इतिहास की कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिनके निशान मिट तो जाते हैं, लेकिन उनके घाव पीढ़ियों तक नहीं भरते। संभल का 1978 का दंगा भी ऐसी ही एक घटना थी।
अगर आप किसी सर्च इंजन पर संभल, दंगा, 1978, ये तीन शब्द डालेंगे और उसके बाद जो आपके सामने आएगा उससे आप सहम जाएंगे। क्योंकि ये आपको याद दिलाएगा कश्मीर नरसंहार की, गोधरा अग्निकांड की…
आज इस दंगे पर हम इसलिए बात कर रहे हैं क्योंकि इतने सालों बाद पीड़ितों को न्याय मिलना शुरू हुआ है।
योगी आदित्यनाथ सरकार ने आज संभल के दंगा पीड़ित रस्तोगी परिवार की घर वापसी की है। यानी उन्हें सरकारी जमीन पर 100 वर्ग मीटर का पट्टा सौंप दिया है जिस पर वो अपनी घर-गृहस्थी दोबारा बसा सकते हैं।
इन दंगा पीड़ित परिवारों को इस न्याय का इंतजार बीते 46 वर्षों से रहा है और किसी भी सरकार में यह हिम्मत नहीं थी कि वो उन्हें न्याय दिलवाए और न्याय केवल जमीन दिलवाने का नहीं है, बल्कि सुरक्षा की भावना का भी है कि अगर वो वापस अपने घर लौटे तो उन्हें 1978 का वो मंजर दोबारा ना देखना पड़े।
तो आखिर क्या था वो मंजर? और कितना महत्व है इन परिवारों की संभल वापसी का? जानेंगे इस वीडियो में।
1978… वो साल जब संभल मज़हबी फ़साद की आग में झुलस गया था। संभल के इतिहास का ये सबसे बड़ा और भीषण दंगा, जिसमें एक महीने तक कर्फ्यू लगा रहा।
उस समय जो हुआ, उसने केवल लोगों की जान नहीं ली बल्कि पूरे शहर की तस्वीर बदल दी। शहर की डेमोग्राफी बदल गई, कई हिंदू परिवारों ने अपना घर और व्यापार छोड़कर अन्य शहरों में पलायन कर दिया।
लेकिन दंगे केवल आंकड़े नहीं होते। उनके पीछे ऐसे परिवार होते हैं जिनकी दुनिया एक ही दिन में उजड़ जाती है। ऐसा ही एकरस्तोगी परिवार भी था।
यह दर्दनाक कहानी 29 मार्च 1978 की है। मुसलमानों की भीड़ ने संभल में पुलिस चौकी से महज 50 मीटर दूर रामशरण दास रस्तोगी को उनकी अपनी ही दुकान से उठा लिया था। इसके बाद मुसलमान दंगाइयों ने उनके टुकड़े-टुकड़े कर हत्या कर दी। उनकी दुकान लूटकर उसमें आग लगा दी गई और सिर्फ इतना ही नहीं, उनके श व को तराजू-बांट से बाँधकर पास के एक कुएं में फेंक दिया गया था।
तीन दिन बाद जब उनका शव मिला, तो उस पर चाकू और कुल्हाड़ी के गहरे घाव थे। उस दिन सिर्फ रामशरण दास रस्तोगी की हत्या नहीं हुई थी, उस दिन इस परिवार का संभल से रिश्ता भी टूट गया था। इस खौफनाक मंजर से डरकर पूरा परिवार संभल छोड़कर दिल्ली में बस गया था। इस्लामी उन्माद ने इस हिंदू परिवार को पलायन करने को मजबूर कर दिया था।
दंगे में मारे गए रामशरण दास रस्तोगी के परिवार ने दशकों के लंबे इंतजार के बाद इसी वर्ष कुछ महीने पहले सीएम योगी आदित्यनाथ से गुहार लगाई थी और संभल में बसने की मांग की थी। और आज देखिए, 46 साल बाद पहली बार उस परिवार को लगा होगा कि राज्य ने उनकी पीड़ा को सुना है।
संभल प्रशासन ने शेर खा सराय इलाके में सरकारी जमीन पर बने अवैध कब्रिस्तान को कब्जे से मुक्त कराया था… अब उसी जमीन पर 100 वर्गमीटर का हिस्सा इस पीड़ित परिवार को दिया गया है।
लेकिन रस्तोगी परिवार अकेला नहीं था। ऐसे कई परिवार थे जिनकी कहानी अलग थी, लेकिन दर्द एक जैसा था।
इसीलिए यह सिर्फ एक परिवार की घर वापसी की कहानी नहीं है। इससे पहले भी तुलसीराम के परिजनों को संभल में जमीन दी गई।
तुलसीराम वो व्यक्ति थे जिनकी 1978 के दंगों में हत्या कर दी गई थी। उनकी जमीन छीन ली गई थी और उनके तीन बेटे और परिवार को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था। बीते साल योगी सरकार ने तुलसीराम के परिवार को 10,000 वर्गफुट जमीन का कब्जा दिलाया।
कुछ लोगों ने डरकर शहर छोड़ा, तो कुछ लोगों ने आखिरी सांस तक यह विश्वास नहीं छोड़ा कि उनके पड़ोसी, उनके दोस्त मुस्लिम उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाएंगे।
ऐसी ही कहानी संभल के व्यापारी बनवारी लाल गोयल की है। संभल में जब दंगे भड़कने की खबर मिली थी तो बनवारी लाल गोयल उस इलाके में जाने लगे, जहां पर दंगा भड़का था। उनकी पत्नी और बेटे ने उन्हें रोका भी लेकिन वे यह कहते हुए दंगा प्रभावित इलाके में चले गए ये बोलकर कि सारे मुस्लिम मेरे मित्र और भाई जैसे हैं, मैंने बुरे वक्त में उन्हें पैसे देकर उनकी मदद की है। सब मेरे साथ काम करते हैं। मुझे कुछ नहीं होगा।
लेकिन बनवारी लाल गोयल को मुस्लिम दंगाइयों ने पकड़ लिया। उनसे कहा कि तुम इन पैरों से पैसे लेने आए हो और उनके पैर काट दिए। फिर कहा कि तुम इन हाथों से पैसे लेने आए हो और हाथ भी काट दिए। इसके बाद गर्दन काट कर उनकी हत्या कर दी गई।
इस दौरान बनवारी लाल गिड़गिड़ाते रहे कि मुझे इतनी बेरहमी से काटो मत, इससे बेहतर है कि एक बार में गोली मार दो। लेकिन एक भी मुसलमान सुनने वाला नहीं था। इसके कुछ साल बाद बनवारी लाल गोयल का परिवार इस इस्लामी आतंक के साये से मजबूर होकर संभल छोड़ने पर मजबूर हो गया।
लेकिन दंगे की क्रूरता यहीं खत्म नहीं हुई थी। इसी दंगे से जुड़ी एक घटना ये भी है कि 24 हिंदुओं को दंगाइयों ने एक साथ फूँक दिया था। दरअसल, लाला मुरारी लाल की कोठी में दंगे से बचने के लिए कई हिंदू छिपे थे। लेकिन इसका पता चलते ही दंगाइयों ने उनकी कोठी पर हमला कर दिया।
24 हिंदुओं के शवों को गन्ने की खोई तथा टायरों के ढेर के साथ जला दिया गया। कई परिवारों का कहना था कि उन्हें अपने प्रियजनों के शव तक नहीं मिले और उन्हें कपड़ों के पुतले बनाकर अंतिम संस्कार करना पड़ा।
इन घटनाओं का असर केवल कुछ परिवारों तक सीमित नहीं रहा। धीरे-धीरे पूरे शहर का स्वरूप बदलने लगा। आजादी के समय जहां संभल नगरपालिका क्षेत्र में हिंदुओं की आबादी 45 प्रतिशत थी, वो आज घटकर 15 से 20 प्रतिशत रह गई है। उस समय मुस्लिम 55 प्रतिशत थे जो आज बढ़कर 80 से 85 प्रतिशत हो गए हैं।
जिन गलियों में कभी हिंदू परिवारों की भरमार थी, वहां धीरे-धीरे उनके घर खाली होने लगे। जिन मंदिरों में रोज आरती होती थी, वहां सन्नाटा छा गया। उन पर मुस्लिमों ने कब्जा कर लिया। कई मंदिरों के ऊपर तो मस्जिदें भी बन गई, जिन्हें अब योगी सरकार मुक्त करवा रही है।
जिन बाजारों में हिंदुओं की पीढ़ियों ने कारोबार किया था, वहां कई दुकानें हमेशा के लिए बंद हो गईं। हमें समझना होगा कि दंगे सिर्फ लोगों को नहीं उजाड़ते, वे शहरों की स्मृतियों को भी उजाड़ देते हैं।
लेकिन अब समय बदल गया है। अब केवल संभल दंगों के पीड़ितों की वापसी नहीं हो रही, बल्कि खग्गूसराय का वह शिव मंदिर भी फिर से जीवित हुआ है… जो 1978 के दंगों के बाद इलाके से हिंदुओं के पलायन के कारण वीरान हो गया था।
वर्षों तक वहां न पूजा हुई, न आरती हुई। लेकिन 2024 में योगी सरकार ने नखासा थाना क्षेत्र में 46 साल से बंद पड़े हिंदू मंदिर को दोबारा खुलवाया और अब वहां विधिवत पूजा होती है।और इसे केवल एक बंद पड़े मंदिर के खुलने तक मत देखिए। यह उस सांस्कृतिक स्मृति की वापसी थी जिसे दंगों के शोर ने दबा दिया था।
आज सरकार इन दंगा पीड़ित हिंदुओं के साथ खड़ी है। प्रशासन इन्हें सुरक्षा मुहैया करवा रहा है। आज इन परिवारों को यह एहसास हो रहा होगा कि दशकों तक चला ये लंबा संघर्ष पूरी तरह व्यर्थ नहीं गया।
संभल के इन परिवारों के लिए यह सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा नहीं है। यह उस विश्वास की वापसी है जो 1978 की हिंसा में कहीं खो गया था।
और शायद यही कारण है कि संभल में दंगा पीड़ितों की घर वापसी सिर्फ एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं है। यह उन लोगों के लिए उम्मीद का प्रतीक है जिन्होंने सब कुछ खोने के बाद भी न्याय की उम्मीद नहीं छोड़ी थी और आज यानी 3 जून को योगी सरकार ने पीड़ित परिवार को इस जमीन के पट्टे के कागज सौंप दिए वो भी विधि-विधान से भूमि पूजन और हवन करने के बाद।





