जैसे कि हमने आपको पिछले वीडियो में बताया था, हमारे वर्तमान मनु वैवस्वत मनु के दस पुत्रों में से एक महान क्षत्रिय पुत्र थे इक्ष्वाकु। इक्ष्वाकु के कई पुत्र हुए, जिनमें से तीन मुख्य रूप से प्रसिद्ध हुए — निमि, विकुक्षि और दण्ड।निमि और विकुक्षि की कथा तो हम पहले ही बता चुके हैं। आज हम बात करेंगे इक्ष्वाकु के तीसरे पुत्र दण्ड की।दण्ड इक्ष्वाकु के सबसे छोटे पुत्र थे। बाल्यावस्था से ही वे अपने भाइयों की तरह कर्मनिष्ठ नहीं थे। उन्हें काम करने में मन नहीं लगता था और भाइयों के साथ भी उनका व्यवहार अच्छा नहीं रहता था।
पिता इक्ष्वाकु दण्ड को लेकर बहुत चिंतित और दुखी रहते थे। उन्हें डर था कि दण्ड की भाइयों से अनबन के कारण यदि उन्हें आस-पास का राज्य दिया गया तो भाई-भाई में लड़ाई हो सकती है। इसलिए इक्ष्वाकु ने दण्ड को विंध्य और शैवल पर्वत के बीच का दूरस्थ क्षेत्र दे दिया, जो वर्तमान में मध्य प्रदेश और गुजरात के आस-पास पड़ता है।
दण्ड ने उस पर्वतीय क्षेत्र में अपना राज्य बसाया और उसकी राजधानी का नाम रखा — मधुमन्त। अपनी बुद्धिमता से उन्होंने मधुमन्त को बेहद सुंदर और रमणीय बना दिया। उन्होंने अपने राज्य का राजपुरोहित बनाया शुक्राचार्य को। कुछ समय तक सब कुछ ठीक चलता रहा।
एक दिन दण्ड राज्य भ्रमण करते हुए शुक्राचार्य के आश्रम पहुँच गए। उस समय शुक्राचार्य आश्रम में नहीं थे। वहाँ दण्ड ने शुक्राचार्य की सबसे बड़ी पुत्री अरजा को देखा। अरजा अत्यंत सुंदर थी। उसकी सुंदरता देखकर दण्ड जैसे मंत्रमुग्ध हो गए।दण्ड ने अरजा को पास बुलाकर कहा, “तुम्हारी सुंदरता मेरी बुद्धि को खोटी कर रही है। तुम अभी मेरी हो जाओ। मैं तुमसे दूर नहीं रह पा रहा।”
अरजा यह सुनकर घबरा गई। उसने दण्ड को समझाया, “यह करना धर्म के विरुद्ध होगा। यदि आप मुझे चाहते हैं तो मेरे पिता शुक्राचार्य से विवाह का प्रस्ताव रखिए। वे अवश्य स्वीकार कर लेंगे।”
किन्तु दण्ड कामवासना से इतने अंधे हो चुके थे कि उन्हें कुछ भी सूझ नहीं रहा था। उन्होंने अरजा की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ बलात्कार कर दिया।
जब यह बात शुक्राचार्य को पता चली, तो उनके क्रोध की कोई सीमा न रही। उन्होंने दण्ड को श्राप दे दिया कि सात दिनों के अंदर उनका पूरा राज्य जलकर भस्म हो जाएगा।श्राप के प्रभाव से ठीक सात दिनों में दण्ड का राज्य, उसकी प्रजा, पुत्र, सेना, सेवक — सब कुछ राख का ढेर बन गया। वन के पशु-पक्षी, वृक्ष और वनस्पतियाँ भी भस्म हो गईं। मधुमन्त पूरी तरह निर्जन हो गया।
इस प्रकार इक्ष्वाकु के तीन पुत्रों के नाम पर तीन प्रसिद्ध प्रदेश बने — निमि के वंशजों से मिथिला, विकुक्षि से अयोध्या और दण्ड से दण्डकारण्य।
शुक्राचार्य के श्राप से दण्डकारण्य में भयंकर दावानल लगा था। धीरे-धीरे आग शांत हुई और राख के ढेर ठंडे पड़े। वन फिर से हरा-भरा होने लगा। सुंदर वृक्ष फल-फूल देने लगे। वन के बीच स्थित विशाल सरोवर फिर से कमलों से भर गया। पानी इतना स्वच्छ था कि उसमें कीचड़ का नाम भी नहीं था।
परन्तु वन अब भी पूरी तरह निर्जन था — न कोई मनुष्य, न कोई पशु-पक्षी।
और फिर एक दिन, अचानक उस निर्जन वन में आ पहुँचे अगस्त्य ऋषि। उनके आने के बाद अन्य ऋषि-मुनि भी वहाँ तपस्या करने आने लगे। तभी से इस निर्जन दण्डकारण्य का नाम जनस्थान पड़ गया।
किन्तु… अगस्त्य ऋषि ऐसे निर्जन वन में गए ही क्यों? उनका वहाँ जाना भी नियति की लीला ही थी। यह सुंदर प्रसंग हम आपको अगले वीडियो में बताएंगे, जहाँ एक ऐसा राजा है जो मृत्यु के बाद भी अपने ही मृत शरीर को प्रतिदिन खाता है।





