिकी यानी स्टैटिक्स ऑफिस में लगाना चाहता था।
लेकिन जब इसमें सक्सेस नहीं मिली तो 1955 में ब्रिटेन से HEC-2M लाया गया और इसे इंस्टॉल किया गया। कुछ वर्षों के बाद अमेरिका ने हमें कंप्यूटर्स देने शुरू तो किए लेकिन यहाँ भी मामला फेबल और मिथोस 5 जैसा ही था। साल 1974 में जब भारत ने न्यूक्लियर टेस्ट्स किए थे तो भी अमेरिका ने ऐसे बैन लगाए थे।
तब अमेरिका ने हाई एंड कंप्यूटर्स, एडवांस चिप्स और माइक्रोप्रोसेसर्स एक्सपोर्ट करने को रोक दिया था। और 1980s में तो ये हॉस्टिलिटी पीक पर पहुँच गई। तब भारत में कंप्यूटिंग को एडवांस करने के लिए बैंगलोर के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस में एडवांस कंप्यूटर इनस्टॉल किए जाने थे।
भारत में कंप्यूटिंग के जाने माने नाम वैद्येश्वरन रामराजन लिखते हैं कि वो ख़ुद इस प्रोजेक्ट में इनव्लोव थे और उन्होंने अमेरिका की फर्म क्रे एंड कंपनी को उनके YMP मॉडल का ऑर्डर दिया था, ये कंप्यूटर 1989 तक इनस्टॉल होने थे, लेकिन अमेरिका की सरकार इन्हें एक्सपोर्ट करने की इजाजत ही क्रे एंड कंपनी को नहीं दी।
ऐसा इसलिए हुआ कि कहीं भारत इन कंप्यूटर्स का इस्तेमाल न्यूक्लियर वेपन्स के लिए होने वाली कैलकुलेशंस और प्रोसेसेज में ना कर ले। और इसके बाद साल 1998 में न्यूक्लियर टेस्ट्स के बाद फिर से और कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए और उसे टेक्नोलॉजी देने से मना कर दिया गया।
यानी टेक डेनायल्स हमारे लिए कोई नए नहीं हैं, और पहली बार नहीं है। हाँ लेकिन ये अब साफ़ हो गया है कि बाक़ी के वेपन्स की तरह AI को भी अब एक स्ट्रेटेजिक लिवरेज के लिए यूज किया जाएगा और भारत को इसके लिए तैयार रहना होगा।
इसके बाद मैंने ट्विटर चेक किया तो पता चला कि इस फैसले के बाद भारत में फिर से ख़ुद के AI LLM और मॉडल्स बनाने की बहस तेज हो गई है।
श्रीधर वेम्बू से लेकर मोहनदास पाई तक इस पर बात कर रहे हैं और एक बड़ा तबका TCS, इंफोसिस और HCL वगैरह पर गुस्सा है कि आख़िर वो ऐसे मॉडल्स क्यों नहीं बनातीं?




