कल ही बीबीसी ने एक आर्टिकल छापा जो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया, ‘India has splurged billions on metro trains. But where are the commuters?’ बीबीसी की इस हेडिंग का सीधा मतलब है, ‘भारत ने मेट्रो पर अरबों खर्च कर दिए, लेकिन यात्री कहाँ हैं?’
इसे पढ़ते वक्त पहली नजर में ऐसा लगता है जैसे भारत ने जनता का पैसा पानी की तरह बहा दिया हो और देश की मेट्रो ट्रेनें खाली घूम रही हों। लेकिन रुकिए जरा, क्या यह पूरी सच्चाई है? या फिर बीबीसी ने सिर्फ नेगेटिव पार्ट को पकड़कर पूरी तस्वीर को छुपाने की कोशिश की है?
आज मैं आपको साल 2025-26 के Latest Official Data, DMRC रिपोर्ट, EAC-PM स्टडी और हर एक फैक्ट के साथ असलियत बताऊँगी। हम सिर्फ इस बात पर चर्चा नहीं करेंगे कि बीबीसी की यह रिपोर्ट कितनी Misleading है, बल्कि यह भी देखेंगे कि देश के अलग-अलग शहरों में मेट्रो की राइडरशिप कितनी है, उसकी कमाई क्या है और सबसे जरूरी, इस व्यवस्था से आम आदमी का जीवन कितना आसान हुआ है।
सबसे पहले बात करते हैं मेट्रो नेटवर्क के स्केल की। साल 2014 तक भारत में मेट्रो का दायरा सिर्फ 248 किलोमीटर तक सीमित था, जो केवल 5 शहरों में चालू थी। और आज साल 2025 में स्थिति क्या है? आज 1,013 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबा मेट्रो नेटवर्क देश के 23 शहरों में अपनी सेवाएं दे रहा है।
बीबीसी अपनी रिपोर्ट में कहता है “splurged billions”, हाँ, यह सच है कि इस नेटवर्क को खड़ा करने में करीब ₹2.5 लाख करोड़ लगे हैं, लेकिन इसका नतीजा क्या निकला? आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क बन चुका है। China और USA के बाद हम आज तीसरे नंबर पर खड़े हैं। और क्या आप जानते हैं कि इस नेटवर्क पर रोजाना सफर करने वाले Passengers की संख्या कितनी है? यह आंकड़ा 1.12 करोड़ से भी ज्यादा है।
अब ऐसे में बीबीसी का यह कहना कि यात्री कम हैं, गले नहीं उतरता। चलिए, इसे समझने के लिए शहर-दर-शहर का पूरा ब्रेकडाउन देखते हैं।
पहला शहर है दिल्ली। दिल्ली मेट्रो ने साल 2025 में 23,58,03,000 यात्री यानी कुल 235.8 करोड़ जर्नी पूरी कराई हैं। यहाँ का Daily Average कितना है? करीब 64.6 लाख यात्री।
साल 2024 के मुकाबले यह आंकड़ा और ज्यादा बढ़ा है। इसे अगर आसान शब्दों में समझें तो करीब 64.6 लाख लोग रोज इसमें सफर कर रहे हैं, जिसका मतलब है कि न्यूजीलैंड की पूरी आबादी हर दिन दिल्ली मेट्रो में घूम रही है। यह संख्या शुरुआती प्रोजेक्शन से भी कहीं आगे निकल चुकी है। दिल्ली मेट्रो अकेली ही भारत के कुल मेट्रो ट्रैफिक का आधा हिस्सा संभालती है।
अब बेंगलुरु मेट्रो यानी ‘नम्मा मेट्रो’ को देखते हैं। Financial Year 2024-25 में यहाँ की Average Daily Ridership 7.58 लाख रही। इसी दौरान पहली बार बेंगलुरु मेट्रो का Yearly Revenue ₹1,000 करोड़ के पार पहुंच गया।
इसके बाद मुंबई की Aqua Line (मेट्रो 3) की बात करते हैं, जिसे बीबीसी ने खास तौर पर टारगेट किया है। शुरुआत में इसका प्रोजेक्शन 15 लाख यात्रियों का था, लेकिन इस पूरी लाइन को अक्टूबर 2025 में पूरी तरह ऑपरेट किया गया। अब अप्रैल 2026 तक के आंकड़ों को देखें तो इसमें ट्रैवल करने वालों का काउंट 4 करोड़ को क्रॉस कर चुका है। अगर Daily Average की बात करें तो अकेले एक्वा लाइन पर 1.6 लाख और मुंबई की सभी मेट्रो लाइनों को मिलाकर रोजाना 7.47 लाख यात्री सफर कर रहे हैं (यह साल 2024-25 का डेटा है) और हर महीने इस संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।
इसके बाद चेन्नई, हैदराबाद और कोलकाता का नंबर आता है। Tier-2 Cities की नई लाइनों में शुरुआती तौर पर 25-35% प्रोजेक्शन ही हासिल हो पाया है (जैसा कि IIT Delhi की 2023 की रिपोर्ट में कहा गया है और जिसे बीबीसी ने कोट भी किया है), लेकिन दिल्ली जैसे Mature System तो अपने पुराने प्रोजेक्शन को भी काफी पीछे छोड़ चुके हैं।
बीबीसी ने चालाकी से सिर्फ नए शहरों की शुरुआती कम राइडरशिप वाले आंकड़ों को पकड़ा। लेकिन क्या वे दिल्ली मेट्रो का इतिहास भूल गए? शुरुआती सालों में वहाँ भी ऐसा ही ट्रेंड था, जो आज बढ़कर 64.6 लाख तक पहुंच चुका है। आमतौर पर कोई भी नई मेट्रो लाइन शुरू होने के बाद अगले 2-3 सालों में उसकी राइडरशिप 2 से 3 गुना तक बढ़ जाती है।
अब बात करते हैं मेट्रो की कमाई की। बुनियादी तौर पर मेट्रो प्रोजेक्ट्स शुरू में Depreciation और लोन की वजह से नेट घाटे में चलते हैं, और दुनिया भर के पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में ऐसा ही होता है। लेकिन हमें ऑपरेटिंग सरप्लस को देखना चाहिए। जिस DMRC को बीबीसी अपने आर्टिकल में एक अपवाद (Exception) बता रहा है, क्या उसे बाकी शहरों के लिए एक पॉजिटिव केस स्टडी की तरह नहीं देखा जाना चाहिए?
दिल्ली मेट्रो (DMRC) का Financial Year 2024-25 का डेटा बताता है कि उसका ट्रैफिक रेवेन्यू ₹4,600 करोड़ रहा, जबकि ऑपरेटिंग सरप्लस ₹412.79 करोड़ दर्ज किया गया।
दूसरा उदाहरण बेंगलुरु का है। यहाँ कुल रेवेन्यू ₹1,191 करोड़ का रहा, जिसमें सिर्फ टिकट यानी फेयर से हुई कमाई ₹753 करोड़ थी। बेंगलुरु मेट्रो का ऑपरेटिंग सरप्लस ₹229 करोड़ रहा, यानी रोजाना के ऑपरेशनल खर्च निकालने के बाद भी प्रबंधन के पास 229 करोड़ रुपये बच गए। हाँ, बहीखातों में नेट लॉस जरूर दिख रहा है, लेकिन यह सिर्फ पुरानी देनदारियों (Depreciation) और लोन के ब्याज की वजह से है। असल मायने में मेट्रो कैश पॉजिटिव है, यानी उसके पास रोज का खर्च चलाने और बचत करने के लिए पर्याप्त लिक्विडिटी आ रही है।
अब ऐसे में बीबीसी का यह पूछना कि ‘यात्री कहाँ हैं?’, पूरी तरह से बेमानी लगता है। सच्चाई तो यह है कि इन मेट्रो प्रोजेक्ट्स की कमाई लगातार बढ़ रही है। टिकट के अलावा Advertisements (विज्ञापनों) और स्टेशनों पर दुकानों के किराये आदि से भी बेहतरीन नॉन-फेयर रेवेन्यू जेनरेट हो रहा है। डेटा यही इशारा करता है कि लॉन्ग टर्म में इसका इकोनॉमिक रिटर्न बहुत शानदार आने वाला है। इसके साथ ही मेट्रो के कारण लोगों के समय की बचत हो रही है, ट्रैफिक जाम कम हुआ है और शहरों की इकॉनमी भी तेजी से बूस्ट हो रही है।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर से देश के आम आदमी को जमीन पर क्या फायदा मिल रहा है?
जनवरी 2026 में प्रधानमंत्री की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल (EAC-PM) ने एक बेहद महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की थी। इस स्टडी का टाइटल है—“Golden Decade of Infrastructure” (यानी इंफ्रास्ट्रक्चर का स्वर्ण युग)। यह स्टडी एक बेहद दिलचस्प फैक्ट सामने लाती है कि जिन शहरों में मेट्रो कनेक्टिविटी बेहतर है, वहाँ के लोग बाकी छोटे शहरों या ग्रामीण इलाकों के मुकाबले अपने Home Loan (गृह ऋण) की किश्तों को बहुत बेहतर तरीके से चुका पा रहे हैं। ऐसा क्यों है? क्योंकि मेट्रो में सफर करने से उनका रोज का ट्रैवलिंग खर्च कम हो जाता है, पेट्रोल-डीजल के पैसे बचते हैं और लोग प्राइवेट गाड़ियों का इस्तेमाल कम करते हैं।
इसका सीधा मतलब यह हुआ कि हर महीने एक आम नौकरीपेशा की जेब में ₹1000-2000 एक्स्ट्रा बच जाते हैं। इस बची हुई रकम को लोग अपने लोन की EMI चुकाने में लगा देते हैं। नतीजा यह होता है कि लोन जल्दी खत्म होता है, ब्याज का बोझ घटता है और मानसिक टेंशन दूर होती है।
इसके कुछ आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालते हैं: दिल्ली में मेट्रो कॉरिडोर के पास रहने वाले लोग होम लोन की EMI चुकाने में बाकी इलाकों के मुकाबले 4.42% कम चूकते हैं (यानी यहाँ लोन डिफॉल्ट के मामले बेहद कम हैं) और 1.38% ज्यादा लोग अपना लोन समय से पहले ही चुकता कर देते हैं।
बेंगलुरु की बात करें तो यहाँ EMI चुकाने में होने वाली देरी में 2.4% की कमी आई है, और समय से पहले लोन बंद करने वाले ग्राहकों की संख्या में 3.5% का इजाफा हुआ है।
हैदराबाद में भी यही पैटर्न दिखा; यहाँ EMI चूकने वाले लोग 1.7% कम हुए हैं और समय से पहले लोन सेटल करने वाले लोग 1.8% बढ़ गए हैं।
आसान शब्दों में समझें तो इन तीनों बड़े महानगरों में मेट्रो रूट के आस-पास रहने वाले लोग अपने घर के लोन को जल्दी और बिना किसी रुकावट के चुका पा रहे हैं, जबकि मेट्रो कनेक्टिविटी से दूर रहने वाले लोग आज भी इस मोर्चे पर संघर्ष कर रहे हैं।
यह बदलाव इसलिए मुमकिन हो पाया क्योंकि मेट्रो ने लोगों के मंथली ट्रांसपोर्ट बजट को काफी हद तक कम कर दिया है। पेट्रोल, ऑटो और टैक्सी पर होने वाले भारी खर्च की जो बचत हो रही है, उसे लोग सीधे अपनी ईएमआई में डाइवर्ट कर रहे हैं।
इसके अलावा समय की बचत भी एक बहुत बड़ा फैक्टर है। दिल्ली जैसे शहर में पीक आवर्स के दौरान प्रति ट्रिप करीब 30-50 मिनट की बचत होती है। रोज 10-15 किलोमीटर कम्यूट करने वाले कामकाजी लोगों और कॉलेज जाने वाले छात्रों के लिए यह मेट्रो ट्रेन एक Lifeline बन चुकी है। समय बचने से वे अपने परिवार को ज्यादा वक्त दे पा रहे हैं और उनका मेंटल स्ट्रेस भी कम हुआ है।
इसके साथ ही पर्यावरण को होने वाले फायदे को हम कैसे भूल सकते हैं? दिल्ली मेट्रो ने सड़कों से गाड़ियों का लोड कम करके लाखों टन CO2 उत्सर्जन को बचाया है। शहरों में ट्रैफिक जाम की समस्या कम हुई है और सड़कें पहले से ज्यादा खुली नजर आने लगी हैं।
जरा इमेजिन कीजिए कि मुंबई में ऑफिस जाने वाला एक आम इंसान जो पहले भारी ट्रैफिक में 2 घंटे जूझते हुए दफ्तर पहुंचता था, आज वही शख्स एक्वा लाइन की बदौलत मात्र 45 मिनट में अपनी सीट पर होता है। इस बची हुई ऊर्जा और पैसे का इस्तेमाल वह बच्चों की स्कूल फीस या घर की ईएमआई देने में कर सकता है। ठीक इसी तरह बेंगलुरु के आईटी प्रोफेशनल्स भी शहर के कुख्यात ट्रैफिक हेल से बाहर निकल पाए हैं।
बीबीसी अपने लेख में तर्क देता है कि ‘Integrated Cost’ आम आदमी की इनकम का 20% तक खा जाती है, लेकिन हकीकत यह है कि जैसे-जैसे मेट्रो का Suburban Rail नेटवर्क के साथ इंटीग्रेशन बढ़ रहा है और लास्ट-माइल कनेक्टिविटी सुधर रही है, यह सफर और भी सस्ता होता जा रहा है। यह सिस्टम वाकई आम आदमी की जिंदगी को बदल रहा है—चाहे बात समय की हो, पैसों की हो, स्वास्थ्य की हो या सुरक्षा की। महिलाओं के लिए मेट्रो में मिलने वाली CCTV और AC कोच जैसी सेफ्टी मेजर्स ने उनके सफर को बेहद सुरक्षित बनाया है।
हाँ, व्यवस्था के सामने कुछ चुनौतियाँ जरूर मौजूद हैं। अभी भी कई जगहों पर लास्ट-माइल कनेक्टिविटी उतनी मजबूत नहीं है, Tier-2 शहरों में शुरुआती डिमांड अनुमान से कम है और कुछ रूट्स पर किराया थोड़ा महंगा भी महसूस होता है। लेकिन ये किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के शुरुआती लक्षण मात्र हैं। दिल्ली मेट्रो के शुरुआती दिनों में भी ठीक यही चुनौतियां थीं, लेकिन समय के साथ फीडर बसों और रूट इंटीग्रेशन के जरिए इन्हें काफी हद तक सुधार लिया गया है और बाकी शहरों में भी यही सुधार प्रक्रिया जारी है।
तो फिर बीबीसी की असली समस्या क्या है? बीबीसी का पूरा फोकस सिर्फ उन पैचेस पर है जो फिलहाल Underutilized हैं, और इसी को आधार बनाकर वे यह निष्कर्ष निकालने की कोशिश करते हैं कि भारत को विकास का ऐसा कोई बड़ा रिस्क लेना ही नहीं चाहिए था। वे जानबूझकर उन चुनिंदा आंकड़ों, तथ्यों और संदर्भों को सामने रखते हैं जहाँ कोई नया इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट अभी अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहा है। उनके नैरेटिव के हिसाब से अगर कोई नया एयरपोर्ट, एक्सप्रेसवे, हाई-स्पीड रेल या कोई भी बड़ा मेगा प्रोजेक्ट अपने शुरुआती वर्षों में 100% यूटिलाइजेशन नहीं दिखाता, तो बेहतर है कि देश उसे बनाने का प्रयास ही न करे।
यह नजरिया कितना प्रैक्टिकल है, यह आप खुद सोच सकते हैं। यह तो सीधे तौर पर विकास की बुनियादी अवधारणा को ही नकारने जैसी बात है। आर्थिक विकास हमेशा एक नपे-तुले रिस्क के साथ आता है। कोई भी बड़ा प्रोजेक्ट रातों-रात अपनी फुल कैपेसिटी पर नहीं चलता; उसे अपनी पूरी क्षमता पकड़ने में कुछ सालों का समय लगता है। लेकिन बीबीसी इस बुनियादी आर्थिक और व्यावसायिक सच्चाई को जानबूझकर नजरअंदाज कर रहा है।
पिछले कुछ सालों में हमारे मेट्रो नेटवर्क में हुई चार गुना ग्रोथ (4x Growth) का आंकड़ा खुद चीख-चीखकर गवाही दे रहा है कि ये प्रोजेक्ट्स तेजी से सफल हो रहे हैं। दिल्ली मेट्रो का शानदार रिकॉर्ड तो बीबीसी ने अपने पूरे आर्टिकल में पूरी तरह से इग्नोर ही कर दिया।
उन्होंने ऐसा क्यों किया, इसका सटीक जवाब हमें तब मिलता है जब हम बीबीसी के इस लेख को लिखने वाले लेखक के बैकग्राउंड को खंगालते हैं। बीबीसी पर इस रिपोर्ट को लिखने वाले लेखक निखिल इनामदार हैं। निखिल इनामदार बीबीसी के Senior Editor/Writer हैं और पहले इसके India Business Correspondent भी रहे हैं। इससे पहले वे NDTV Profit में प्राइम टाइम एंकर और कॉरेस्पोंडेंट थे, और Business Standard में कॉलमनिस्ट रह चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने ‘The Wire’, ‘Caravan’, ‘Quartz’, ‘Scroll.in’, ‘Buzzfeed’ और ‘Conde Nast’ जैसी मीडिया वेबसाइट्स के लिए भी लगातार लिखा है।
अगर आप उनके लेखन के इतिहास को देखें, तो वह साल 2014 के बाद भारत में हुई इंफ्रास्ट्रक्चर क्रांति (चाहे वो मेट्रो हो, हाईवे हो या नए एयरपोर्ट्स हों) के प्रति लगातार बेहद आलोचनात्मक और संशयात्मक रहा है। और जिसका असोसिएशन ‘The Wire’ और ‘Caravan’ जैसे प्लेटफॉर्म्स के साथ रहा हो, उनके वैचारिक नजरिए को ज्यादा टटोलने की जरूरत वैसे भी नहीं रह जाती।
यहाँ वेस्टर्न मीडिया का एक क्लासिक और पुराना पैटर्न साफ तौर पर काम करता हुआ दिखाई देता है। भारत में पिछले दशक में जो अभूतपूर्व इंफ्रास्ट्रक्चर क्रांति हुई है, चाहे वो वर्ल्ड-क्लास हाईवेज हों, नए एयरपोर्ट्स हों, आधुनिक रेलवे हो, पोर्ट्स हों या स्मार्ट सिटीज हों, उसे ये विदेशी मीडिया आउटलेट्स लगातार एक “Prestige Project” यानी सिर्फ दिखावे के प्रोजेक्ट का लेबल देने की कोशिश करते हैं। उनका नैरेटिव यह होता है कि ये सारे काम महज सरकार की पीआर इमेज चमकाने के लिए किए जा रहे हैं, इनका वास्तविक विकास से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन मजेदार बात देखिए, ठीक इसी तरह के विशालकाय इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स जब चीन में बनते हैं, जैसे उनका विशाल हाई-स्पीड रेल नेटवर्क या बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव, या फिर यूरोप और अमेरिका में बड़े एयरपोर्ट एक्सपैंशन होते हैं, तो वेस्टर्न मीडिया उसी को ‘Visionary’ और भविष्य का विकास बताने लगता है।
यानी यह पूरी तरह से साफ है कि बीबीसी का यह लेख कोई न्यूट्रल रिपोर्टिंग नहीं, बल्कि ‘India is Chaotic’ (भारत में सब अस्त-व्यस्त है) वाले पुराने ढर्रे के नैरेटिव को दोबारा पुश करने की एक सोची-समझी कोशिश है। लेकिन जमीनी डेटा चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि यह भारत के सफल होते इंफ्रास्ट्रक्चर की एक बेहतरीन कहानी है। बीबीसी का यह आर्टिकल पूरी तरह से इनकम्प्लीट और Misleading है। सच तो यह है कि भारत इस वक्त एक बड़े Urban Mobility Revolution के दौर से गुजर रहा है। हमारी मेट्रो प्रणालियों ने देश के आम आदमी को कीमती समय दिया है, उसके पैसे बचाए हैं और उसके जीवन स्तर को सुगम बनाया है। साल 2025-26 में इसके नए एक्सपैंशन फेज तैयार हो रहे हैं और देश के Tier-2 शहरों में भी इस परिवहन प्रणाली को तेजी से स्केल-अप किया जा रहा है।





