Pakistan terror

ISI का नया ‘डबल गेम’: LoC पर हाई-फ्रीक्वेंसी टॉवर्स और रॉग सिग्नल्स का खतरनाक जाल

Summary
पाकिस्तान और ISI भारत के खिलाफ एक नया हाइब्रिड वॉर खेल रहे हैं। LoC के पास हाई-फ्रीक्वेंसी टेलीकॉम टॉवर्स लगाने से लेकर भारतीय राजनीतिक दलों में OGWs की घुसपैठ तक, सुरक्षा व्यवस्था को भेदने की इस पूरी क्रोनोलॉजी को समझिए।

पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी ISI भारत में इस समय जो ‘डबल गेम’ खेल रही है, वो सुनकर आपके भी कान खड़े हो जाएंगे। ये कोई साधारण सीमा विवाद नहीं है, ये भारत की सुरक्षा में लगाई जा रही एक ऐसी सेंध है जिसे अगर अभी नहीं समझा गया, तो आने वाले समय में इसके परिणाम बहुत भयावह हो सकते हैं। मैं आपको आज एग्जांपल के साथ पूरी क्रोनोलॉजी बताऊंगा, लेकिन उसके लिए आपको वीडियो के अंत तक बने रहना होगा।

शुरुआत करते हैं 31 मई 2026 की उस रिपोर्ट से, जिसने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। पाकिस्तान ने पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर यानी PoJK में लाइन ऑफ कंट्रोल के ठीक पास हाई-फ्रीक्वेंसी टेलीकॉम टॉवर्स लगाए हैं। इनका सिग्नल इतना पावरफुल है कि ये एलओसी की लक्ष्मण रेखा पार करके हमारे कठुआ, राजौरी और पुंछ जैसे बॉर्डर जिलों के अंदर तक आ रहे हैं।

सिर्फ यहीं तक नहीं, ये रॉग सिग्नल जम्मू की उस ‘कोट भलवाल जेल’ तक पहुंच रहे हैं, जहाँ देश के सबसे खतरनाक आतंकवादी बंद हैं। आप पूछेंगे कि पहाड़ तो सिग्नलों को रोक लेते हैं? बिल्कुल रोकते हैं, कश्मीर घाटी में ये प्राकृतिक ढाल काम कर रही है, लेकिन जम्मू के मैदानी इलाकों में कोई नेचुरल प्रोटेक्शन नहीं है। जमीन सपाट है और इसी का फायदा उठाकर पाकिस्तान ‘रॉग सेलुलर सिग्नल्स’ भेज रहा है। अब आप कहेंगे कि ये रॉग क्यों हैं? क्योंकि ये सिग्नल आधिकारिक तौर पर भारत के लिए नहीं बने हैं। इंटरनेशनल नियमों के मुताबिक, पाकिस्तान की सीमा के सिग्नल वहीं तक सीमित रहने चाहिए थे, लेकिन पड़ोसी देश अपनी हरकतों से बाज कब आया है?

पहलगाम अटैक और हाइब्रिड वॉर का कनेक्शन

अब जरा सोचिए, ISI ये सिग्नल क्यों भेज रही है? ताकि वे अपने हैंडलर्स को बिना किसी ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ के निर्देश दे सकें। हाल ही में NIA ने पहलगाम हमले को लेकर जो खुलासा किया, वो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा। दो आतंकियों के पास से दो चाइनीज स्मार्टफोन मिले। दोनों फोन 2021 और 2023 के थे, जो सालों तक बंद पड़े थे और फिर अचानक पहलगाम हमले के दौरान एक्टिवेट हुए।

सवाल ये है कि आखिर पाकिस्तान इन सिग्नल्स और OGWs का इस्तेमाल करके क्या हासिल करना चाहता है? क्या ये सिर्फ एक छिटपुट कोशिश है? नहीं! ये एक बहुत बड़े ‘डिजिटल और फिजिकल’ हाइब्रिड वॉर का हिस्सा है। और इसका सबसे खतरनाक उदाहरण निकलकर आया है हालिया दिल्ली-मुंबई मॉड्यूल में। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने अभी जो 8-9 आतंकी पकड़े, वो कोई साधारण मॉड्यूल नहीं था। इनके तार सीधे कराची के क्लिफ्टन से जुड़ते हैं, जहाँ से एक शख्स ऑपरेट कर रहा है…. मुन्ना झिंगड़ा, जो दाऊद इब्राहिम का दाहिना हाथ और छोटा शकील का वो मोहरा है जिसे पाकिस्तान ने अपनी पनाह में रखा है।

यहाँ पर ध्यान देने की जरूरत है; एक तरफ सीमा पार से ‘रॉग सेलुलर सिग्नल’ के जरिए इन्हें डायरेक्शन दिया जा रहा है, और दूसरी तरफ मुन्ना झिंगड़ा जैसा अंडरवर्ल्ड का खिलाड़ी भारत के अंदर अपनी ‘पॉलिटिकल स्लीपर सेल’ एक्टिवेट कर रहा है। ये ISI का वही ‘डबल गेम’ है, जहाँ एक हाथ में स्मार्टफोन और दूसरे हाथ में UAPA को कमजोर करने वाली राजनीतिक ढाल है।

पॉलिटिकल घुसपैठ और फंडिंग का जाल

ISI का ये नया मॉडल डराने वाला है। अब वे सिर्फ हथियार ही नहीं भेज रहे, बल्कि अपने ओवर ग्राउंड वर्कर्स (OGWs) को सीधे भारत की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों में भेज रहे हैं। उनका टारगेट सिंपल है – आतंकियों की भर्ती, उनकी फंडिंग और हथियारों की सप्लाई को ‘पॉलिटिकल कवर’ देना।

पिछले कुछ सालों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जहाँ जासूसी करने वाले लोग पकड़े गए। आपको हरिद्वार में पकड़ी गई वो महिला टीचर याद है? वो पाकिस्तान से आने वाली फंडिंग को इधर-उधर करने का काम कर रही थी। आप एक टीचर पर शक नहीं करेंगे, यही उनकी ताकत है। ये हैंडलर्स इसी तरह की मासूम दिखने वाली भीड़ में घुल जाते हैं। रियासी में तालिब हुसैन पकड़ा गया, जो लश्कर का कमांडर था और वो भी एक राष्ट्रीय पार्टी के भीतर अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गया था। ये सब ISI की उसी साजिश का हिस्सा है, ताकि जब कभी उन पर कार्रवाई हो, तो उसे ‘राजनीतिक बदले’ का नाम दिया जा सके।

UAPA और देश की सुरक्षा

अब जरा सोचिए कि जब सरकार ऐसे खतरों से निपटने के लिए UAPA जैसे कड़े कानून लाती है, तो विपक्ष में बैठा एक बड़ा धड़ा इसे ‘दमनकारी’ बताने लगता है। कभी ये डॉक्टर के भेष में लाल किले के पास हमला करते हैं, तो कभी टीचर बनकर फंडिंग में सहयोग करते हैं। लेकिन हमारे देश में कुछ ऐसी पॉलिटिकल पार्टीज हैं, जो अपनी छोटी-सी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए UAPA को कमजोर करने की वकालत करती हैं।

सवाल ये है कि ये लोग किसकी तरफ हैं? क्या ये लोग नहीं जानते कि अगर ISI की ये हाइब्रिड साजिश कामयाब हो गई, तो ये लोग भी सुरक्षित नहीं रहेंगे?

भारत इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ दुश्मन सीमा पर खड़ा होकर गोलियां नहीं चला रहा, बल्कि आपके पास से, आपके फोन के जरिए, और आपके बीच में बैठकर साजिशें रच रहा है। ये ‘डिजिटल’ और ‘फिजिकल’ हमले का ऐसा मेल है, जिससे निपटने के लिए कठोर कानूनों की सख्त जरूरत है।

क्या आप नहीं चाहते कि UAPA को और सख्त बनाया जाए ताकि ISI जो सेंध भारत की सुरक्षा में लगाना चाह रहा है, वो नाकाम हो? और जो लोग आतंकियों की पैरवी करते हुए पकड़े जा रहे हैं, उन पर सख्त से सख्त कार्रवाई हो?

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