The 300-Page Report Leftists Tried to Bury

गिरिजा टिक्कू से हमास तक: 13 तरीकों से यौन आतंक फैलाने वाले ‘रेगिस्तानी कल्ट’ पर 300 पन्नों की रिपोर्ट

Summary
कश्मीर में गिरिजा टिक्कू को जिंदा आरी से काटने वाली और 7 अक्टूबर को इज़राइल में हमास द्वारा की गई हैवानियत की जड़ें एक ही 'जिहादी कल्ट' से जुड़ी हैं। जानिए 300 पन्नों की उस 'Silenced No More' रिपोर्ट का कड़वा सच, जिसने सबूतों के साथ वैश्विक मानवाधिकार संगठनों और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम के 'दोहरे इनकार' (Double Denial) के मुंह पर तमाचा जड़ा है।

कश्मीर में जून 1990 का महीना… गिरिजा टिक्कू नाम की एक लैब असिस्टेंट को फोन आता है कि वो अपनी रुकी हुई सैलरी लेने आ जाएँ। उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिया गया, लेकिन वह कभी घर नहीं लौटीं। उनके साथ जो हुआ, वह इंसानियत के नाम पर क्रूरता का अध्याय है। जिहादी उस दिन गिरिजा को गांव से दूर किडनैप कर के ले गए। कई दिनों तक बर्बरता और हैवानियत की सारी हदें पार करते हुए कई दिनों तक बार-बार उनके साथ दुष्कर्म किया गया। ऐसा कोई अत्याचार नहीं था, जिसे गिरिजा ने ना झेला हो। कई दिनों के सामूहिक बलात्कार के बाद, उन्हें एक लकड़ी काटने वाली मशीन से ज़िंदा दो टुकड़ों में काट दिया गया।

आप सोच रहे होंगे कि मैं आज गिरिजा टिक्कू की बात क्यों कर रहा हूँ? क्योंकि आज से ठीक दो साल पहले इज़राइल में जो हुआ, उसकी जड़ें, उसकी मानसिकता और उसके बाद होने वाला ‘इन्कार’/Denial… बिल्कुल वैसा ही है जैसा भारत दशकों से झेल रहा है।

जब हम युद्ध की बात करते हैं, तो अक्सर गोलियों और धमाकों की आवाज सुनाई देती है। लेकिन 7 अक्टूबर, 2023 को इज़राइल पर हुए हमास के हमले में एक ऐसा शोर भी था, जो किसी भी धमाके से ज्यादा डरावना था। यह साइलेंस था उन महिलाओं और बच्चों का, जिनके साथ वह सब हुआ जिसे बयान करना भी मुश्किल है, और उनकी अपराधी है अरब कल्ट की मानसिकता, जिसके लिए महिलाएँ सिर्फ़ माल ए गनीमत रही हैं। 

इज़राइल के नागरिक आयोगने 300 पन्नों की एक रिपोर्ट जारी की है, ‘साइलेंस्ड नो मोर’ (Silenced No More) । डॉ. कोचाव लेवी (Dr. Cochav Elkayam-Levy)  की टीम ने हमास के अपराधों का एक ऐसा कलेक्शन तैयार किया है जो यह साबित करता है कि यहूदी महिलाओं के खिलाफ की गई यौन हिंसा को एक ‘हथियार’की तरह इस्तेमाल किया गया था। 300 पन्नों की ये रिपोर्ट हमास के उन अपराधों का वॉटरशेड मोमेंट है, जिन्हें दुनिया झुठलाने की कोशिश कर रही थी। 

यह रिपोर्ट इसलिए ज़रूरी है क्योंकि भारत की तरह इज़राइल में भी दुनिया के बड़े-बड़े मानवाधिकार संगठन इन अपराधों को ‘नकार’ रहे थे। रेगिस्तानी कल्ट वाले जब भी ऐसे क्राइम्स में देखें जाते हैं तो उन्हें शील्ड देने वाले अक्सर पूछते हैं कि ‘सबूत क्या है?’ डॉ. लेवी की टीम ने दो साल लगाकर सबूतों का एक ऐसा पहाड़ खड़ा कर दिया है कि उसे नकारना नामुमकिन है। 

इस जांच की गहराई को देखें तो इसमें 10,000 से भी ज़्यादा फोटो और वीडियो क्लिप्स शामिल हैं और करीब 1,800 घंटों से ज़्यादा का visual content collect किया गया है। इसके अलावा, टीम ने बचे हुए लोगों, बंधकों और गवाहों के 430 से भी ज़्यादा इंटरव्यू और गवाहियां रिकॉर्ड की हैं। खास बात यह है कि इस पूरी घटना का असर 52 अलग-अलग देशों के लोगों पर पड़ा है,  

ये सबूत सिर्फ इज़राइल से नहीं आए। अपराधियों और हमलावरों ने खुद अपने ‘गो-प्रो’ कैमरों से इन अपराधों को रिकॉर्ड किया और victims के ही सोशल मीडिया अकाउंट्स से लाइव स्ट्रीम किया। उन्होंने अपने अपराधों को एक ‘वॉर ट्रॉफी’ की तरह दुनिया को दिखाया।

यह जिहादी पागलपन एक पुराना कल्ट है जिसे‘तहर्रुष गेमिया’ (Taharrush Gamea) कहा जाता है? इसमें भीड़ को ही यौन आतंक के हथियार में बदल दिया जाता है, जहाँ ‘सर्कल ऑफ हेल’ बनाकर सरेआम महिलाओं के वजूद को मिटाने का खेल खेला जाता है। हमास के आतंकियों ने भी यही किया। अगवा की गई यहूदी महिलाओं का राउंड टेबल गेम की तरह बारी बारी से रेप किया गया और उनको प्रताड़नाएं दी गईं। एक आउटर सर्कल भी बनाया ताकि कोई भाग ना सके।

“I heard one rape where they were passing her around. She was probably injured, judging by her screams — screams you have never heard anywhere. It’s between silence and screams, between pain and wanting to die,” eyewitness Darin Komarov told the Civil Commission of crimes at the Nova music festival. And after one finished, he told another to go up: ‘Ta’al’ [in Arabic], like to the next one. And apparently there was a round… And after they finished, they shot her,” she said.

13 Recurring Forms of Violence 

अक्सर युद्ध के दौरान अराजकता (chaos) में अपराध होते हैं। लेकिन इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि 7 अक्टूबर को जो हुआ, वह ‘अराजकता’ नहीं थी। वह एक ‘सुनियोजित रणनीति’ (systematic strategy) थी। हमास ने यौन हिंसा को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। रिपोर्ट कहती है कि हमास ने 13 अलग-अलग तरीकों से यौन आतंक फैलाया। इसमें सामूहिक बलात्कार, अंगों को काटना और मौत के बाद भी शवों का अपमान शामिल था।

आयोग ने 13 ऐसे तरीके पहचाने हैं जो बार-बार अलग-अलग जगहों पर दोहराए गए। चाहे वो किबुत्ज़ हो या नोवा म्यूज़िक फेस्टिवल, पैटर्न एक ही था:

  1. सामूहिक बलात्कार (Gang Rape)
  2. यौन प्रताड़ना (Sexual Torture)
  3. अंग-भंग (Mutilation)
  4. मृत्यु के बाद शवों का अपमान (Postmortem abuse)
  5. सार्वजनिक नग्नता (Forced nudity)
  6. बंधक बनाकर यौन गुलामी… और ऐसे ही 13 जघन्य कृत्य।

जब एक ही तरह का अपराध दर्जनों अलग-अलग जगहों पर एक ही समय में होता है, तो वह ‘हादसा’ नहीं, बल्कि ‘ऑपरेशनल मेथड’ कहलाता है। विक्टिम्स के प्राइवेट पार्ट्स में जानबूझकर गोलियां मारी गईं 

महिलाओं की हत्या के बाद भी उनके शवों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया; आतंकियों ने जीवित महिलाओं के स्तन काट दिए; शवों के अलावा ज़िंदा महिलाओं के प्राइवेट पार्ट्स में चाकुओं की ब्लेड और रॉड्स डाली गईं।

हमास के आतंकियों ने इज़राइल में जो किया, वह ‘तहर्रुष गेमिया’ के उस कल्ट का हिस्सा था जो कश्मीर की गिरिजा टिक्कू से लेकर केरल की लव जिहाद की कहानियों तक एक ही पैटर्न पर चलता है: पहले उन्हें काफिर घोषित करो, फिर उसके साथ हैवानियत करो, और फिर यौन हिंसा को हथियार बना लो। चाहे वो 1990 का कश्मीर हो या ‘लव जिहाद’ और ‘ग्रूमिंग’ के मामले। यहाँ पैटर्न एक ही है, पहले शिकार की पहचान करना, फिर उसे असुरक्षित करना और आख़िर में उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करना ताकि पूरे समाज में डर बैठ जाए।

‘किनोसाइड’ (Kinocide) – परिवार पर हमला 

डॉ. एल्कयम-लेवी ने इस रिपोर्ट में एक नया शब्द इस्तेमाल किया है, ‘किनोसाइड’ (Kinocide)। ‘किन’ (Kin) यानी आपका परिवार। किनोसाइड का मतलब है, परिवार की आत्मा को नष्ट करना।

हमास ने सिर्फ इंसानों कोनहीं मारा,  उन्होंने रिश्तों को हथियार बनाया। सोचिए, किसी पिता को उसकी बेटी के साथ हो रही दरिंदगी देखने पर मजबूर करना, या बच्चों के सामने उनकी मां का अपमान करना। रिपोर्ट में ऐसे मामले भी हैं जहां परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे के खिलाफ यौन कृत्य करने के लिए मजबूर किया गया। बच्चों के सामने उनकी माँ का बलात्कार किया और इसे परिवार के ही फोन से लाइव स्ट्रीम कर दिया.. 

इसका मकसद केवल शारीरिक चोट पहुँचाना नहीं था, बल्कि परिवार की संरचना को हमेशा के लिए तोड़ देना था। यही मानसिकता हमने कश्मीर में देखी थी, जहाँ परिवारों को यहूदी-विरोधी नहीं, बल्कि ‘काफिर’ कहकर निशाना बनाया गया और उनके सामने उनके अपनों को खत्म किया गया ताकि वे लोग अपने घर छोड़ने पर मजबूर हो जाएं और अपने अस्तित्व से ही नफ़रत करने लगें. 

गाजा में बंधकों का दर्द 

यह हिंसा सिर्फ 7 अक्टूबर तक सीमित नहीं रही। रिपोर्ट बताती है कि गाजा की सुरंगों में कैद बंधकों के साथ आज भी यह अत्याचार जारी है। रिहा हुई महिलाओं और यहां तक कि पुरुषों ने भी यौन शोषण की गवाही दी है। संयुक्त राष्ट्र (UN) की प्रतिनिधि प्रमिला पैटन ने भी अपनी जांच में इसे विश्वसनीय जानकारी माना है।

यह एक निरंतर चलने वाला ‘सेक्सुअल टेरर’ (Sexual Terror) है, जो बंधक बनाए गए लोगों को मनोवैज्ञानिक रूप से खत्म करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

गाजा की सुरंगों में बंधकों के साथ जबरन निकाह और धर्मांतरण की कोशिशें हुईं। यह भारत के ‘लव जिहाद’ या ‘ग्रूमिंग’ पैटर्न से बहुत मिलता-जुलता है, जहाँ व्यवस्थित तरीके से महिलाओं को फंसाकर आतंकवाद के रास्ते पर धकेला जाता है। आपको याद होगा जब भारत में ‘द केरला स्टोरी’ जैसी फिल्में आती हैं, जो इन बातों को दिखाती हैं, तो एक पूरा इकोसिस्टम उसे ‘प्रोपेगेंडा’ कहकर बैन करने की मांग करने लगता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे हमास के अपराधों को आज वैश्विक शैक्षणिक संस्थान और संयुक्त राष्ट्र के कुछ हिस्से नकार रहे हैं।

इनकार के खिलाफ जंग 

इतना सब कुछ होने के बावजूद, डॉ. एल्कयम-लेवी कहती हैं कि उन्हें सबसे ज्यादा दुख ग्लोबल डिनायल से हुआ। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, कुछ विश्वविद्यालयों और मानवाधिकार संगठनों ने हफ्तों तक इस पर साइलेंट रहना चुना। कुछ ने तो सबूतों पर ही सवाल उठाए।

यह रिपोर्ट उस इनकार को खामोश करने के लिए है। यह उन लोगों को जवाब है जो कहते हैं कि ‘ऐसा नहीं हुआ था’। डॉ. एल्कयम-लेवी का मानना है कि यह चुप्पी दुनिया भर में यहूदी-विरोध (Anti Semitism) को बढ़ावा देती है। डॉ. एल्कयम-लेवी कहती हैं कि यह ‘दोहरा इनकार’ (Double Denial) है। एक तरफ अपराधी वीडियो बना रहे हैं, दूसरी तरफ दुनिया कह रही है, ‘नहीं, ऐसा नहीं हुआ’। भारत में गिरिजा टिक्कू के मामले में भी दशकों तक मानवाधिकार कार्यकर्ता चुप रहे.. और ऐसे ही हजारों, लाखों अपराधों पर बात ही नहीं की जाती.. आप आजकल ही TCS के केस को देख लीजिए.. कितनी मीडिया इसके बारे में बात भी कर रही हैं?

7 अक्टूबर हो या 19 जनवरी 1990… जगह बदलती है, तारीख बदलती है, लेकिन जिहादी मानसिकता वही रहती है.. तो, ‘साइलेंस्ड नो मोर’ हमें क्या सिखाती है? यह हमें बताती है कि न्याय के लिए सिर्फ आंसू काफी नहीं हैं, अकाट्य साक्ष्य (Rigorous Evidence) चाहिए। यह 300 पन्ने आने वाले सालों में अंतरराष्ट्रीय अदालतों में हमास के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार होंगे।

आज जब हम यह वीडियो देख रहे हैं, कई बंधक अभी भी वहां हैं। यह रिपोर्ट उनकी आवाज़ है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कश्मीर से लेकर केरल और अब इजरायल तक इन अपराधों को न तो भुलाया जाए और न ही इतिहास की धूल में दबाया जाए। ऐसा करने के प्रयास भी होंगे क्योंकि होते आए हैं – एक पूरी टोली है जिसकी नज़रों में ग़ैर मुस्लिम महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध अपराध होते ही नहीं हैं … लेकिन जरूरत बस यही है – जैसा कि रिपोर्ट का टाइटल ही कहता है, अब और चुप्पी नहीं। 

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