हमारे वेदों, पुराणों और महाकाव्यों में कुछ टर्मिनोलॉजीज़ बार-बार सुनने और पढ़ने में आती हैं—जैसे देव-दानव, सुर-असुर, दैत्य-राक्षस, यक्ष-गंधर्व और मरुद्गण वगैरह-वगैरह।
मोटा-मोटी कॉमन सेंस से यह तो समझ आ जाता है कि ये सब अलग-अलग स्पीशीज के रेफरेंस में ही इस्तेमाल हुए हैं, पर इन सबकी उत्पत्ति यानी जन्म का इतिहास अलग-अलग है।
इसी बेसिक कॉन्सेप्ट पर बात करते हुए आज जानते हैं इन स्पीशीज में से देव, दानव, दैत्य, राक्षस और यक्ष का इतिहास।
सबसे पहले यह जान लीजिए कि दानव, दैत्य और राक्षस—ये सब एक नहीं हैं, क्योंकि इन सबकी उत्पत्ति अलग-अलग हुई थी। इनमें से दानव, दैत्य और देव—ये तीनों महर्षि कश्यप की संतान के रूप में जन्मे। कश्यप ऋषि की पत्नी अदिति ने देवों को जन्म दिया, उनकी पत्नी दिति ने दैत्यों को और दनु ने दानवों को जन्म दिया। इस प्रकार ऋषि कश्यप से देव, दानव और दैत्य का लीनिएज आगे बढ़ा।
वैसे इस बात से यह प्रश्न ज़रूर उठता है कि जब देव, दानव और दैत्य एक ही पिता की संतान थे, तो उनकी प्रकृति और प्रवृत्ति इतनी अलग कैसे हो गई? इसके उत्तर भी हमारे पुराणों में मिलते हैं, जिस पर हम आगे कभी बात करेंगे।
पर अब बात करते हैं राक्षस और यक्ष की।
राक्षस और यक्ष की उत्पत्ति बिल्कुल अलग तरीके से हुई थी और इसकी डिटेल्ड हिस्ट्री हमें वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में मिलती है।
सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने समुद्रगत जल की सृष्टि यानी कॉस्मिक ओशन की रचना की और इसकी रक्षा के लिए उन्होंने कुछ स्पेशल स्पीशीज भी उत्पन्न कीं।
इन स्पीशीज को उनकी ड्यूटी समझाते हुए ब्रह्मा जी ने कहा कि आप लोगों को इस जल सृष्टि की रक्षा करने की रिस्पॉन्सिबिलिटी निभानी होगी।
अब रक्षा करने के दृष्टिकोण के आधार पर वे सभी जीव दो ग्रुप्स में बंट गए। एक ग्रुप ने रक्षा करने का संकल्प लिया, तो दूसरे ग्रुप ने पूजा-अर्चना करने की जिम्मेदारी ली।
अब जिस ग्रुप ने रक्षा की रिस्पॉन्सिबिलिटी ली थी, उसे ब्रह्मा जी ने ‘राक्षस’ (रक्षण करने वाले) नाम दिया और जिस ग्रुप ने यजन यानी पूजा करने की जिम्मेदारी ली, वे ‘यक्ष’ कहलाए।
तो इस तरह ये स्पीशीज और सब-स्पीशीज में बंट गईं।
और रावण के राक्षस कुल का लीनिएज भी वहीं से निकलता है, जिसके बारे में हम आपको जल्द ही और इंटरेस्टिंग डिटेल्स बताने वाले हैं। तो क्या आपको भी अभी तक यही लगता था कि राक्षस कुल की उत्पत्ति रावण के पिता विश्रवा जी से ही हुई थी? प्रभु श्री राम को भी यही लग रहा था, जब तक कि अगस्त्य मुनि ने उन्हें ये क्रेडिबल डिटेल्स नहीं बताई थीं।





