देश में जब भी किसी भी पेपर लीक का मामला सामने आता है, तो सबसे बड़ा सवाल सरकार पर दागा जाता है। लगभग सभी हेडलाइंस में गुनहगार नंबर वन सरकार को ठहरा दिया जाता है। प्रधानमंत्री से सीधी बात और कड़े सवाल पूछे जाने लगते हैं। लेकिन क्या आपने कभी ये सोचा है कि इन कड़े सवालों की आड़ में वो असली गुनहगार अक्सर छुप जाते हैं जो पैरासाइट की तरह इस सिस्टम से चिपके हुए हैं। उस सीधी बात में कभी वो सीधा जवाब मिल ही नहीं पाता कि असली गुनहगार कौन है? कौन हैं वो लोग जो IIT दिल्ली और IIT मुंबई जैसे बड़े संस्थानों से बनकर चले पेपर को हजारों किलोमीटर की सुरक्षित यात्रा के बाद हजारीबाग या लातूर या बलिया के एक एग्जाम सेंटर में पहुँचने पर परीक्षा शुरू होने के एक घंटे पहले निकालकर लीक कर देते हैं? मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि क्या आप पिछले पचास साल में लीक हुए एक भी पेपर को लीक करने वाले मास्टरमाइंड का नाम बता सकते हैं? ये वो सवाल है जो सामान्यतः इस शोर में नहीं पूछा जा सकता है; इसके खतरे हैं कि कह दिया जाएगा कि अरे, प्रधानमंत्री से तो आपने सवाल पूछा ही नहीं, आखिर फिर सवाल कड़ा कैसे होगा आपका?
तो मैं अपनी बात प्रदीप सैनी की एक कविता से शुरू करना चाहता हूँ:
आसान है करना प्रधानमंत्री की आलोचना,
मुख्यमंत्री की करना उससे थोड़ा मुश्किल,
विधायक की आलोचना में ख़तरा ज़रूर है,
लेकिन ग्राम प्रधान के मामले में तो पिटाई होना तय है।
स्थानीयता के सारे संघर्ष खतरनाक हैं,
भले ही वे कविता में हों या जीवन में।
आपको मैं पेपर लीक के मसले पर प्रधानमंत्री से थोड़ा दूर और हकीकत के थोड़ा करीब, स्थानीयता के थोड़ा करीब लेकर चलूँगा और आपके साथ पेपर लीक की समस्या को थोड़ा प्रैक्टिकल ढंग से समझने की कोशिश करूँगा।
पिछले पाँच साल में NEET के कम से कम two एग्जाम्स पर पेपर लीक का साया मंडराया है। एक ताज़ा मामला है साल 2026 का और दूसरा मामला है साल 2024 का। मैं पहले आपको साल 2024 में लेकर जाना चाहता हूँ। मामला है NEET के पेपर लीक का। और मैं जो भी आपको बताऊँगा, वो CBI के हवाले से आई जानकारी के आधार पर बताऊँगा।
24 लाख स्टूडेंट्स ने 5 May 2024 को देश के अलग-अलग हिस्सों में एग्जाम दिया। 4 June को रिजल्ट आया और पता चला कि 67 स्टूडेंट्स ने 720 में से 720 नंबर हासिल किया है। और अधिक चौंकाने वाला मामला ये था कि बहुत सारे स्टूडेंट्स एक ही सेंटर के थे। बवाल हुआ और मामले में जाँच की माँग होने लगी। जाँच का आदेश हुआ और जब जाँच आगे बढ़ी तो एक खतरनाक कहानी पता चली। पता ये चला कि 5 May को पेपर के करीब एक घंटे पहले झारखंड के हजारीबाग में Oasis School में सेंटर बना हुआ था। स्कूल के principal एहसानुल हक और सेंटर के superintendent ने पंकज कुमार उर्फ़ आदित्य नाम के एक व्यक्ति को कुछ पैसे लेकर परीक्षा से कुछ घंटे पहले स्ट्रॉंग रूम, जहाँ पर पेपर रखा हुआ था, उसमें एंट्री दी। CBI की रिपोर्ट के मुताबिक उस स्ट्रॉंग रूम में दो दरवाज़े थे। मेन दरवाज़े पर ताला लगा हुआ था और जानबूझकर पिछला दरवाज़ा खुला रखा गया। आठ बजकर दो मिनट पर पंकज को उस कमरे में घुसाया गया और एक घंटे बीस मिनट बाद, यानी नौ बजकर तेइस मिनट पर, वो उस कमरे से बाहर निकल गया। इस दौरान उसने पेपर का एक्सेस हासिल किया, उसकी फोटो ली और अपने नेटवर्क को भेज दिया। फिर वहाँ से उस पेपर को 7 MBBS qualified स्टूडेंट्स को भेजा गया। ये सभी छात्र AIIMS पटना, RIMS रांची और अन्य बड़े मेडिकल कॉलेजेस में enrolled थे। इन्होंने पेपर solve किए और इनके ज़रिए total 155 NEET का एग्जाम देने वाले अभ्यर्थियों को फ़ायदा पहुँचा।
अब इस पूरे केस में जो machinery involved है, वो कौन लोग हैं? वो लोग इस पूरी प्रक्रिया के सबसे निचले स्तर पर हैं। और एक विशेष समूह को फ़ायदा पहुँचाने के लिए पैसे लेकर उन लोगों ने काम किया। इसमें सात MBBS की degree pursue करने वाले लड़के थे, जिस स्कूल में सेंटर बना उसके principal और vice-principal involved थे, और कुछ ऐसे लोग जो उस इलाके में अपना प्रभाव रखते हैं, जिनके पास जाकर अपने बेटी या बेटे को डॉक्टर बनाने का सपना देखने वाले अमीर माँ-बाप ने रुपये का बंडल रख दिया।
अब यहाँ से दो सवाल पूछे जा सकते हैं: झारखंड की कांग्रेस समर्थित झारखंड की JMM सरकार क्या कर रही थी, NDA की सरकार बिहार में क्या कर रही थी, और कड़े सवाल प्रधानमंत्री से भी पूछे जा सकते हैं। कुल मिलाकर ये बात कही जा सकती है कि सरकार ने leak-proof व्यवस्था क्यों नहीं बनाई? लेकिन यहीं दूसरा सवाल है कि actually में इस लीक को करने वाले लोग कौन थे? अपने बच्चे को डॉक्टर बनाने की चाहत में पागल माँ-बाप कौन थे? वो सभी लोग इस देश की साठ से सत्तर फ़ीसदी आबादी का हिस्सा थे, हमारे और आपके जैसे लोग थे। इसी वजह से जब ये मामला कोर्ट में पहुँचा तो कोर्ट ने पूरी परीक्षा को रद्द करने से इंकार किया, यही कहते हुए कि ये systematic breach नहीं था, इसके पीछे कोई nationwide nexus नहीं था। यहाँ दाल में ही नमक था, नमक में दाल नहीं थी। लेकिन कितने लोगों को ये बात समझ में आएगी कि एक लीक हुई परीक्षा जितनी सरकार की जिम्मेदारी होती है, उतनी ही उस व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर मौजूद लोगों की भी जिम्मेदारी होती है? और वहाँ सबसे पहले आते हैं वो माँ-बाप, जिनका बस चले तो अपने बच्चों को पैदा होते ही गर्दन में stethoscope की टाई पहना दें।
ये पूरा भ्रष्टाचार का नेक्सस इसलिए साँस लेता है, इसलिए ज़िंदा है क्योंकि हमें लाइन तोड़कर कोई काम कर लेने के बाद की आत्मश्लाघा का आनंद सबसे पवित्र लगता है। हम ये बताने में बहुत विश्वास करते हैं कि आज रेड तोड़ कर आया और पुलिस वाला दूर से देखता रह गया। और यहाँ ये बात ध्यान रहे कि मैं सरकार के उत्तरदाायित्व के प्रश्न को बिल्कुल नकार नहीं रहा हूँ। NTA के द्वारा center allocation में जो गड़बड़ियाँ हुई हैं, उसको नकार नहीं रहा हूँ, बल्कि मैं इस सवाल के शोर भरे जवाब से हटकर एक दूसरा जवाब और दूसरा नज़रिया देखने और दिखाने की कोशिश कर रहा हूँ।
एक और उदाहरण देता हूँ। 1992 में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार थी, राजनाथ सिंह शिक्षा मंत्री थे और प्रदेश में होने वाले हाईस्कूल और इंटर की परीक्षा में नकल एक बड़ी समस्या थी। उन्होंने नकल-विरोधी कानून बनाया और उसमें ये प्रविधान हुआ कि नकल करते हुए पकड़े जाने पर छात्र से लेकर अध्यापक और उस पूरे process में involved लोग जेल जाएँगे। संवैधानिक दायरे में नकल और पेपर लीक रोकने का ये सबसे कारगर उपाय था। लेकिन 1993 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए। समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने कहा कि वो सरकार में पहुँचेंगे तो इस कानून को ख़त्म कर देंगे। उत्तर प्रदेश के युवाओं और उनके परिजनों ने मुलायम सिंह को सरकार में लाया और वो कानून ख़त्म हो गया। मैं आज भी उस दौर के लोगों से मिलता हूँ, तो उस जमाने में थर्ड डिवीजन पास हुए लोग ये फ़क़्र से बताते हैं कि हमने राजनाथ सिंह के दौर में एग्जाम पास किया था, और अगले साल के फर्स्ट डिवीजन पास हुआ व्यक्ति भी वो गर्व चेहरे पर नहीं ला सकता है। अब इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है?
और मैं सिर्फ़ एक नहीं, ऐसे कई नेताओं के उदाहरण इसी उत्तर प्रदेश और बिहार के दे सकता हूँ, और जो लोग ये वीडियो देख रहे हैं, वो भी ईमानदारी से बता सकते हैं कि विधायक और सांसद अपने स्कूल और कॉलेज इसीलिए खोला करते थे ताकि वो नकल करवाकर बच्चों को पास करवायें और उनके माँ-बाप उन्हें वोट दें। हम इस समाज में रहते हैं।
आज एक बच्चा UPSC, IIT, MBBS, SSC, चपरासी, सिपाही, दारोगा, बैंक क्लर्क, PO या किसी राज्य की अन्य कोई भी प्रतियोगी परीक्षा को पास कर लेता है, तो अठारह coaching संस्थान उसी एक बच्चे पर claim करने के लिए आज जाते हैं कि इसे हमने पढ़ाया है। आज 2026 में जिस NEET का पेपर लीक होने की बात सामने आ रही है, उसमें बाईस लाख बच्चों ने परीक्षाएँ दी हैं। और उसमें 21 लाख 99 हजार 999 बच्चे coaching संस्थानों में जाते होंगे। NSSO की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कम से कम सात करोड़ छात्र किसी ना किसी तरह से coaching संस्थानों से जुड़े हैं। भारत में कोचिंग का कारोबार ऑनलाइन और ऑफलाइन को मिलाकर करीब साठ हज़ार करोड़ के मूल्य का है और 2028 से 2034 के बीच में ये कारोबार दो गुना तक हो सकता है। आज आप देश के किसी भी शहर में चले जाएँ तो आपको एक पूरा इलाका कोचिंग से पटा पड़ा मिलेगा। बड़े शहरों में चार बाई छह के कमरों में बच्चे रह रहे हैं। और ये पूरी industry चल सके उसके लिए उनके माँ-बाप एक बड़ा पैसा खर्च करते हैं।
हमने NEET के बच्चों को हैदराबाद में पढ़ाने वाले एक अध्यापक सत्येंद्र त्रिपाठी से बात की। उनका भी कहना है कि शिक्षा का व्यापारीकरण एक बड़ी वजह है। Coaching संस्थान आज एक व्यापारी संस्थान की तरह काम कर रहे हैं।
और आज जिस वजह से हम ये पूरे विषय पर बात कर रहे हैं, वो NEET 2026 के पेपर लीक का मामला है। इसमें पकड़े गए लोगों की profile थोड़ा आप देख लीजिए तो शायद तस्वीर और अधिक clear हो जाएगी। मनीषा गुरुनाथ मंधारे नाम की एक botany की अध्यापिका को पुणे से गिरफ्तार किया गया है। CBI ने कहा कि वह NEET UG 2026 परीक्षा प्रक्रिया में शामिल थी और उसे National Testing Agency द्वारा एक विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया गया था। इस अध्यापिका के पास botany और zoology प्रश्न पत्रों तक पूरी पहुँच थी। और उसने इस नियुक्ति का फ़ायदा अपने coaching के premium स्टूडेंट्स को देने के लिए उठाया। उसने इन पेपरों से सवाल निकाले और special classes के ज़रिए उन स्टूडेंट्स को वह सबकुछ पढ़ाया। अगर ये पकड़ी नहीं जाती, तो पुणे में उन selected बच्चों को माला पहनाते या मिठाई खिलाते, इसके बड़े-बड़े पोस्टर लगते और अगली बार पुणे में पढ़ने वाले सारे बच्चे NEET की तैयारी करने इसके पास आते।
अध्यापक सत्येंद्र त्रिपाठी का कहना है कि NTA के द्वारा परीक्षा प्रक्रिया में शामिल किए जाने वाले अध्यापकों को एक अलग और सुरक्षित environment में रखने की आवश्यकता है। यदि उन अध्यापकों को बाहर जाने का मौक़ा नहीं मिलेगा, तो ऐसी धांधली होने के chances कम होंगे।
अब तक कुछ नौ लोगों को CBI ने गिरफ्तार किया है। और ये सारे coaching पढ़ाने वाले master हैं। पुणे से ही chemistry के एक teacher P.V. Kulkarणी को गिरफ्तार किया गया। NTA के द्वारा इस teacher को भी परीक्षा में विशेषज्ञ के तौर पर शामिल किया गया था और इसने भी अपने premium स्टूडेंट्स के लिए पुणे में अपने घर पर छात्रों के लिए special coaching classes आयोजित कीं। इन सत्रों के दौरान, पेपर के प्रश्न, उसके विकल्प और सही उत्तर बताए, जिन्हें छात्रों ने अपनी notebook में लिख लिया।
अब सवाल फिर से वही है: अगर मुन्सिफ ही कातिल बन जाएगा, तो ज़माने में कौन सर उठा के चल सकेगा? और मैं इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ कि सड़क की अगर नाली में कचरा फँसा है, तो उसके लिए Mohandas Karamchand Gandhi को guilty ठहराया जाए, क्योंकि उनकी photo देश के स्वच्छता अभियान के बैनर में लगी हुई है।
और मैं फिर से कह रहा हूँ कि इन सब के बाद भी सरकार की accountability ख़त्म नहीं होती है। लोकतंत्र का इतना महान पर्व पिछले आठ दशक से हम इसीलिए मनाते हैं ताकि इन सारी समस्याओं का हल निकालने वाला कोई हो, और जब कोई गड़बड़ी हो तो हमारे सामने कोई हो जिसके सर पर ठीकरा फोड़कर उससे सवाल पूछ सकें। लेकिन ध्यान रहे कि सिर्फ़ सरकार की accountability पर intellectual gymnastics से समस्या कभी भी हल नहीं हो सकेगी। जब तक एक परीक्षा fail हो जाने के बाद कोटा या दिल्ली में किसी बच्चे के जहन में ये डर रहेगा कि मेरे माँ-बाप ने इतना invest कर दिया है और उसकी क्या value वापस मैं निकाल पा रहा हूँ, तब तक ये market और ये चलन नहीं ख़त्म होगा।
NTA ने नए regulations निकाल दिए हैं; अब बाक़ी परीक्षाओं की तरह NEET की परीक्षा भी online, यानी CBT माध्यम से होगी। शायद आने वाले दिनों में हमें JEE जैसी साफ़-सुथरी व्यवस्था देखने को मिले। लेकिन कल एक और परीक्षा होगी, एक और पेपर लीक की बहस उठेगी। उसके पहले अगर हम ये समझ जाएँ कि दिल्ली से चला हुआ पेपर UP, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, केरल में जाकर अगर लीक होता है, तो सिर्फ़ सरकार guilty नहीं है; उसके और बड़े और निर्दय guilty हमारे और आपके आसपास में रहने वाले लोग हैं।
Top-down approach से अगर किसी जवाब को इतने वक्त में नहीं ढूँढा जा सका है, तो वहाँ सर मारने के बजाए bottom-up approach लगाया जाए तो शायद जवाब मिल जाए। हालांकि NTA और सरकार की जिम्मेदारी हमारे इन तर्कों के बाद ख़त्म नहीं होती है। NTA की कार्यप्रणाली में समस्याएँ हैं, और मुझे लगता है उन पर विस्तार से बहुत सारे लोगों ने बातें की हैं और उनमें कई ऐसी बातें हैं जिन्हें address किया जाना ज़रूरी है।
और आखिर में दो बातें। पहला कि, इस देश में एक trend चलता है: आज से एक दशक पहले यही लालच IIT को लेकर था, क्योंकि वहाँ admission का मतलब था अमरीका का वीज़ा और जीवन की गुणवत्ता में overnight change आना। आज NEET के साथ भी वही हाल है। वही लालच सबसे बड़ी वजह है कि दशकों की ग़रीबी में डूबा परिवार अपना सबकुछ दाँव पर लगाकर अपने बेटे या बेटी को डॉक्टर बनाना चाहता है। और जिसके पास पैसा है, वो परिवार चाहता है कि घर की name plate के आगे एक और डॉक्टर का नाम जुड़ जाए। इसका primary example राजस्थान की Biwal family का है, जिसमें एक ही घर की कम से कम चार लड़कियाँ अलग-अलग मेडिकल कॉलेजेस में पढ़ रही हैं और इस बार घर के एक और लड़के को डॉक्टर बनाने का जुगाड़ उन लोगों ने लगाया और पकड़े गए। उसके बाद से वो लड़कियाँ कॉलेज campus से और वो परिवार अपने घर से ग़ायब है। और इन्होंने जब अपने बच्चों को successful बनाया, उसके बाद पुलिस का मानना है कि पूरा network ही बना लिया, जिसमें अब वो पेपर लीक करके बेचने भी लगे थे। ये इस पूरी वीडियो के तर्कों से किसी को समस्या है, तो उसके लिए मैंने बताया है: इस कहानी को अगर देख लेंगे तो शायद ये समझ आए कि मैं बार-बार क्यों कह रहा हूँ कि ये समस्या अगर सरकार के पलड़े में 19 जाती है, तो दूसरे पलड़े में जिसमें हम सभी आते हैं, उसमें 19 से कम की बात होगी, तो बात अधूरी ही रह जाएगी।
और दूसरी बात इसी से जुड़ी हुई: जब तक सिर्फ़ सरकार पर आप दोष मढ़ते रहेंगे, तब तक आप उन असली guilty को बचाते रहेंगे। अगर सड़क टूटी है तो सरकार दोषी है, लेकिन अपने घर के सामने बने खड्ड़े से ईंट उखाड़कर घर में रख लेने वाले लोग भी कम दोषी नहीं हैं; सरकारी कार्यक्रम से गमले चुराने वाले लोग कम दोषी नहीं हैं। जिस तरह से परमाणु chain reaction पर काम करते हैं, उसी तरह से ये समाज भी काम करता है। एक सिरे को खींचते रहेंगे तो समस्या पर बात हो सकेगी, लेकिन समस्या हल नहीं हो सकेगी।




