शनिवार, 6 जून को देश की राजधानी का सियासी पारा गर्म होने की उम्मीद थी। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने सोशल मीडिया पर हफ़्तों से माहौल बना रखा था कि नीट (NEET) पेपर लीक मामले को लेकर वे जंतर-मंतर पर लाखों युवाओं का सैलाब उतारेंगे। दावा था कि इस आंदोलन से व्यवस्था हिल जाएगी। लेकिन जब ऑपइंडिया टीम शनिवार दोपहर संसद मार्ग और जंतर-मंतर पर जमीनी हकीकत टटोलने पहुंची, तो नजारा दावों से कोसों दूर, बेहद फीका और चौंकाने वाला था।
अनुराग मिश्रा एवं केशव मालान की इस ग्राउंड रिपोर्ट में देखिए कि कैसे लाखों की हुंकार भरने वाला यह आंदोलन महज कुछ सौ लोगों के असमंजस और आपसी सिरफुटव्वल में सिमट कर रह गया।
दोपहर 1:00 बजे, संसद मार्ग: दावों की हवा निकालती खाली सड़कें
जब रिपोर्टर अनुराग मिश्रा और केशव मालान ग्राउंड जीरो पर पहुंचे, तो वहां का सन्नाटा चीख-चीख कर कहानी बयां कर रहा था। आयोजकों ने जिस ‘युवा क्रांति’ का खाका खींचा था, उसकी जगह वहां पुलिस के बैरिकेड्स, सुरक्षा बल और कैमरे ताने खड़े मीडियाकर्मी ज्यादा नजर आ रहे थे। दोपहर तक प्रदर्शनकारियों की संख्या 1,000 का आंकड़ा भी नहीं छू सकी थी। जितने प्रदर्शनकारी थे, उससे ज्यादा मुस्तैद वहां की सुरक्षा व्यवस्था थी।
दोपहर 3:15 बजे: ‘आए तो हैं, पर मुद्दा क्या है?’
भीड़ में शामिल चेहरों से जब हमारी टीम ने बातचीत शुरू की, तो आंदोलन की सबसे कमजोर कड़ी खुलकर सामने आ गई; वैचारिक शून्यता और भारी भ्रम। नीट पेपर लीक जैसी गंभीर समस्या और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर आए इन प्रदर्शनकारियों से जब बुनियादी सवाल पूछे गए, तो उनके पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं था।
“हम शिक्षा व्यवस्था को बदलना चाहते हैं।” जब एक प्रदर्शनकारी से पूछा गया कि इसका ठोस रोडमैप या समाधान क्या है, तो वह बगलें झांकने लगा। कई युवाओं को तो यह भी ठीक से नहीं पता था कि परीक्षा में धांधली के तकनीकी पहलू क्या हैं। नारे तो लग रहे थे, लेकिन उन नारों के पीछे की समझ नदारद थी।
‘गोदी मीडिया’ का विलाप और तीखी बहस
जैसे-जैसे दिन ढला, प्रदर्शनकारियों का अपनी नाकामी को छुपाने का गुस्सा मीडिया पर फूट पड़ा। जब पत्रकारों ने उनकी मांगों और समाधान पर तीखे सवाल दागे, तो प्रदर्शनकारी भड़क गए। नीतिगत बहस करने के बजाय उन्होंने पत्रकारों को ‘गोदी मीडिया’ कहकर दबाने की कोशिश की। करीब आधे घंटे तक जंतर-मंतर पर मीडियाकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी नोकझोंक होती रही। साफ दिख रहा था कि सवालों के जवाब न होने पर ‘विक्टिम कार्ड’ और मीडिया-विरोधी एजेंडे का सहारा लिया जा रहा था।
‘नेपाल जैसी क्रांति’ और उमर खालिद के सुर, बिखरा आंदोलन
शाम होते-होते इस प्रदर्शन ने एक बेहद चिंताजनक मोड़ ले लिया। प्रदर्शनकारियों के एक गुट ने अचानक ‘भारत को नेपाल बनाने’ और वहां जैसी हिंसक क्रांति लाने की वकालत करते हुए देश-विरोधी लहजे में नारेबाजी शुरू कर दी। इतना ही नहीं, मंच के पीछे से उमर खालिद जैसे विवादित चेहरों के समर्थन में भी सुर उभरते दिखे।
इस अतिवादी रुख का नतीजा यह हुआ कि वहां मौजूद आम छात्र और गंभीर प्रदर्शनकारी भड़क गए। आंदोलन के अंदर ही दो फाड़ हो गए और आपस में ही तीखी बहस शुरू हो गई। इस ‘देश-विरोधी’ और हिंसक नैरेटिव ने वहां खड़े आम दर्शकों को भी दूर कर दिया और आंदोलन पूरी तरह पटरी से उतर गया।
‘संविधान’ वाली डायरी
आंदोलन के नेतृत्व और समझ का सबसे विचित्र उदाहरण तब देखने को मिला, जब एक प्रदर्शनकारी हाथ में एक बिल्कुल खाली (ब्लैंक) डायरी लेकर उसे ‘भारत का संविधान’ बताते हुए कैमरे के सामने आ गया। अनुराग मिश्रा द्वारा जब उससे पार्टी की नीति, भविष्य के विजन या देश के नीतिगत ढांचे पर बात की गई, तो वह कोई काम की बात नहीं रख सका।
इस वाकये ने साफ कर दिया कि आंदोलन में शामिल भीड़ बिना किसी ठोस लीडरशिप और वैचारिक तैयारी के सिर्फ भीड़ बढ़ाने के लिए बुलाई गई थी। इस प्रोटेस्टर का कहना था कि उसके हाथ में जो डायरी है, वो उसके द्वारा लिखा गया संविधान है जिसमें आजादी मांगी गई है। अनुराग मिश्रा के कहने पर जब उसने डायरी खोलकर दिखाई तो उसमें हाथों से लिखे हुए कुछ नोट्स थे जिन्हें हाइलाइट भी किया गया था।
ग्राउंड रिपोर्ट में केशव मलान और प्रोटेस्टर्स के बीच ईवीएम (EVM) को लेकर भी बातचीत हुई।
- विरोध का कारण: प्रोटेस्टर्स जंतर-मंतर पर ‘ईवीएम हटाओ, लोकतंत्र बचाओ’ के पोस्टर के साथ मौजूद थे और उनका मानना है कि ईवीएम एक धोखा है।
- केशव मलान का प्रश्न: केशव मलान ने सवाल उठाया कि राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे नेता भी ईवीएम के जरिए ही चुनाव जीतकर संसद तक पहुँचे हैं, फिर इसे हटाने की मांग क्यों की जा रही है?
- प्रोटेस्टर्स का जवाब: प्रोटेस्टर्स ने तर्क दिया कि ईवीएम पर उन्हें भरोसा नहीं है और एक आम मतदाता को यह पता ही नहीं चलता कि उसका वोट वास्तव में कहाँ गया है, जब तक कि वह पर्ची (ठप्पा) के माध्यम से मतदान न करे। उन्होंने यह भी दावा किया कि कई विपक्षी नेता भी ईवीएम का विरोध कर चुके हैं। और फिर अंत में इसी बात पर अड़ा रहा कि मोदी सरकार का विरोध जारी रहेगा चाहे ईवीएम से कोई भी जीते।
निष्कर्ष: सोशल मीडिया का शेर, जमीन पर ढेर
शाम 6:30 बजे तक जंतर-मंतर पर पसरी खामोशी इस बात की गवाह थी कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का यह बहुप्रचारित आंदोलन पूरी तरह फ्लॉप साबित हुआ है। खुद इसके आयोजक जंतर – मंतर से नदारद हो गए थे।
सोशल मीडिया पर लाखों की फौज दिखाने वाले दल जब बिना किसी ठोस एजेंडे, बिना नीतिगत स्पष्टता और बिना किसी मजबूत नेतृत्व के जमीन पर उतरते हैं, तो उनका यही हश्र होता है। नीट जैसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश में CJP ने अपनी रही – सही साख भी खो दी। यह आंदोलन किसी बदलाव की शुरुआत नहीं, बल्कि दिशाहीन राजनीति का एक छोटा सा तमाशा बनकर रह गया।



