kerala migration model

‘केरल मॉडल’ की पूरी सच्चाई: खाड़ी के देशों से आने वाले पैसे पर टिके राज्य का भविष्य अब ख़तरे में क्यों है

Summary
लंबे समय से कम्युनिस्ट और कांग्रेस नेताओं द्वारा जिस 'केरल मॉडल' की तारीफ़ की जा रही थी, उसकी परतें अब खुलने लगी हैं। असल में यह मॉडल राज्य के हुनरमंद लोगों (Human Capital) को खाड़ी (Gulf) देशों में भेजकर वहां से आने वाले पैसे (Remittances) पर निर्भर था। कई दशकों तक सफ़ल रहने के बाद, अब पश्चिम एशिया में जारी युद्ध (West Asia War) के कारण इस मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।

लंबे समय से कम्युनिस्ट और कांग्रेस नेताओं द्वारा जिस ‘केरल मॉडल’ की तारीफ़ की जा रही थी, उसकी परतें अब खुलने लगी हैं। असल में यह मॉडल राज्य के हुनरमंद लोगों (Human Capital) को खाड़ी (Gulf) देशों में भेजकर वहां से आने वाले पैसे (Remittances) पर निर्भर था। कई दशकों तक सफ़ल रहने के बाद, अब पश्चिम एशिया में जारी युद्ध (West Asia War) के कारण इस मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।

केरल बीते कुछ दशकों में West Asia पर ऐसा निर्भर हुआ कि आज जब ये देश बीमार होते हैं तो खाँसी केरल को आती है। दशको तक कम्युनिस्ट और कांग्रेस सरकारों ने मलयालियों को गल्फ कंट्रीज में भेजने को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पुश किया और रोजगार प्रोवाइड करने की जिम्मेदारी से हाथ धो लिए। 


बीते एक महीने से ईरान और इजरायल-अमेरिका लड़ रहे हैं, तब से ही दुनिया भर की लगभग आधी क्रूड की सप्लाई रुकी हुई है, इस सप्लाई क्राइसिस का दंश हम भी झेल रहे हैं। क्रूड की सप्लाई तो किसी तरह मैनेज हो जा रही है लेकिन घर घर गैस की सप्लाई की चिंता बनी हुई है। 

इसी के साथ ही एक और चिंता है हमारे उन लगभग 1 करोड़ लोगों की, जो इन गल्फ कंट्रीज में रहते हैं। लेकिन इस बीच अगर सबसे ज्यादा चिंता में कोई है तो भारत का एक राज्य है, अगर मिडल ईस्ट में कुछ भी होता है तो सबसे पहले यहाँ की इकॉनमी डूबेगी। सबसे पहले यहाँ बेरोजगारी का दौर आएगा। 

और इस राज्य की कहानी है कि इसकी इकॉनमी ही गल्फ स्टेट्स में कामगार बनने के अराउंड बिल्ड की गई है। अब तक आप शायद समझ गए होंगे कि मैं केरल की बात कर रही हूँ! वही केरल जिसे कम्युनिस्ट एक मॉडल बताते हैं, वही केरल जहाँ लव जिहाद का आविष्कार हुआ, वही केरल जहाँ इस समय चुनाव है। 

लेकिन इन सबसे पहले जान लीजिए कि आख़िर केरल युद्ध में घिरे इन देशों पर कितना निर्भर है। रिपोर्ट्स कहती हैं कि वर्तमान में लगभग 24 लाख मलयाली गल्फ कंट्रीज में रहते हैं। केरल की जीडीपी का सबसे बड़ा हिस्सा आता है रेमिटेंसेस से यानी विदेशों से आने वाले पैसे से। 

केरल की net state domestic product यानी NSDP में लगभग एक चौथाई हिस्सा बाहर से आने वाले पैसे का है। केरला migration survey 2023 बताता है कि लगभग 22 लाख मलयाली बाहर रहते हैं। यानी राज्य की लगभग 12 % जनसंख्या विदेशों में काम की तलाश में जा चुकी है। 

सर्वे कहता है कि केरल में लगभग 17 % घर ऐसे हैं, जहाँ से कम से कम एक आदमी विदेश में काम करने गया हुआ है। 

इस मलयाली डायस्पोरा का भेजा हुआ पैसा ही केरल की इकॉनमी के पहिए चला रहा है।सोचिए केरल इस पैसे पर इतना निर्भर है कि ये पैसा उसके खुद के कमाए टैक्स से लगभग 70% ज्यादा है। 

यानी सरकार से ज्यादा पैसा बाहर रहने वाले मलयाली कमा कर भेज रहे हैं। केरल की इकोनॉमी में service sector यानी tourism, hospitality, insurance जैसे चीजों का शेयर 60% प्रतिशत से ज्यादा है। यह service sector इसी बाहर से आने वाले पैसे पे टिका हुआ है। 

और केरल अगर ऐसा है तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या कोई भी मलयाली अपने घर नहीं रुकना चाहता? क्या हर मलयाली ये चाहता है कि वो 20 साल का होते ही गल्फ का वीजा तलाशना चालू कर दे, क्या वो ये चाहता है कि उसे दशकों तक अपने परिवार से दूर रहना पड़े। क्या वो अपने घर नहीं रुकना चाहता? 

क्या वो अपने शहर के करीब नौकरी नहीं करना चाहता? मुझे नहीं लगता कोई भी भारतीय अपने घर से अफेक्शन नहीं रखना चाहता होगा। तो मलयाली भी भारतीय हैं, वो भी उसी सनातन संस्कृति से आते हैं, जिससे बाक़ी भारत के लोग हैं। बात दरअसल दूसरी है, केरल में माइग्रेशन करना चॉइस नहीं बल्कि कंपल्शन है। 

ऐसा क्यों है? इसको एक डेटा से समझ लीजिए। साल 2013 में ही केरल में बेरोजगारी की दर 8% से ज्यादा थी, साला 2018 में ये 12.5% थी और साल 2022-23 में 7% थी। हर बार ये बेरोजगारी दर नेशनल एवरेज के दोगुना या तीन गुना थी। इन फैक्ट 2024-25 में केरल में यूथ अनएम्प्लॉयमेंट रेट 29% था। 

यानी केरल के एक तिहाई युवा तब काम के तलाश में थे। और ये सब तब था जब कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों की आँखों में केरल एक मॉडल है, वहाँ की इकॉनमी सबसे अच्छी है और यहाँ की सरकारें सबसे अधिक प्रोग्रेसिव हैं। असल में आज जब केरल में इस गल्फ में छिड़ रहे युद्ध पर चिंता बनी हुई है तो हमें थोड़ा सा निगाह इतिहास पर भी डालनी पड़ेगी। 

सबसे पहला सवाल उठता है कि आख़िर केरल और इन देशों के बीच कामगार सप्लाई का रिश्ता बना कैसे! इसका एक इतिहास है। 1960 का दशक आते-आते ज्यादातर खाड़ी देश जैसे सऊदी अरब, इराक़, बहरीन को तेल मिल चुका था। यहाँ इस तेल के डॉलर लगातार आ रहे थे। 

इन डॉलर के पैसे से इन देशों में एक नया बूम आ रहा था। रेत के टीलों के बीचोंबीच इमारतें खड़ी होने लगीं थीं। स्कूल-कॉलेज और अस्पताल से लेकर मस्जिदों तक, सब कुछ चारों तरफ़ बन रहा था। लेकिन इसके लिए उन्हें चाहिए थे लोग! वो लोग जो स्किल्ड हों, वो लोग जो बहुत ज्यादा स्किल्ड हों और वो लोग भी जिन्हें कोई स्किल ना हो। 

बेसिकली हाइली स्किल्ड इंजीनियर्स से लेकर मजदूरों तक की माँग थी। अब ये मजदूर यूरोप से तो आते नहीं, दूसरी तरफ़ सेंट्रल एशियन कंट्रीज के लोग सोवियत रूस जा रहे थे। ऐसे में इतना बड़ा कामगारों का पूल एक ही जगह अवैलीबल था, और ये जगह था भारतीय उपमहाद्वीप। 

चाहे पाकिस्तान हो या भारत। यहाँ करोड़ों लोग थे जो काम करने को तैयार थे। इस जरूरत को पूरा करने के लिए केरल सबसे ज्यादा सुटेड इसलिए था क्योंकि 1971 आते-आते उसका साक्षरता स्तर आलरेडी लगभग 70% के आसपास पहुँच चुका था। उसके पास ठीक ठाक नंबर में सेमी स्किल्ड लोग थे। 

ऐसे में एक बार केरल से जो माइग्रेशन गल्फ की तरफ़ चालू हुआ, उसमे फिर कभी कमी नहीं आई। हालाँकि, केरल की कांग्रेस और कम्युनिस्ट सरकाररों को रोजगार क्वेश्चन से इसी बहाने से मुक्ति मिल गई। जब उन्होंने देखा कि केरल के युवा उनसे नौकरी का सवाल ना पूछ कर गल्फ को भाग रहे हैं, तो उन्होंने भी बहती गंगा में हाथ धोए। 

1977 में केरल में OPEDC नाम की एक संस्था बनाई गई। इसका काम, कामगारों और रोजगार के अवसरों के बीच सामंजस्य बैठाना था। ये बेसिकली गल्फ के लिए राज्य में लोगों को नौकरी देती थी। 1996 में भी केरल में बाहर जाकर काम करने वाले मलयालियों के लिए एक संस्था बनाई गई। 

इस सरकारी पुश के साथ ही केरल से माइग्रेशन की एक चेन भी बनी। जो भी व्यक्ति केरल से गल्फ जाता, वो बाद में अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को भी बुलाता। गल्फ के वीजा और माइग्रेशन रूल्स, यूरोप या फिर अमेरिका के मुक़ाबले कहीं सरल थे और यही कारण था कि लगातार केरल के लोग इन खाड़ी देशों में बढ़ते चले गए।

और इसका केरल पर क्या हुआ? केरल को इससे टेंपरेरी रिलीज टाइप की मिल गई। जो लोग रोजगार चाहते थे, वो धीमे धीमे गल्फ शिफ्ट होते गए, वहाँ से उन्होंने जो पैसा भेजा उससे केरल की इकॉनमी चलने लगी। केरल की इकॉनमी चली तो सरकार को भी रेवेन्यू मिला। और कुछ दशकों तक सब भला चंगा रहा। 

लेकिन ये कोई विकास का स्थिर मॉडल नहीं है। अपनी ह्यूमन कैपिटल को बाहर एक्सपोर्ट करना और उसके कमाए पैसे से इकॉनमी चलाना लंबे समय तक नहीं हो सकता और अब यही हुआ है। दरअसल इस गल्फ वेव को कांग्रेस और कम्युनिस्ट सरकारों ने केरल मॉडल बना कर बेचा। 

इस बीच ना उन्हें नौकरियाँ देनी पड़ी और ना ही बेरोजगारी की समस्या हल करनी पड़ी, ऊपर से बाहर से आते पैसे ने उनके लिए राह और आसान जरूर कर दी। लेकिन समस्या अब पैदा हुई है जब खाड़ी देशों में नौकरियाँ कम होने लगी हैं। समस्या तब हुई है जब खाड़ी देशों से आने वाला रेवेन्यू घटने लगा है। 

और समस्या तब खड़ी हुई है जब केरल का युवा अब नौकरी माँग रहा है। और इस सबका जिम्मेदार कौन है? इन सब चीजों की जिम्मेदार हैं वो सरकारे जो खाड़ी की लहर सहारे अपनी जिम्मेदारी से बचती रहीं। वो सरकारें जो अपनी जिम्मेदारी से बचती रहीं कि उन्हें राज्य के भीतर ही कुछ इंफ्रा बनाना पड़े। 

इन फैक्ट इन सरकारों ने राज्य में गल्फ एक्सपोर्ट मॉडल को इतना ज़्यादा काम में लिया कि आज केरल मैन्यूफैक्चरिंग के मामले में लगभग बराबर जनसंख्या वाले प्रदेशों से कहीं पीछे है। केरल में जहाँ लगभग केवल 7 हज़ार फैक्ट्रियाँ हैं तो वहीं हरियाणा में 10 हज़ार से ज्यादा फैक्ट्रियाँ हैं, वो मैन्यूफ़ैचरिंग के शेयर में भी केरल से पीछे है। 

और इसका जिम्मेदार कौन है? इसके जिम्मेदार वो कम्युनिस्ट और कांग्रेस सरकारें हैं जो दशकों तक यहाँ की सत्ता में रहीं और उन्होंने बस रेंट सीकिंग मॉडल अपनाया। आज केरल में चुनाव हो रहे हैं, पिनराई विजयन की कम्युनिस्ट सरकार अपने दो टर्म पूरे कर चुकी है, कहा जा रहा है कि केरल में इस बार कांग्रेस जीत सकती है। 

लेकिन क्या कांर्गेस और क्या काम्युनिस्ट, क्या अब केरल में कुछ बदलेगा? नहीं! क्यों नहीं बदलेगा क्योंकि वो बदलना ही नहीं चाहते। वो हर युवा को बाहर भेजने के मॉडल पर  काम करना चाहते हैं, वो राज्य के फ़ाइनेशियल क्राइसिस में जाने पर केंद्र को टारगेट करना चाहते हैं। बस वो अपने गिरेबान में नहीं झाँकना चाहते कि उन्होंने क्या ऐसा ग़लत किया। 

यही केरल मॉडल है जो आज एक युद्ध के चलते उसकी सच्चाई सामने ला दे रहा है।

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