हमारी सनातन परंपरा में विवाह के लिए कुछ विधियां निश्चित की गई हैं। जैसे ग्रह शांति, मंडप स्थापन और नांदीमुख कृत्य जैसी परंपराएं। इस वीडियो में हम जानेंगे कि इन विधियों को पूर्ण करना इतना जरूरी क्यों माना गया है। जब भगवान शिव को पाने के लिए माता पार्वती का तप समाप्त हुआ तब शिव को पार्वती और पार्वती को शिव प्राप्त हुए। गीता प्रेस द्वारा रचित शिव पुराण में यह उल्लेख है कि माता पार्वती के तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव तो उन्हें तपोवन से ही पत्नी का स्थान देकर कैलाश ले जाने को तैयार थे। लेकिन उस पर पार्वती के अलग मत थे।
माता पार्वती ने कहा कि सनातन परंपरा की विधि के अनुसार विवाह संपन्न होना बहुत आवश्यक है। इस बात को समझाते हुए मां पार्वती ने शिव से कहा था, “पूर्व समय में जब मैं दक्ष की कन्या थी, उस समय भी मेरे पिता ने मुझे आपको ही दिया था। किंतु उस समय आपने विधि-पूर्वक मुझसे विवाह नहीं किया था। उस समय मेरे पिता दक्ष ने विधिपूर्वक ग्रहों का पूजन नहीं किया था। उन ग्रहों के कारण ही विवाह में विघ्न हुआ। इसलिए हमें ग्रह शांति भी करनी पड़ेगी।”
न केवल विधियां अपितु विवाह के क्रम को भी मानना आवश्यक बताते हुए माता पार्वती आगे कहती हैं। सबसे पहले मैं अपने पिता के घर जाऊंगी। क्योंकि विवाह और विदाई पिता के घर से ही होनी चाहिए। इसलिए माता पार्वती ने पहले तो शिव जी से अपने पिता हिमालय के घर वापस जाने देने को कहा।
उसके बाद मां पार्वती ने शिव जी को विधि-पूर्वक विवाह का महत्व समझाते हुए उन्हें विवाह से जुड़ी परंपराओं का क्रम से अनुसरण करने को कहा। पार्वती ने शिव से कहा, “आपको भिक्षुक की भांति मेरे पिता हिमालय से मुझे विधिपूर्वक मांगना चाहिए। ऐसा करने से आपके यश का तो विस्तार होगा ही। साथ ही साथ मेरे पिता का गृहस्थ आश्रम भी सफल हो जाएगा।”
हालांकि शुरुआत में शिव थोड़ा सा हिचकते अवश्य हैं क्योंकि जिसने दुनिया को केवल दिया हो, उसको किसी से भी कुछ मांगने में हिचकिचाहट तो होगी ही। मां पार्वती भी उनके इस भाव का आदर करके उनको बुद्धिमता और प्रेम के साथ कोई लीला रचने का रास्ता दिखाती हैं। और शिव जी ने अंततः पार्वती की इच्छा अनुसार कार्य किया और नट के रूप में हिमालय के पास जाकर ब्रह्मा, विष्णु और पार्वती की स्तुति करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से माता पार्वती का हाथ उनके पिता हिमालय से मांगा।
भगवान शिव ने माता पार्वती के कहे अनुसार विवाह की सारी विधियों का अनुसरण किया। स्वयं भगवान विष्णु ने भी शिव से विधि-युक्त विवाह करने का आग्रह किया था ताकि शिव-पार्वती का यह विवाह पूरे संसार के लिए एक आदर्श बन जाए।
इसलिए आज आप देखिए कि कन्या के पिता से कन्या का हाथ मांगने से लेकर कन्यादान तक, भारतीय हिंदू परंपरा में उन्हीं वैवाहिक विधियों का प्रयोग होता है जो स्वयं माता पार्वती और भगवान शिव ने भी करना जरूरी समझा। शिव-पार्वती का विवाह हमें सिखाता है कि विवाह केवल भावनाओं का मिलन नहीं होता बल्कि यह जिम्मेदारी, परंपरा और आदर्श की स्थापना भी होती है।





