अगर आपको याद हो, तो 2024 के लोकसभा चुनावों के पहले कांग्रेस के विदेशी नेता सैम पित्रोदा ने एक ट्वीट में पचास हेडलाइन्स को शेयर करते हुए कहा था कि देखो, विदेशी मीडिया मोदी के भारत के बारे में क्या सोचती है। ये सारी हेडलाइन्स दुनिया के कथित प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों जैसे टाइम मैगज़ीन, ब्लूमबर्ग, रॉयटर्स, Deutsche Welle, न्यूयॉर्क टाइम्स की थीं। ये हेडलाइन्स “Modi’s Temple of Lies” से शुरू होकर “Progressive South Is Rejecting Modi”, “The ‘mother of democracy’ is not in good shape”, और “Narendra Modi’s Hindu nationalist government is escalating its attack on civil rights” तक लिखी गईं थीं।
और अब, जब 2026 में पश्चिम बंगाल में पहली बार और असम में लगातार तीसरी बार भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाई है, तब भी इन सभी मीडिया संस्थानों की भाषा जस की तस ही दिख रही है। अल जज़ीरा ने हेडलाइन लगाई कि “What Modi’s big win in Indian state elections could mean for its democracy”; न्यूयॉर्क टाइम्स ने हेडलाइन लगाई “A One Party India; Why Narendra Modi has no rival left”; न्यूयॉर्क टाइम्स तो रुका ही नहीं, इसके बाद एक और हेडलाइन लगाई कि “Modi’s Hindu Nationalists Conquer a Bastion of India’s Opposition”; इसके बाद एक और हेडलाइन लगाई कि “India’s Elections Deliver an Upset: What to Know”; इसके बाद Economist ने लिखा, “In both West Bengal and Assam the BJP won a big share of Hindu voters in part by stirring up fear of Muslims.” मैं इसके आगे आपको कम से कम एक दर्जन हेडलाइन्स गिनवा सकता हूँ, जिसमें इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया।
नरेंद्र मोदी और लीडरशिप के लिए यह एक बड़ी राजनीतिक सफलता थी; भारतीय जनता पार्टी की ये जीत ऐतिहासिक थी, उनके हजारों क़त्ल कर दिए गए वर्कर्स की याद को समेटे ये जीत एक इमोशन थी; इस जीत में वो सबकुछ था जो किसी भी राजनीतिक अभियान में मिलने वाली सफलता में होता होगा। लेकिन इन मीडिया संस्थानों का सवाल या विश्लेषण इस जीत के अन्यान्य अवयवों को समझने और समझाने से कहीं अधिक इस जीत के अधिनायक नरेंद्र मोदी को टारगेट करने के लिए था। और मैं एक बात ये भी कहना चाहता हूँ कि राजनीति में एक नेता कभी भी क्रिटिसिज्म से नहीं बच सकता है और उसे बचना भी नहीं चाहिए। लेकिन इस वीडियो में मैं समझने की कोशिश करूँगा कि जो बीते एक हफ़्ते में हुआ, जो बीते एक साल में हुआ और जो बीते एक दशक में हुआ, क्या उसे सिर्फ़ एक राजनीतिक आलोचना तक सीमित करके देखा जाना चाहिए? या ये कहे जाने की ज़रूरत है कि जब नरेंद्र मोदी को हर विदेशी लेख में हाइफ़न के साथ हिंदू नेशनलिस्ट लिखा जाता है, तो उसके पीछे एक बहुत प्रगाढ़ घृणा होती है, जिसे बौद्धिकता के आवरण से और भाषा के फैंसी होने की चाशनी में डुबोकर मीठे ज़हर की तरह बेचने का प्रयास किया जाता है। नमस्कार।
एक शेर है कि, “हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना।” लेकिन पश्चिमी मीडिया ने नरेंद्र मोदी को एक बार, एक फिट खाँचे के अंदर देखा, और उसके बाद कभी उसने अपने उस खाँचे को बदलकर कुछ भी देखने की कोशिश ही नहीं की। साल 2002 में गोधरा की घटना के बाद पश्चिमी मीडिया को भारत और हिंदुओं के ख़िलाफ़ अपनी घृणा को प्रकट करने का ज़रिया नरेंद्रモदी के रूप में मिल गया। उनकी कैची हेडलाइन्स के लिए उन्होंने थर्ड वर्ड कंट्री से आने वाला एक स्ट्रॉंगमैन गढ़ लिया। अगले एक दशक में नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात की प्रति व्यक्ति आय 162 फ़ीसदी से ज़्यादा बढ़ी; 1970 से 2001 तक गुजरात का राष्ट्रीय GDP में शेयर 6.7 प्रतिशत से 6.4 प्रतिशत तक घट गया था; 2001 के बाद अगले दो दशक में गुजरात का राष्ट्रीय GDP में शेयर 8.1% पहुँच गया। पूरे देश ने नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल को एक्सेप्ट किया, उन्हें पूर्ण बहुमत से अपना प्रधानमंत्री बना दिया, लेकिन BBC अपने हैंगओवर से नहीं निकल पाया।
2011 में उसने हेडलाइन लगाई कि “Narendra Modi ‘allowed’ Gujarat 2002 anti-Muslim riots.” मोदी की जीत के बाद BBC की हेडलाइन थी, “Indian election: Narendra Modi hails ‘landmark’ win,” और रिपोर्ट में लिखा था कि “Many Indians still have profound concerns over Mr Modi because of claims he did little to stop communal riots in Gujarat in 2002 when he was first minister in the state. At least 1,000 people died, most of them Muslims.”
यानि कि आज भी लोगों का सबसे बड़ा सवाल ये है कि मोदी ने गुजरात दंगों के समय दंगों को रोकने के लिए बहुत कम प्रयास किया, जबकि सच ये था कि पिछले एक दशक में देश का सबसे विकसित राज्य गुजरात बनाने के रिपोर्ट कार्ड के आधार पर अधिकतर भारतीयों ने उन्हें अब अपना प्रधानमंत्री चुना था, लेकिन BBC अपने खाँचे से कभी बाहर नहीं निकल पाया। 2024 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले भी BBC ने “Modi; The India Question” नाम से एक डॉक्यूमेंट्री निकाली, जिसका मूल उद्देश्य उसी दशकों पुराने रेटोरिक को दुबारा से ज़िंदा करना था, जिसके ज़रिए नरेंद्र मोदी का नाम उनके लिए एक पंचिंग बैग बना रहे।
2014 में मोदी की जीत के बाद CNN ने भी हेडलाइन लगाई कि “Hindu nationalist Narendra Modi claims victory as India’s next Prime Minister.” 2019 में टाइम मैगज़ीन ने भी सेम किया, नरेंद्र मोदी के नाम से “Divider in Chief” का कवर स्टोरी छपा, सेम पैटर्न, सेम वर्डिंग, सेम नैरेटिव। मैं कई बार सोचता हूँ कि इतने समय में क्या इनके पास नरेंद्र मोदी को पोर्ट्रेट करने के लिए कोई नया शब्द या कोई नया फ्रेज़ नहीं बन पाया? सारी क्रिएटिविटी नरेंद्र मोदी को कट्टर हिंदूवादी साबित करने में ही जा रही है।
मैंने जितनी हेडलाइन्स आपको बताई हैं, उन सबकी स्टोरीज को आप खोलिए, आपको पता चलेगा कि उन सभी में नरेंद्र मोदी को एक मूर्ति बनाने की कोशिश की जा रही है—कि एक ऐसी छवि गढ़ी जाए जो आज नहीं, आज से सौ-दो सौ साल बाद कोई अगर जानना चाहे कि नरेंद्र नामक एक व्यक्ति की कहानी क्या है, तो उसे सिर्फ़ यही पता चले कि एक राजनेता जो गुजरात का मुख्यमंत्री और भारत का प्रधानमंत्री था और वो मुसलमानों से नफ़रत करता था और उसने 2002 के दंगे में मुसलमानों को मरने दिया। सिर्फ़ इतनी सी कहानी के तौर पर इस देश के सबसे सफल और पब्लिकली क्रेडिबल पॉलिटिशियन को एक खाँचे में समेट दिए जाने की योजना है।
2001 के पहले बंगाल का राष्ट्रीय GDP में शेयर गुजरात से चालीस फ़ीसदी ज़्यादा था; नरेंद्र मोदी के टेंयर में यही चीज़ पलट गई, गुजरात का राष्ट्रीय GDP में शेयर बंगाल से चालीस फ़ीसदी ज़्यादा हो गया। नरेंद्र मोदी ने गुजरात को अर्थव्यवस्था और इंफ्रा का मॉडल बनाया। जब वो प्रधानमंत्री बने, तो भारत ने पहली बार अपने गाँवों को इंडस्ट्रियल एरिया में तब्दील होते देखा।
लैंडलॉक्ड UP सबसे अच्छी कनेक्टिविटी वाला स्टेट बन गया। और इस टाइम में ममता बनर्जी का बंगाल इंडस्ट्रিজ का म्यूजियम बन गया। लेकिन अब इसी विदेशी मीडिया की बेईमानी का आलम देखिए कि 2026 में ममता की हार के बाद BBC हेडलाइन लगा रहा है कि “India’s fiercest female politician faces a fight for survival,” बॉडी टेक्स्ट में ममता की काटन की सफेद साड़ी और फीते वाली हवाई चप्पल की चर्चा हो रही है। कहीं सवाल ही नहीं है कि संदेशखाली की महिलाओं के साथ क्या हुआ, मुर्शिदाबाद में मुसलमानों ने हिंदुओं को क्यों मारा? बांग्लादेशी घुसपैठ क्यों बढ़ी? पूरे बंगाल की इंडस्ट्रीज तबाह होकर पूरा स्टेट करप्शन का मॉडल क्यों बन गया? ये सवाल नहीं पूछा गया, लेकिन जब ममता को नरेंद्र मोदी ने हरा दिया, तो न्यूयॉर्क टाइम्स की चिंता हो गई कि भारत वन पार्टी सिस्टम बन जा रहा है, जबकि आज भी दुनिया की सबसे ज़्यादा पॉलिटिकल पार्टीज़ भारत में ही चुनाव लड़ती हैं। एक विधानसभा में आज भी पंद्रह से ज़्यादा कैंडिडेट चुनाव लड़ते हैं। वाराणसी में 2024 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ 41 कैंडिडेट्स के नामांकन दाखिल हुए थे।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक और हेडलाइन लगाई कि “Modi’s Hindu Nationalists Conquer a Bastion of India’s Opposition,” तीसरी हेडलाइन लगाई कि “India’s Elections Deliver an Upset.” सोचकर देखिए, इस देश के तीसरे टर्म के प्रधानमंत्री को “Hindu Nationalists” का प्रधानमंत्री कहकर संबोधित किया जा रहा है। ये एक खाँचे में फिट करके अपने लिए हेट मैगनेट तैयार करने से अधिक और कुछ नहीं है।
इसी वन पार्टी वाले आर्टिकल के अंदर न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि बंगाल जीतने का मतलब है अब BJP संविधान बदल सकती है, क्योंकि राज्यसभा में अब ये एक तिहाई बहुमत के करीब है। एक इलेक्शन जीतने को BJP के लिए गुनाह बना रही है ये मीडिया। यही मीडिया थी जिसने इमरजेंसी लगाने वाली इंदिरा को आयरन लेडी का तमगा दिया और उनके बेटे राजीव गांधी, जिन्होंने सिखों के नरसंहार के बाद बयान दिया कि “जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ा बहुत तो हिलती ही है,” उनको इसी पश्चिमी मीडिया ने “Mr Clean,” “a great conciliator,” और “twenty-first century visionary” जैसे तमगे दिए।
लेकिन मोदी से उनकी नफ़रत कभी कम नहीं हुई। यहाँ तक कि इस समय नॉन-एलाइनमेंट के परिपेक्ष्य में अगर देखें, तो नरेंद्र मोदी ने सबसे मजबूती से उस पॉलिसी पर इंडिया को चलाया है; दुनिया के अधिकतर राष्ट्राध्यक्षों के साथ उनके संबंध भारत के इतिहास के बाक़ी प्रधानमंत्रियों से बेहतर हैं; भारत डिप्लोमैटिकली सबसे ज़्यादा ताक़तवर है; इंडिया की इकॉनमी बूम कर रही है, सब हो रहा है; लेकिन वेस्टर्न मीडिया सरकार की पॉलिसी को बंगाल या असम के चुनाव में जीत का कारण नहीं बता रही है। लगभग हर मीडिया संस्थान की हेडलाइन और बॉडी टेक्स्ट में हिंदू नेशनलिस्ट की जीत को किसी गुनाह की तरह और इस जीत से मुसलमानों की पीड़ा-व्यथा कितनी बढ़ रही है, उसी की कहानी ही परोसी जा रही है।
और अगर किसी को लगता हो कि ये लोग किसी तरह के सेक्युलर और डेमोक्रेटिक व्यूज़ के बड़े पैरोकार हैं, तो बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है। दरअसल अमेरिकन और ब्रिटिश व्यूपॉइंट के गुलाम इन लोगों से हज़म नहीं होता है कि एक वक्त पर जिस धरती का उन्होंने शोषण किया, वो लोग आज अपने पैरों पर ना सिर्फ़ खड़े हो रहे हैं बल्कि उनसे तेज दौड़ भी रहे हैं। इसी का नतीजा था कि जब भारत ने अपना चंद्रयान-3 लॉन्च किया, तो Patrick Christys नाम के ब्रिटिश पत्रकार ने कहा कि अब जब भारत ये सब कर ही रहा है, तो लगे हाथ UK की 2.4 बिलियन डॉलर एड मनी लौटा देनी चाहिए। सोचकर देखिए, अगर उसके अंदर वो नफ़रत नहीं होती, तो उसे याद होता कि ब्रिटिशर्स ने 45 ट्रिलियन डॉलर भारत से लूटे थे। और ये एक व्यक्ति की बात बाहर निकलकर सामने आ गई; इस बात को समझना होगा कि हर वो शख्स जो पश्चिमी दुनिया से ताल्लुक़ रखता है और उसे भारत के बारे में ओपिनियन देने का मौक़ा मिलता है, तो उसके दिल से इसी तरह की घृणा का प्रवाह होता है।
नरेंद्र मोदी को इसे झेलना होगा। हर हिंदुस्तानी को इसे झेलना होगा, क्योंकि इनकी घृणा ने इन्हें वास्तविकता से दूर कर दिया है, इनकी बौद्धिकता को भ्रष्ट कर दिया है। ये इतने आइडियोलॉजिकली पैरालाइज्ड और इंटेलेक्चुअली करप्ट हैं कि पिछले एक दशक में दुनिया के करीब तीस देशों ने नरेंद्र मोदी को अपना हाईस्ट सिविलियन अवार्ड दिया है; रूस-यूक्रेन के युद्ध के बीच में कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने खुलकर कहा कि भारत ही इस युद्ध के बीच मध्यस्थता कर सकता है। पिछले दस वर्षों में भारत की पूरी इमेज जिस स्केल पर चेंज हुई है, उसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता है; दुनिया का सबसे सस्ता इंटरनेट भारत के पास है, सबसे बड़ा डेटा पूल भारत के पास है। लेकिन उसको लीड करने वाले आदमी के बारे में जब इनकी कलम चलती है, तो उसकी स्याही तीन दशक पुरानी घृणा के रंग में ही निकलती है।
जिस पश्चिम बंगाल के चुनाव की जीत को ये भारत के लोकतंत्र पर ख़तरा बता रहे हैं, वन पार्टी रूल का आरोप गढ़ रहे हैं, दरअसल समस्या इनको ये है कि एक-एक करके भारत में इनके सेफ़ हेवन ख़त्म हो रहे हैं। इनके आइसोलेटेड और अनपॉपुलर सो-कॉल्ड डेमोक्रेटिक आइडिया एक्सपोज़ हो रहे हैं; भारत में जो नरेंद्र मोदी का आलोचक भी है, उसको दिखाई दे रहा है कि ये आलोचना से अलग कुछ है, उससे कहीं अधिक है; वो भी आज सोच रहा है कि क्या ये घृणा है?
और इनकी मोरल सुपीरियरिटी की आदत ही इनकी सबसे बड़ी दुश्मन है। हेडलाइन्स में कॉन्सिपिरेसी बेचना ही इनका धंधा है। जब भारत की बात हो, तो कोई भीड़ भरी सड़क या सिर पर मानी का मटका लिए एक महिला की तस्वीर से आगे इनके सोच नहीं जा पाती है। ये समझना होगा कि पश्चिमी मीडिया मोदी पर इस तरह की भाषा में इसलिए नहीं लिखता कि वह सिर्फ़ उनके विचारों से असहमत है, बल्कि इसलिए कि वह मोदी को एक ऐसे व्यक्ति रूप में देखता है, जिसे वह अपनी कोलोनियल माइंडसेट की सुपीरियरिटी से जन्मी कथित आधुनिक, उदार और लोकतांत्रिक नैतिकता के भीतर फिट नहीं बना सकता; इसलिए नरेंद्र मोदी की हर जीत को वह जीत नहीं, बल्कि ख़तरा बनाकर पेश करने की कोशिश करता है।
पश्चिम की मीडिया को ये समझना होगा कि उनका लेंस काफ़ी पुराना और धुँधला हो गया है। “Jack & Jill went up the hill to fetch a pail of water. Jack fell down and broke his crown and Jill came tumbling after. La la la la la” से बाहर निकलना होगा। ओपिनियन में ओरिजिनेलिटी लानी होगी, उसे कम सब्जेक्टिव बनाना होगा, और ये एक्सेप्ट करना होगा कि नरेंद्र मोदी जिस सिविलाइजेशन को रिप्रजेंट करते हैं, उस पर कीचड़ उछालने की कोशिश कोई एक-दो दशक या एक-दो सदी से नहीं हो रही है; तुम्हारे पुरखों की पीढ़ियाँ जब पत्तों से बदन ढँकना सीख रही थीं, तब इस संस्कृति ने अलंकार और आभूषणों की डिजाइन बनाना शुरू कर दिया था, और ये लड़ाई भी उतनी ही पुरानी है।
हिंदू नेशनलिस्ट इस कदर लिखते हैं, मानो वो कोई गुनाह हो; और इसे लिखने से इन लोगों को लगता है कि इससे नरेंद्र मोदी या उनकी आइडियोलॉजी में मानने वाले लोग किसी आत्मग्लानि में चले जाएँगे, तो उन्हें समझना चाहिए कि हिंदू धर्म ही राष्ट्र की फ़िलासफ़ी मानने वाली इकलौती सिविलाइजेशन है। और मुझे नहीं याद पड़ता कि इन्होंने किसी मुस्लिम के लिए या क्रिश्चियन के लिए इस शब्द का उपयोग किया हो कि “मुस्लिम नेशनलिस्ट,” क्योंकि वहाँ इसका कॉन्सेप्ट ही नहीं मिल सकता; क्रिश्चियन के पास जाएँगे, तो उसके दिल में नेशनलिज़्म से ज़्यादा रेसिझ्म भरा होगा। जिन अमेरिकन्स और ब्रिटिशर्स की पूरी एक्सिस्टेंस ही दूसरी सिविलाइजेशंस के इरेडिकेशन और एक्सप्लॉइटेशन पर टिकी हो, उन्हें समझना होगा कि अगर धूल चेहरे पर हो, तो आईने को साफ़ करने की वकालत करना अच्छा नहीं लगता।
और केदारनाथ अग्रवाल जी की पंक्तियों में कहें तो पश्चिमी मीडिया के इस गैंग को स्वीकार करना होगा:
जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है,
तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है,
जिसने सोने को खोदा, लोहा मोड़ा है,
जो रवि के रथ का घोड़ा है,
वह जन मारे नहीं मरेगा—नहीं मरेगा।
जो जीवन की आग जला कर आग बना है,
फ़ौलादी पंजे फैलाए नाग बना है,
जिसने शोषण को तोड़ा, शासन मोड़ा है,
जो युग के रथ का घोड़ा है,
वह जन मारे नहीं मरेगा—नहीं मरेगा।
और थोड़ा Gen Z की ज़बान में कहें तो: तुम जलन बरकरार रखो, यहाँ जलवा बरकरार रहेगा।





