3 और 4 जून की दरमियानी रात जब पूरा गुजरात सो रहा था, तब गांधीनगर से लेकर अहमदाबाद तक की सड़कों पर पुलिस की गाड़ियां दौड़ रही थीं। क्राइम ब्रांच, SOG, साइबर क्राइम और EOW की टीमें अपनी पोजीशन ले चुकी थीं। किसी को कानों-कान खबर नहीं थी कि क्या होने वाला है।
एक ऐसा सीक्रेट प्लान, जिसके बारे में पुलिस के बड़े अफसरों को भी आखिरी वक्त पर बताया गया और फिर एक साथ, एक ही वक्त पर शुरू होता है ‘ऑपरेशन डेल्टा हंट’!
ये कोई आम पुलिस रेड नहीं थी। ये गुजरात सरकार का वो सीधा और कड़ा संदेश था, जिसने देश के दुश्मनों और अवैध घुसपैठियों की रातों की नींद उड़ा दी है। गुजरात की धरती पर अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों को चुन-चुनकर, ढूंढ-ढूंढकर बाहर निकालने का महा-अभियान शुरू हो चुका है।
मात्र 24 से 48 घंटों के भीतर 600 से ज्यादा अवैध बांग्लादेशी सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं और ये आंकड़ा हर घंटे बढ़ रहा है.. आज की इस वीडियो में हम इस पूरे ऑपरेशन की वो इनसाइड स्टोरी खोलेंगे, जिसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।
कैसे ‘ऑपरेशन म्यूल हंट’ को एक कवर स्टोरी की तरह इस्तेमाल किया गया और उसकी आड़ में ‘ऑपरेशन डेल्टा हंट’ का ऐसा चक्रव्यूह रचा गया कि पूरा नेटवर्क गच्चा खा गया? इस पूरे खेल के पीछे कौन-सा सिंडिकेट काम कर रहा है? सब कुछ जानेंगे, बिल्कुल तसल्ली से।
मिडनाईट सीक्रेट मीटिंग
कहानी शुरू होती है ऑपरेशन से ठीक दो दिन पहले। आधी रात को गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी के गांधीनगर ऑफिस में एक हाई-लेवल मीटिंग बुलाई जाती है। राज्य के सभी टॉप पुलिस अधिकारी वहां मौजूद थे। बाहर मीडिया को खबर दी गई कि भाई, ये मीटिंग तो ‘ऑपरेशन म्यूल हंट’ (Operation Mule Hunt) के दूसरे फेज के लिए है, जो साइबर फ्रॉड के खिलाफ चल रहा है। लेकिन ये तो सिर्फ एक ‘कवर प्लान’ था! असली निशाना साइबर ठग नहीं, बल्कि देश की सीमाओं को लांघकर गुजरात में दीमक की तरह फैल रहे अवैध घुसपैठिए थे।
ऐसा इसलिए किया गया ताकि घुसपैठियों के नेटवर्क, उनके स्थानीय आकाओं और स्लीपर सेल को भनक तक न लगे कि पुलिस उनके दरवाजे पर दस्तक देने वाली है। और इस ऑपरेशन का कोडनेम था, “ऑपरेशन डेल्टा हंट”।
पुलिस ने इस बार एक नई तरकीब अपनाई। अमूमन जब रेड होती है, तो लोग भाग जाते हैं। लेकिन इस बार पुलिस ने ‘नाकाबंदी और घेराबंदी’ की रणनीति अपनाई। जिस भी इलाके में रेड होनी थी, पुलिस ने पहले उस पूरे एरिया को चारों तरफ से सील कर दिया। परिंदा भी पर न मार सके; नतीजा क्या हुआ? जो लोग पुलिस को देखकर भागने की कोशिश कर रहे थे, वो सीधे नाके पर तैनात पुलिसवालों के हत्थे चढ़ गए।
अहमदाबाद के वो इलाके जो बन चुके थे ‘हब’
अब बात करते हैं कि आखिर ये घुसपैठिए रह कहां रहे थे? पुलिस के पास पुख्ता खुफिया इनपुट थे। अहमदाबाद के कुछ खास इलाके इन अवैध प्रवासियों के सेफ हेवन यानी सुरक्षित ठिकाने बन चुके थे। अहमदाबाद का दाणीलीमडा, वटवा, इसनपुर, ओढव, नारोल, नरोडा, सरखेज और सोला… ये वो इलाके हैं जहां पुलिस ने सबसे ज्यादा इंटेंस चेकिंग चलाई।
एक-एक घर, एक-एक झुग्गी, और संदिग्ध ठिकानों को खंगाला गया। शुरुआती 24 घंटे में पुलिस ने करीब 1000 से ज्यादा संदिग्धों को हिरासत में लिया। क्राइम ब्रांच के दफ्तर में लंबी लाइनें लग गईं। जब उनके कागजात चेक किए गए, उनकी कड़ाई से पूछताछ की गई, तो परतें खुलती चली गईं।
पहले चरण में 362 लोगों की पहचान हुई। अगले कुछ घंटों में यह संख्या 501 तक पहुंच गई। और 10 जून की शाम तक गिरफ्तार व हिरासत में लिए गए अवैध बांग्लादेशियों की संख्या 600 का आंकड़ा पार कर चुकी थी।
लेकिन सबसे चौंकाने वाला खुलासा क्या था? शुरुआती जांच में जो सच सामने आया है, वो बेहद डरावना है। पुलिस जांच के मुताबिक, पकड़ी गई अधिकांश बांग्लादेशी महिलाएं शहरों में स्पा (Spa) और देह व्यापार (Prostitution) जैसी अवैध और illegal activities की आड़ में छिपी हुई थीं। वहीं, पुरुष स्थानीय स्तर पर छूपकर मजदूरी का काम कर रहे थे। यानी एक तरफ तो ये भारत के नागरिकों के रोजगार पर डाका डाल रहे थे, और दूसरी तरफ देश के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचा रहे थे।
अब आप सोच रहे होंगे कि एक विदेशी नागरिक बिना पासपोर्ट-वीजा के भारत में आकर सालों-साल रह कैसे लेता है? उसे घर कैसे मिल जाता है? वो सिम कार्ड कैसे खरीद लेता है?
तो सुनिए, इस पूरे कारोबार के पीछे एक बहुत बड़ा रैकेट काम कर रहा है। इन घुसपैठियों के पास से फर्जी आधार कार्ड, नकली पैन कार्ड और फर्जी राशन कार्ड बरामद हुए हैं! ये वो दस्तावेज हैं जो एक झटके में किसी विदेशी को कागजों पर ‘हिंदुस्तानी’ बना देते हैं। पुलिस अब उन जनसेवा केंद्रों, कंप्यूटर ऑपरेटरों और दलालों की गर्दन नाप रही है जो कुछ रुपयों के लिए देश की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रहे थे।
पैसे का खेल: हवाला नेटवर्क
ये घुसपैठिए यहां सिर्फ रह नहीं रहे थे, बल्कि यहां से करोड़ों रुपये कमाकर अवैध तरीके से बांग्लादेश भेज रहे थे। इसके लिए ये लोग कुछ चीनी और प्रतिबंधित मोबाइल ऐप्स का इस्तेमाल कर रहे थे, साथ ही गुजरात के ट्रेडिशनल ‘अंगड़िया’ और ‘हवाला’ नेटवर्क का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा था। क्राइम ब्रांच ने अब तक ऐसे कई बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है और इस मनी ट्रेल की गहराई से जांच कर रही है।
पुलिस ने साफ कर दिया है कि इन घुसपैठियों के बसने के पीछे कुछ स्थानीय लोगों का हाथ है। जांच में सामने आया है कि इन्हें मकान किराए पर देने, इनके फर्जी डॉक्यूमेंट्स बनवाने और इन्हें काम पर रखने में स्थानीय स्तर पर कुछ लोग मदद कर रहे थे।
गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने खुले मंच से चेतावनी दी है कि “गुजरात की धरती पर एक भी घुसपैठिए को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लेकिन उससे भी सख्त कार्रवाई उन लोगों पर होगी जिन्होंने इन्हें घर दिया, जिन्होंने इन्हें नौकरी दी और जिन्होंने इन्हें यहां छुपाया। देश से गद्दारी करने वाले किसी भी शख्स को बख्शा नहीं जाएगा”
पुलिस अब उन मकान मालिकों पर FIR दर्ज कर रही है जिन्होंने बिना पुलिस वेरिफिकेशन के इन लोगों को अपने घरों में रखा।
चंडोला तालाब का सच
पुलिस की जांच में दो नाम बहुत तेजी से उभरकर सामने आए हैं- जावेद और लल्ला बिहारी। ये वो शातिर एजेंट हैं जो बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत में एंट्री दिलाने से लेकर उन्हें गुजरात में सेटल करने तक का ठेका लेते थे। अब यहां पर एक बहुत बड़ा कनेक्शन सामने आता है, जो आपको जरूर जानना चाहिए। चलिए आपको लेकर चलते हैं इतिहास के एक ऐसे ही वाकये की तरफ, जो आज के हालात से हूबहू मेल खाता है।
यह कोई पहली बार नहीं है जब अहमदाबाद का चंडोला तालाब अवैध गतिविधियों के केंद्र के रूप में सामने आया है। कुछ साल पहले, अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन और गुजरात पुलिस ने चंडोला तालाब इलाके में एक बड़ी डिमोलिशन ड्राइव चलाई थी।
चंडोला तालाब के आसपास हजारों की संख्या में अवैध झुग्गियां बन गई थीं। जब पुलिस और प्रशासन वहां जांच के लिए पहुंचे, तो पता चला कि वह इलाका मिनी-बांग्लादेश बन चुका था। वहां बड़े पैमाने पर अवैध बांग्लादेशी प्रवासी रह रहे थे।
इसी चंडोला तालाब के डिमोलिशन के वक्त जावेद और लल्ला बिहारी जैसे एजेंटों का नाम पहली बार रिकॉर्ड पर आया था। ये एजेंट सीमा पार से आने वाले लोगों को प्रति व्यक्ति मोटी रकम लेकर चंडोला तालाब जैसी सरकारी जमीनों पर अवैध रूप से झुग्गियां अलॉट करवाते थे, बिजली-पानी का अवैध कनेक्शन दिलवाते थे और धीरे-धीरे उन्हें स्थानीय वोटर लिस्ट में शामिल करवाने की कोशिश करते थे।
आज ‘ऑपरेशन डेल्टा हंट’ में जो लोग पकड़े जा रहे हैं, उनमें से कई लोगों के तार इसी पुराने चंडोला तालाब सिंडिकेट से जुड़े हुए हैं। यानी जड़ें बहुत गहरी हैं, और पुलिस इस बार सिर्फ पत्तियां नहीं तोड़ रही, बल्कि पूरी जड़ को उखाड़ फेंकने के मूड में है।
‘ऑपरेशन डेल्टा हंट’ अभी थमा नहीं है। यह तो सिर्फ शुरुआत है। कई ठिकानों पर ताले लग चुके हैं। सैकड़ों लोग हिरासत में हैं। लेकिन असली सवाल अब भी बाकी है। क्या ये सिर्फ गुजरात की कहानी है? या देश के दूसरे शहरों में भी ऐसे ही नेटवर्क जड़ें जमा चुके हैं? क्योंकि अगर घुसपैठ सिर्फ सीमा पार करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि फर्जी पहचान, हवाला नेटवर्क और स्थानीय संरक्षण तक पहुंच गई है तो लड़ाई सिर्फ कुछ लोगों की गिरफ्तारी की नहीं, पूरे सिंडिकेट को खत्म करने की है।
अगर आपके पास वैध दस्तावेज नहीं हैं, अगर आप देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, तो कानून का हथौड़ा आप पर गिरेगा ही गिरेगा। और उन मकान मालिकों और एम्पलॉयर के लिए भी यह सबक है, जो बिना जांच-पड़ताल के कुछ पैसों के लालच में किसी को भी अपने यहां रख लेते हैं।


