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दान और त्याग का असली महत्व: जब राजा श्वेत की तपस्या भी भूख-प्यास से मुक्ति न दिला सकी

Summary
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड से जानिए दंडकारण्य वन की एक रहस्यमयी कथा, जहां राजा श्वेत को दान न करने के कारण अपने ही मृतदेह का भक्षण करना पड़ा और अंततः अगस्त्य मुनि ने उनका उद्धार किया।

हमने आपको दंडकारण्य के इतिहास से जुड़े वीडियो में बताया था कि श्रीराम का कुल जिन महान राजा इक्ष्वाकु के नाम से जाना गया, उन्हीं इक्ष्वाकु के सबसे छोटे पुत्र दंड के कुकर्म से कैसे एक हंसता-खेलता समृद्ध प्रदेश जलकर राख हो गया।

वैसे समय के साथ, मां प्रकृति ने फिर से उस बंजर प्रदेश को हरा-भरा और सुंदर तो बना दिया, पर दंडकारण्य अभी भी संपूर्ण निर्जन था। न ही कोई पशु-पक्षी, न ही कोई जन-समूह और न ही कोई ऋषि-मुनि।

फिर एक दिन वहां अगस्त्य मुनि पहुंचे। उनके चरण वहां पड़ते ही मानो उस सुंदर, परंतु प्राणहीन वन दंडकारण्य में पुनः प्राण आ गए। धीरे-धीरे फिर से वहां और भी ऋषि-मुनि तपस्या करने आने लगे।

परंतु, उस शापित वन में अगस्त्य मुनि क्यों गए? दंडकारण्य में जो होने जा रहा था, उससे तो यही लगता है कि अगस्त्य मुनि को दंडकारण्य में, केवल उनकी ही नहीं, बल्कि किसी और की भी नियति लेकर गई थी।

तो आइए बताते हैं आपको उस प्रसंग के बारे में। यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में मिलता है, जब अगस्त्य मुनि स्वयं प्रभु श्रीराम को एक दिव्य आभूषण भेंट करते हुए अपनी यात्रा का वृत्तांत सुनाते हैं, क्योंकि उस आभूषण की कड़ियां भी इस प्रसंग और दंडकारण्य से जुड़ी हैं।

प्रसंग थोड़ा लंबा है, पर है उतना ही रोमांचक। हर मोड़ पर इंटरेस्टिंग ट्विस्ट एंड टर्न्स आएंगे।

तो इस मनोहर घटना का वृत्तांत कुछ ऐसे है।

अगस्त्य मुनि को तपस्या करने के लिए एक उत्तम और निर्मल जगह की खोज थी। जिसके चलते, वह एक दिन एक सुंदर से वन, दंडकारण्य, में जा पहुंचे। वन की सुंदरता देखकर अगस्त्य मुनि बेहद मंत्रमुग्ध हो गए।

दंडकारण्य इतना सुंदर था कि पृथ्वी पर उस वन के तुल्य शायद ही कुछ हो। वन के बीचों-बीच एक बहुत विशाल सरोवर था। सरोवर में रंग-बिरंगे कमल खिले हुए थे। सरोवर में कहीं कीचड़ नहीं था, न ही वन में कहीं कोई गंदगी का नामोनिशान।

इस सुंदर सरोवर के तट पर एक विशाल आश्रम था। आश्रम था तो निर्जन, परंतु निर्जन होते हुए भी वह आश्रम अपनी अप्रतिम पवित्रता का प्रमाण दे रहा था, जैसे कोई महान ऋषि-मुनि का कभी यह निवास स्थान रहा हो। और उस आश्रम का वही इतिहास था। यह आश्रम शुक्राचार्य का था, जिसे वे दंड को दिए गए उस शाप के बाद छोड़कर चले गए थे। यह वही शाप था, जिसके कारण दंडकारण्य निर्जन और उदास हो गया था और तभी से वह आश्रम निर्जन खंडहर बनकर अपना अस्तित्व टिकाए हुए था। वह केवल काल का साक्षी बनकर समय के चक्र में बदलती ऋतुओं के कड़वे-मीठे, हर तरीके के अनुभव ले रहा था।

अगस्त्य मुनि उस आश्रम में एक रात रहे। सवेरे उठे और फिर से अगस्त्य मुनि दंडकारण्य वन के कोने-कोने को जैसे बिना पलक झपकाए निहारने लगे। जहां दृष्टि जाए, वहां केवल अकल्पनीय सुंदरता ही सुंदरता। वन का ऐसा मनोहर दृश्य अगस्त्य मुनि के मुख पर एक प्रेम भरी प्रसन्नता ला रहा था। चारों दिशाओं को देखते-देखते मानो जैसे अगस्त्य मुनि कहीं खो गए थे। इतनी सुंदर सुबह उन्होंने जैसे पहली ही बार देखी थी।

परंतु यह क्या? अगस्त्य मुनि जैसे ही सरोवर के किनारे स्नान करने पहुंचे, उनके मुख के आनंदित भाव अचानक हैरानी और गहरी चिंता में बदल गए। ऐसी स्वर्ग जैसी सुंदरता के बीच अगस्त्य मुनि ने यह क्या देखा?

अगस्त्य मुनि देखते हैं कि सरोवर के किनारे एक शव पड़ा हुआ है। था तो वह मृतदेह, पर एकदम हृष्ट-पुष्ट और निर्मल। कोई मलिनता नहीं, न ही कहीं बदबू। वह मृतदेह होने के बाद भी किसी विश्राम करते हुए राजा की भांति तेजस्वी लग रहा था।

अगस्त्य मुनि कुछ घड़ी तो यह गुत्थी समझने के लिए वहीं सरोवर के तट पर बैठ गए। वह आगे कुछ सोचे या समझे, उतने में ही उसी जगह एक दिव्य और अद्भुत विमान बड़े ही वेग से वहां आकर उतरा। उस विमान में सुंदर अप्सराएं थीं, जिनमें से कोई नृत्य कर रही था, तो कोई मनोहर गीत गा रही थी। और कुछ अप्सराएं सुंदर से पंखे से उस विमान में बैठे हुए एक स्वर्गवासी देवता के मुख पर हवा दे रही थीं।

यह सब देखकर अगस्त्य मुनि एक बात तो समझ ही गए थे कि वह विमान ब्रह्मलोक से ही आया था।

पर, उस विमान से जो देवतुल्य पुरुष उतरा, उसको देखकर अगस्त्य मुनि एकदम आश्चर्यचकित हो गए। वह विमान से उतरने वाला वही था, जिसका शव सरोवर के किनारे पड़ा हुआ था।

पर अभी तो अगस्त्य मुनि आगे जो देखने वाले थे, वह तो उनकी कल्पनाओं के हर स्तर से परे था। उनके देखते ही देखते, विमान से उतरे हुए वे स्वर्गवासी देवता स्वयं अपने ही मृत शरीर का मांस खाने लगे। उन्होंने अपने ही मृतदेह का भोजन किया, उसके बाद सरोवर में उतरे, हाथ-मुंह धोकर कुल्ला-आचमन करके बड़े ही आराम से अपने विमान पर बैठकर वापस जाने के लिए तैयारी करने लगे। और यह सब वे देव इतनी सहजता से कर रहे थे जैसे यह उनकी प्रतिदिन की दिनचर्या हो।

खैर, कुछ क्षण में अगस्त्य मुनि मुग्धता से बाहर आए और विमान पर सवार उस देवता को जाने से रोकने लगे। अगस्त्य मुनि उनको पूछते हैं, ‘आप कौन हैं? आपका रूप इतना दिव्य है कि जैसे आप कोई स्वर्ग के देवता के समान जान पड़ते हैं। परंतु, देवतुल्य होते हुए भी अपने ही मृतदेह को खाने का ऐसा घृणित कार्य क्यों किया? आपके स्वरूप से आपका कर्म बिल्कुल ही विपरीत है। ऐसा क्यों? अवश्य कुछ तो कारण या विवशता है। कृपा करके मुझे बताएं।’

अगस्त्य ऋषि की बात सुनकर, वे देवपुरुष पहले तो अपना परिचय देते हैं, और बाद में उनके उस कृत्य के पीछे की विवशता बताते हैं। अगस्त्य मुनि को प्रणाम करते हुए वे कहते हैं, ‘मैं विदर्भराज सुदेव का पुत्र श्वेत हूं। मेरे पिता के स्वर्गवासी होने के बाद, मैं उस राज्य का उत्तराधिकारी बना। मैंने पूरे धर्म के अनुसार राज्य का पालन किया। मैं अपने शासनकाल की माया में मानो जैसे अपनी आयु भी भूल गया। मैं इतना व्यस्त हो गया कि मुझे यह स्मरण ही नहीं हुआ कि मेरे वानप्रस्थ आश्रम का समय आ गया है। फिर किसी कारण से एक दिन मुझे यह ध्यान पड़ा कि, अरे, मेरा जीवन अब वानप्रस्थ आश्रम के पड़ाव पर पहुंच चुका है और अब मुझे इस मोह-माया को त्याग देना चाहिए। तब मैं अपने छोटे भाई सुरथ को राज्य सौंप कर इसी निर्जन वन दंडकारण्य में आ पहुंचा। और इसी सरोवर के किनारे मैंने ध्यान लगाकर तपस्या की। बहुत सालों तक तपस्या करने के बाद मैंने देह त्याग किया और मेरी आत्मा ब्रह्मलोक में गई।’

वानप्रस्थ आश्रम में मनुष्य का तपस्या करने का एकमात्र उद्देश्य होता है – मृत्यु के पश्चात, ब्रह्मलोक में अपने जीवन के हिसाब-किताब होने के बाद स्वर्ग की प्राप्ति। ब्रह्मलोक में ब्रह्माजी के सानिध्य में रहकर और मनुष्य जीवन के सारे मोह, माया, भूख, प्यास – सब जरूरतों से परे होकर रहना।

वैसे ही, मृत्यु के पश्चात वह परम आनंद का अनुभव करने के लिए अब राजा श्वेत भी ब्रह्मलोक पहुंच गए। पर ब्रह्मलोक में जाने के बाद तो जैसे राजा श्वेत को उस लोक के सुख के बदले कठिनाइयां भोगनी पड़ीं।

यही बात राजा श्वेत अगस्त्य मुनि से कहते हैं, ‘मैंने तो सुना था कि धर्म में कहा गया है कि ब्रह्मलोक भूख-प्यास, मोह-माया जैसी कोई भी इंद्रियों के सुख-दुख से परे है। पर मुझे तो वैसा कुछ भी नहीं लग रहा था। मेरी भूख-प्यास तो ब्रह्मलोक में जाकर भी वैसी ही यथावत थी जैसी कि पृथ्वी लोक में थी। और यही प्रश्न मैंने ब्रह्माजी को पूछा कि स्वर्गलोक में भी यह भूख-प्यास मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़ रही? मेरे ऐसे कौन से कर्म का फल मुझे यहां भी भुगतना पड़ रहा है? मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा, कृपया इस कष्ट से मुझे निकालिए।’

ब्रह्माजी पहले तो राजा श्वेत के उनके जीवन के सब कर्मों का जोड़-घटाव करते हैं, और फिर उनको समझाते हुए कहते हैं, ‘श्वेत, पहले तो तुम्हारी इस भूख-प्यास के कष्ट की परेशानी के बारे में बात करते हैं, उसके बाद बताऊंगा ऐसा होने का कारण। तो इस विशिष्ट भूख-प्यास से छुटकारा पाने का तुम्हारे पास एक ही उपाय है – तुम पृथ्वी पर पड़े अपने ही मृतदेह को प्रतिदिन खाया करो। वही तुम्हारा आहार है।

और अब समझाता हूं कि ऐसा क्यों है।’

ब्रह्माजी आगे कहते हैं, ‘श्वेत, तुम एक अच्छे राजा रहे और एक कुशल राजा की भांति तुमने राज भी किया। फिर वनप्रस्थान में तुमने उत्तम तप भी किया। परंतु यह सब तुमने केवल अपने ही शरीर के पोषण के लिए किया। स्मरण करो कि क्या तुमने अपने पूरे जीवन में परोपकार का कोई भी काम किया? क्या तुमने दान किया? दान भी धर्म का ही एक भाग है। और श्वेत, दानरूपी बीज तो तुमने बोया ही नहीं! तुमने देवताओं, पितरों और अतिथियों के लिए कभी भी थोड़ा सा भी दान नहीं किया। तुमने धर्म के नाम पर केवल तपस्या की। इसीलिए इस लोक में भी तुम भूख-प्यास से पीड़ित ही रहोगे। और जिसके चलते तुम्हें अपने ही मृतदेह का मांस तब तक खाना होगा, क्योंकि तरह-तरह के आहारों से भलीभांति पोषित हुआ तुम्हारा यह परम उत्तम शरीर ही केवल तुम्हारी भूख को संतुष्ट करने में समर्थ है। यह तुम्हें तब तक करना होगा जब तक तुम्हारी भेंट अगस्त्य मुनि से न हो। उनसे भेंट होते ही तुम्हें यह भी समझ आ जाएगा कि तुम्हें कैसे इस बंधन से मुक्त होना है।’

राजा श्वेत अपने कर्म की कठिनाई अगस्त्य ऋषि को बताते हुए कहते हैं, ‘न जाने कितने ही वर्षों से मैं यही घृणित कृत्य कर रहा हूं और फिर भी न तो यह मेरा शरीर नष्ट होता है न ही मेरी भूख। आज तक इस निर्जन वन में मैंने कोई मनुष्य नहीं देखा। आप अवश्य अगस्त्य ऋषि ही होंगे। आज आखिरकार मेरी आपसे भेंट हो ही गई। आप कृपया मुझे इस कष्ट से मुक्त कीजिए।’

राजा श्वेत आगे कहते हैं, ‘मनुष्य जीवन में मैंने जो कर्म नहीं किया, जिसने मुझे इस बंधन में जकड़ के रखा, उस भूल को भी मैं सुधारना चाहता हूं। मैं आपको यह विशेष आभूषण दान करना चाहता हूं। यह दिव्य आभूषण सुवर्ण, धन, वस्त्र, भक्ष्य, भोज्य और भी बहुत प्रकार की इच्छा पूर्ण करने में समर्थ है। इस आभूषण के साथ मैं मेरी समस्त कामनाओं और भोगों का भी इसी समय त्याग करता हूं। कृपया इसे स्वीकार करें और मुझे मोह-माया रूपी बंधनों से मुक्त करें।’

अगस्त्य मुनि को अब उनके सारे प्रश्नों का जवाब मिल गया। राजा श्वेत की दुखभरी व्यथा सुनकर अगस्त्य मुनि विचलित से हो गए। उन्होंने तुरंत उस आभूषण का स्वीकार किया, और उसके साथ ही राजा श्वेत का वह मृतदेह भी वहां से अदृश्य हो गया। तो ऐसे हुआ राजा श्वेत का उद्धार।

और वही आभूषण अगस्त्य मुनि प्रभु श्रीराम को उपहार में देते हैं।

इस प्रसंग से हमने क्या समझा? एक तो दान का महत्व। पर केवल वस्तुओं को देना ही दान नहीं होता। दान सही समय और सही वस्तुओं का करना महत्वपूर्ण है। यहां राजा श्वेत को राजा रहते हुए अपनी प्रजा के हिस्से की वस्तुओं का दान नहीं करना चाहिए था, क्योंकि एक तो राज्य के खजाने पर पहला अधिकार प्रजा का रहता है। और इसीलिए फिर वह तो किसी और की वस्तुओं का दान हुआ, न कि राजा की निजी वस्तु का दान।

न ही आपको ऐसी वस्तुओं का दान करना चाहिए कि वह दान किसी के काम न आए।

दान करिए तो अपनी कोई प्रिय वस्तु या अपने हिस्से से दान करिए, भले ही वह आंशिक क्यों न हो। वही सच्चा दान है, भले शुरू में वह थोड़ा ही दान क्यों न हो। प्रिय वस्तुओं का दान करना धर्म की दृष्टि से इसीलिए जरूरी है क्योंकि इससे आप माया और मोह से मुक्त होने की तरफ जाते हैं। वरना मोह, माया और लालच की तो कोई सीमा ही नहीं है।

और हमने देखा कि कैसे राजा श्वेत के लालच और भौतिक इच्छाओं ने उनका स्वभक्षण करवाया। दान केवल वस्तु देना नहीं, बल्कि अपने मोह का त्याग है। राजा श्वेत के पास तप की शक्ति तो थी, पर त्याग का भाव नहीं था।

इसीलिए कहा गया है – भूख इतनी मत रखो कि वह स्वभक्षण करने की ओर आपको ले जाए।

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