अभी तक हमने इक्ष्वाकु वंश के कई राजाओं के बारे में चर्चा की है। किसी ने शून्य में से सृजन किया, तो किसी के नाम से मिथिला और अयोध्या जैसे महान प्रदेश जाने गए। वहीं, कुछ राजाओं को उनके कुकर्मों के कारण त्याग भी दिया गया। उसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए आज हम आपको इक्ष्वाकु वंश के उस राजा के बारे में बताएंगे, जो जीवित ही स्वर्ग गए! सुनने में विचित्र लगने वाली यह कथा है राजा त्रिशंकु की, जिनका मूल नाम सत्यव्रत था। वीडियो के अंत में हम उनके उस पुत्र के बारे में बात करेंगे, जिनका नाम आज भी एक उपाधि की तरह लिया जाता है।
तो प्रारंभ करते हैं राजा सत्यव्रत उर्फ राजा त्रिशंकु की कथा। इस विषय को सुनते ही आपके मन में कई सवाल उठे होंगे। जैसे- इतना सुंदर ‘सत्यव्रत’ नाम होते हुए भी उन्हें ‘त्रिशंकु’ जैसे विचित्र नाम से क्यों जाना गया? भला कोई जीवित ही स्वर्ग कैसे जा सकता है? और यदि किसी व्यक्ति को सशरीर स्वर्ग जाने मिला, तो उसने जीवन में ऐसा क्या काम किया होगा? इन सभी प्रश्नों के उत्तर और उनके पीछे का कारण आपको इस लेख में मिलेगा।
सत्यव्रत से त्रिशंकु बनने की घटना अत्यंत रोचक है। इसमें प्रभु श्री राम के महान इक्ष्वाकु कुल में जन्म, राजकुमार बनना, फिर पिता द्वारा निष्कासन, वन में चांडालों के साथ रहना, वसिष्ठ ऋषि का श्राप, राज्य में वापसी और पुनः चांडाल बनना, स्वर्ग की यात्रा, स्वर्ग से अस्वीकृति और पतन, और अंत में स्वर्ग की प्राप्ति—यह पूरा घटनाक्रम हम विस्तार से समझेंगे।
त्रेता युग की बात है। इक्ष्वाकु वंश के चक्रवर्ती सम्राट राजा अरुण के पुत्र थे सत्यव्रत। ये राजा मान्धाता की आठवीं पीढ़ी में हुए थे। नाम तो उनका सत्यव्रत था, परंतु स्वभाव उसके बिल्कुल विपरीत। राजकुमार होने के कारण वे ऐश्वर्य से संपन्न, बलवान और तेजस्वी थे, लेकिन साथ ही वे कामवासना और लोभ से भी भरे हुए थे। युवावस्था में ही उनके भीतर अहंकार पनप गया था। अपनी शक्ति और राजसी वैभव के कारण उन्हें लगने लगा कि संसार में उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है।
सत्यव्रत के पिता अत्यंत धर्मात्मा थे और प्रजा उनके सानिध्य में सुखी रहती थी। एक दिन राज्य में एक ब्राह्मण की पुत्री का विवाह हो रहा था। मंडप सजा था और मंत्रोच्चार हो रहे थे, तभी वहां राजकुमार सत्यव्रत पहुंचे। वासना और अहंकार से अंधे होकर उन्होंने विवाह मंडप से ही उस कन्या का बलपूर्वक हरण कर लिया। यह घोर अधर्म था। अपमानित और भयभीत ब्राह्मण पिता ने महाराज अरुण के पास जाकर न्याय की गुहार लगाई। उन्होंने विलाप करते हुए कहा, ‘महाराज, युवराज सत्यव्रत ने धर्म का नाश कर दिया है।’
महाराज अरुण अत्यंत धर्मपरायण थे। पुत्र के इस कुकर्म से वे बहुत दुखी और लज्जित हुए। उन्होंने राजगुरु वसिष्ठ से सलाह ली और वही किया जो इक्ष्वाकु वंश में पूर्व में पुत्र विकुक्षि और सगर के साथ हुआ था—पुत्र का त्याग। क्रुद्ध राजा अरुण ने सत्यव्रत को निष्कासित करते हुए कहा, ‘तुमने अपने नाम सत्यव्रत को व्यर्थ किया है। तुम दुराचारी हो। किसी स्त्री का अपहरण करके तुमने चांडालों वाला कर्म किया है। तुम्हारे जैसे कुपुत्र से मैं पुत्रवान नहीं कहलाना चाहता। इस राज्य से दूर जहां जाना है, जाओ।’ यहीं से सत्यव्रत की त्रिशंकु बनने की यात्रा शुरू हुई।
यह सब राजगुरु वसिष्ठ की उपस्थिति में हो रहा था। सत्यव्रत की दृष्टि में उसके पिता से बड़े दोषी वसिष्ठ ऋषि थे, क्योंकि उन्होंने पिता अरुण को दंड देने से रोका नहीं। सत्यव्रत का तर्क था कि विवाह मंडप से कन्या उठाना अपराध नहीं है क्योंकि अभी सप्तपदी शुरू नहीं हुई थी। वह चाहता था कि वसिष्ठ ऋषि उसके इस तर्क को स्वीकार कर उसे दंड से बचा लें। लेकिन वसिष्ठ ऋषि के लिए स्त्री का सम्मान और उनकी इच्छा सर्वोपरि थी। पिता के इस फैसले के बाद, राजकुमार अब चांडालों के बीच वन में रहने को विवश हो गया।
सत्यव्रत को पता था कि यह आदेश गुरु वसिष्ठ के कहने पर ही पारित हुआ है। इसलिए वह उनसे बहुत कुपित था। एक दिन वन में शिकार करते हुए उसे कोई पशु नहीं मिला और वह भूख से व्याकुल हो उठा। तभी उसकी दृष्टि वसिष्ठ ऋषि की गाय पर पड़ी। भूख और क्रोध में अंधे होकर उसने उस दुधारू गाय का वध कर दिया।
जब यह समाचार महर्षि वसिष्ठ को मिला, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। उनके लिए संसार में गौ और स्त्री सबसे पूजनीय थे। उन्होंने श्राप देते हुए कहा, ‘तुमने तीन घोर पाप किए हैं—ब्राह्मण कन्या का हरण, पिता के कोप का कारण बनना और गोहत्या। इन पापों के कारण तुम्हारे मस्तक पर तीन गहरे शंकु जैसे चिह्न पड़ जाएंगे। आज से तुम संसार में ‘त्रिशंकु’ के नाम से जाने जाओगे।’ वसिष्ठ के श्राप से सत्यव्रत का रूप विकृत हो गया और वह पिशाच जैसा दिखने लगा।
शायद इस प्रसंग ने त्रिशंकु पर गहरा असर डाला। वे पश्चाताप करने लगे और अपना ध्यान भक्ति और आध्यात्म की ओर केंद्रित किया। वर्षों के योग और देवी की भक्ति के बाद उन्होंने आत्महत्या करने के लिए चिता तैयार की, लेकिन देवी जगदंबा ने प्रकट होकर उन्हें धैर्य रखने को कहा। उन्होंने कहा कि उनके जीवन में परिवर्तन होगा और पिता उन्हें पुनः राज्य सौंपेंगे।
राजा अरुण वन में सत्यव्रत के आचरण पर नजर रखे हुए थे। वे चाहते थे कि वनवास काल में सत्यव्रत का अहंकार नष्ट हो और वह स्वावलंबी बने। त्रिशंकु ने ऐसा ही किया, जिससे प्रसन्न होकर राजा अरुण ने उन्हें वापस बुला लिया और राज्य का उत्तराधिकारी बनाया।
कुछ समय तक सब ठीक चला, लेकिन अपनी विचित्र इच्छाओं के कारण त्रिशंकु ने अंत में एक हट की। उन्होंने वसिष्ठ ऋषि से जीवित ही सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा प्रकट की। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र इक्ष्वाकु वंश में ही थे और त्रिशंकु के पुत्र थे। वसिष्ठ ऋषि ने इसे धर्म विरुद्ध बताते हुए मना कर दिया कि मृत्यु के बिना स्वर्ग प्राप्ति नहीं होती। परंतु त्रिशंकु अपनी जिद पर अड़े रहे। विवाद बढ़ने पर वसिष्ठ ने उन्हें पुनः चांडाल होने का श्राप दिया।
अपमान और दुःख से भरे त्रिशंकु वन में रहने लगे। अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसा क्या हुआ कि वे सशरीर स्वर्ग गए? उनकी इस इच्छा पूर्ति में किस महान व्यक्ति ने सहयोग दिया? और जब स्वर्ग के राजा इंद्र ने उन्हें प्रवेश देने से मना कर दिया, तो उस व्यक्ति ने इंद्र से लड़ते हुए यह तक कह दिया कि ‘यदि त्रिशंकु को सशरीर स्थान नहीं मिला, तो मैं अपनी तपस्या की शक्तियों से एक नया स्वर्गलोक रच दूंगा।’
कौन थे वे व्यक्ति? और त्रिशंकु से उनका क्या संबंध था? यह दिलचस्प कथा हम आपको अगले लेख में बताएंगे। देखते रहिए धर्मध्यानम।





