हनुमान जयंती के पावन अवसर पर, आज बात करते हैं एक ऐसे युद्ध के बारे में जो हनुमान जी ने एक बार पुनः अपने आराध्य प्रभु श्री राम के लिए लड़ा था। परन्तु इस युद्ध की सबसे रोचक बात यह थी कि इसमें स्वयं महादेव, अपने ही अंशावतार हनुमान जी के साथ युद्ध करते हैं। इस प्रसंग का उल्लेख हमें पद्म पुराण में मिलता है।
यह वह युद्ध था जिसका नेतृत्व कर रहे थे शत्रुघ्न जी। साथ में थे मिथिला के जनक लक्ष्मिनिधि, भरत जी के पुत्र पुष्कल, हनुमान जी के नेतृत्व में पूरी वानर सेना और दूसरे राज्यों के बलवान राजा, जैसे कि राजा सुबाहु व सुकेतु वगैरह भी शामिल थे। वहीं, शत्रुपक्ष में थे उज्जैन के राजा वीरमणि और उनका परिवार। साथ ही उनके सहायक बने थे स्वयं शिवजी और उनके पूरे गण।
यह युद्ध जितना रोमांचक है, इसका अंत उतना ही दिव्य। इस युद्ध में तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र जैसे कि आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, वायव्यास्त्र, वज्रास्त्र, भ्रमकास्त्र और ब्रह्मास्त्र चले। कितनी ही मायावी शक्तियां प्रयुक्त हुईं, कितने ही योद्धाओं ने बाहु-युद्ध किए, कुछ गदा युद्ध में निपुण थे तो कुछ द्वैरथ युद्ध के। पर युद्ध अपनी पराकाष्ठा पर तब पहुँचा जब शिवजी और हनुमान जी एक-दूसरे के प्राण लेने पर उतर आए। और इस महासंग्राम का सबसे मनमोहक क्षण वह था, जब स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के आगमन से इस युद्ध को विराम मिला।
इस प्रसंग का सूत्रपात प्रभु श्री राम के अश्वमेघ यज्ञ से होता है। रावण वध के पश्चात राम जी अयोध्या के सिंहासन पर विराजमान थे। महर्षि अगस्त्य के परामर्श पर अयोध्या में भव्य अनुष्ठान प्रारंभ हुआ। यज्ञ के अश्व को रत्नों से सुसज्जित कर उसके ललाट पर एक स्वर्ण-पत्र अंकित किया गया, जिस पर लिखा था:
‘महाराज श्री रामचंद्र के इस अश्व की रक्षा वीर शत्रुघ्न कर रहे हैं। जिस किसी राजा को अपने शौर्य पर गर्व हो, वह इसे रोकने का साहस करे।’
नियम के अनुसार, अश्व को संपूर्ण पृथ्वी का भ्रमण कर सकुशल यज्ञ-मंडप लौटना था। मार्ग में कई राजाओं ने मैत्री दिखाई, तो कुछ ने चुनौती दी, किंतु अंततः सभी ने शत्रुघ्न जी की शक्ति के आगे नतमस्तक होना स्वीकार किया। अश्व विभिन्न राज्यों से होता हुआ नर्मदा तट पर स्थित देवपुर पहुँचा। देवपुर में उस समय महाराज वीरमणि राज करते थे। उनका पुत्र था रुक्मांगद। जब रुक्मांगद अपनी पत्नियों के साथ वन में घूम रहे थे, उस समय उनकी दृष्टि उस घोड़े पर पड़ी। घोड़ा देखने में सुंदर तो था ही, जिससे रुक्मांगद आकर्षित हुए। उन्होंने उस अश्व को पकड़ लिया और ले चले अपने साथ। अश्व की सुंदरता से अधिक, रुक्मांगद को वह स्वर्ण-पत्र आकर्षित कर गया क्योंकि स्वर्ण-पत्र पर लिखे हुए विधान को उन्होंने चुनौती के रूप में ले लिया और शत्रुघ्न जी को संग्राम करके अश्व को वापस लेने के लिए ललकार दिया।
रुक्मांगद के पिता वीरमणि बड़े ही शिवभक्त थे। शिवजी पार्वती के साथ उन्हीं के राज्य में ही निवास करते थे। जब रुक्मांगद की इस करतूत का पता उनके पिता वीरमणि को लगा, तब उन्होंने सारी बात महादेव जी को कह सुनाई। महादेव जी ने वीरमणि को चुपचाप न केवल अश्व, परन्तु अपना राज्य भी रामचंद्र जी को अश्वमेघ यज्ञ में भेंट रूप देने की सलाह दी। परन्तु वीरमणि ने क्षत्रिय धर्म का तर्क देते हुए महादेव जी की बात यह कह के नहीं मानी कि, ‘क्षत्रियों का किसी की शरण में जाना तो कायरता है। भय से विह्वल होकर क्षत्रिय अगर अपने धर्म के विपरीत जाए और पहले ही हार मान ले, तो उससे बड़ा अधार्मिक कोई नहीं कहलाएगा।’
शिवजी समझ गए थे कि वीरमणि मानने वाले नहीं थे। युद्ध ही वीरमणि की नियति है। महादेव जी हमेशा अपने भक्तों की सहायता के लिए तत्पर रहते ही हैं, चाहे वह भक्त देव, राक्षस, दैत्य, दानव या कोई मनुष्य हो। और इस युद्ध में महादेव जी को वीरमणि की रक्षा करते हुए युद्ध करना था।
युद्ध प्रारंभ होता है। दोनों पक्षों से हर योद्धा लड़ने के लिए उद्यत है। भरत जी के पुत्र पुष्कल ने अपना अद्भुत युद्ध कौशल्य दिखाते हुए वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद को परास्त करके मूर्छित कर दिया। पुत्र को घायल देख कर वीरमणि पुष्कल के प्राण लेने के लिए दौड़ते हैं। यह देख कर हनुमान जी को अपने पुत्र समान पुष्कल की चिंता विचलित कर देती है और वे पुष्कल को वहां से हट जाने को कहते हैं, क्योंकि हनुमान जी जानते थे कि वीरमणि आयु के चलते युद्ध के तजुर्बे में पुष्कल से कहीं आगे हैं और उसके साथ-साथ वीरमणि कई अस्त्र-शस्त्र विद्या जानते हैं। और सबसे बड़ी बात, स्वयं शिव उनके रक्षक हैं। परन्तु जो इक्षवाकु वंशज हों और उसमें भी जो रामचंद्र जी की गोद में खेले हों, उनको युद्ध का क्या ही भय? पुष्कल हनुमान जी की बात को नकारते हुए रामचंद्र जी का स्मरण करके वीरमणि के साथ युद्ध करते हैं और उनको पराजित भी करते हैं।
उधर, हनुमान जी ने वीरमणि के भाई वीरसिंह को अपने वज्रतुल्य मुष्टिका प्रहार से मूर्छित कर दिया। वीरमणि की रक्षा करते हुए उनके भतीजे शुभांगद और रुक्मांगद भी वहां आ पहुँचते हैं। हनुमान जी उन दोनों को रथ और धनुष सहित अपनी पूंछ में लपेट लेते हैं और जोर से धरती पर पटक देते हैं। दोनों युवा मूर्छित हो जाते हैं। उधर पुष्कल से वीरमणि परास्त होकर मूर्छित गिरे हुए थे… उन्हें देखकर शिवजी अपनी पूरी सेना को रणभूमि में युद्ध के लिए बुलाते हैं। महादेव जी वीरभद्र को पुष्कल से युद्ध करने के लिए भेजते हैं। इतनी छोटी आयु में भी पुष्कल बहुत वीरता से वीरभद्र से लड़े। ये वही वीरभद्र थे जिन्होंने महादेव जी के अपमान पर प्रजापति दक्ष का वध किया था। वीरभद्र और पुष्कल के बीच पांच दिनों तक घोर युद्ध चला और फिर पांचवें दिन क्रोध से भरे हुए पुष्कल ने वीरभद्र का गला पकड़ कर उन्हें धरती पर पटक दिया। जिसके जवाब में वीरभद्र ने पुष्कल के मस्तक को त्रिशूल से काट दिया! पुष्कल वीरगति को प्राप्त हुए।
यह देख कर शत्रुघ्न जी बहुत आहत हुए, परन्तु शिवजी के ही समझाने पर वे फिर से युद्ध करने लगे। अब शत्रुघ्न शिवजी से लड़ रहे थे। शत्रुघ्न जी के चलाए हुए ब्रह्मास्त्र को शिवजी गटक से निगल लेते हैं। शिवजी ने उधर से एक अग्नि के समान प्रज्वलित बाण को शत्रुघ्न जी की छाती में मारा, जिससे अब शत्रुघ्न जी मूर्छित होकर गिर गए। अब रघुनाथ की सेना पराजय की कगार पर थी। शत्रुघ्न जी की सेना ने जहां सबको पराजित कर दिया था और युद्ध अपने पक्ष में कर लिया था, वहीं शिवजी के आने से अब युद्ध का पासा पलटता हुआ दिख रहा था। पहले पुष्कल मारे गए, अब शत्रुघ्न जी मूर्छित हो गए थे।
यह सब देख के हनुमान जी को महादेव जी पर बड़ा क्रोध आया। वे महादेव जी का वध करने के लिए उनके निकट गए और बोले, ‘रुद्र! तुम राम भक्तों का वध करने के लिए उद्यत हुए हो, जो कि धर्म से बिलकुल विपरीत है। श्रेष्ठ ऋषि-मुनियों ने कही हुई बात एकदम झूठी साबित हुई कि रुद्र तो हमेशा रघुनाथ जी के चरणों का स्मरण करते रहते हैं। अगर ऐसा होता तो तुम कभी भी रामचंद्र के भक्त शत्रुघ्न के साथ युद्ध नहीं करते।’ महादेव जी भी तर्क देते हुए हनुमान जी से कहते हैं, ‘तुम्हारी बात सही है हनुमान। भगवान श्री रामचंद्र जी वास्तव में मेरे स्वामी हैं, पर मेरे भक्त वीरमणि की रक्षा करना भी मेरा धर्म ही है क्योंकि भक्त हमेशा अपना ही स्वरूप होता है। और जिस तरह से संभव हो, उस तरह से वीरमणि की रक्षा मैं करूँगा ही।’
हनुमान जी का क्रोध अब सारी सीमाएं लांघ रहा था। उन्होंने क्रोध में एक बड़ी शिला उठाई और शिवजी के रथ पर दे मारी। रथ, सारथि, घोड़े, सब कुछ चूर-चूर हो गया। महादेव जी अब नंदी पर सवार हो गए और फिर से युद्ध करने लगे। फिर हनुमान जी ने शाल का वृक्ष उखाड़ कर दे मारा शिवजी की छाती पर। इसके उत्तर में वहां से शिवजी ने अपने शूल को फेंका हनुमान जी की छाती चीरने के लिए। हनुमान जी ने शूल को एक झटके में तिल-तिल करके तोड़ डाला। अब महादेव जी ने शक्ति का प्रहार किया, उसे भी हनुमान जी ने सह लिया और फिर से एक वृक्ष फेंक मारा महादेव जी की छाती पर। एक के बाद एक शिलाएं, पर्वत, वृक्ष मार-मार के हनुमान जी ने महादेव जी को अपनी पूंछ में लपेट लिया और लगे महादेव जी को पटकने।
थोड़ी ही क्षणों में महादेव जी कह उठे, ‘रघुनाथ के सेवक, तुम धन्य हो! आज तुम्हारे पराक्रम के आगे मैं बिल्कुल असमर्थ हूँ। मुझे तुम्हारी वीरता से बहुत संतोष हुआ है। तुम मुझसे कोई वर मांगो।’ हनुमान जी कहते हैं, ‘महेश्वर! मैंने तो श्री राम को प्राप्त कर लिया है। मेरे पास तो सब कुछ है। यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हैं तो इतना कीजिये: हमारे पक्ष के बहुत से योद्धा मूर्छित हुए हैं और पुष्कल के तो प्राण ही नहीं रहे। मैं अभी द्रोण पर्वत जा कर संजीवनी बूटी ले कर आता हूँ, तब तक आप इन सबके शरीर की रक्षा करें।’
भगवान शंकर बात से सहमत होते हैं। उधर हनुमान जी ठीक वैसे ही समस्त द्रोण पर्वत उठा कर ले आते हैं जैसे कि रावण के साथ युद्ध में लक्ष्मण जी के लिए लाते हैं। राम जी का नाम लेकर सब को हनुमान जी संजीवनी बूटी देते हैं। भरत जी होश में आ जाते हैं, पुष्कल पुनर्जीवित होते हैं। युद्ध पुनः प्रारंभ हुआ। जब शत्रुघ्न ने मोहनास्त्र से वीरमणि को पुनः मूर्छित किया, तो महादेव अत्यंत उग्र हो गए और शत्रुघ्न जी के साथ संग्राम करते हैं। कुछ समय बाद शिवजी के साथ युद्ध करते-करते शत्रुघ्न जी अत्यंत व्याकुल हो उठते हैं। अब उनकी मानसिक और शारीरिक शक्ति जवाब दे रही थी। तब हनुमान जी के उपदेश से शत्रुघ्न जी श्री राम का स्मरण करते हुए कहते हैं, ‘हे नाथ! हे भाई! ये अत्यंत भयंकर शिव, धनुष उठा कर मेरे प्राण लेने पर उतारू हो गए हैं। आप मेरी रक्षा कीजिये।’ स्मरण करते ही प्रभु श्री राम हाथ में मृग का श्रृंग लिए, यज्ञ-दीक्षित पुरुष के रूप में वहां आ पहुँचे।
स्वयं रामचंद्र जी को वहां उपस्थित देख कर महादेव जी आगे बढ़े और बोले, ‘भगवन! एक मात्र आप ही साक्षात् अंतर्यामी पुरुष हैं। आप ही प्रकृति से पर परब्रह्म कहलाते हैं। जो अपनी अंश-कला से इस विश्व की सृष्टि, रक्षा और संहार करते हैं। आप साक्षात् मेरे ही स्वरूप हैं। इस युद्धभूमि में मैंने जो कुछ भी किया, वह सब अपने भक्त के लिए ही किया है। इसमें मेरा कोई स्वार्थ नहीं था। मेरे इस अपराध को क्षमा करें।’ जिसके उत्तर में राम जी कहते हैं, ‘देवताओं का तो ये धर्म ही है कि वे अपने भक्तों की हमेशा रक्षा करें। आपने अपने भक्त की रक्षा करके कुछ भी अनुचित कार्य नहीं किया है। आप निश्चिंत रहें। क्योंकि आपके हृदय में हमेशा मैं और मेरे हृदय में सदा आप ही निवास करते हैं। हम दोनों एक ही रूप हैं। जो मेरे भक्त हैं, वो आपके भी भक्त हैं, वैसे ही जो आपके भक्त हैं, वो निश्चित रूप से मेरे भक्त होंगे।’
एक सुखद अंत के साथ युद्ध का यहां विराम हुआ। शिवजी ने अपने स्पर्श से मूर्छित हुए वीरमणि को और अन्य सभी को जीवित किया। महादेव जी के कहने से वीरमणि ने श्रीराम जी को प्रणाम किया, उनका अश्व सूपुर्द किया और अपना सारा राज्य व सब धन राम जी को यज्ञ के लिए समर्पित किया। तो ऐसे हुआ महादेव का अपने ही अवतार हनुमान जी से सामना। इतिहास में एक बार इसके पहले भी ऐसा कुछ होता हुआ प्रतीत होता है जब शिव-धनुष तोड़ते समय विष्णु के दो अवतार- परशुराम और राम आमने-सामने हो गए थे। पर ये उससे भी महान लग रहा था क्योंकि यहां भगवान स्वयं और उनके अवतार आमने-सामने थे, वो भी युद्ध की भूमि में। एक अपने स्वामी के लिए लड़ रहा था (हनुमान जी) और एक अपने भक्त के लिए (शिवजी)।





