पाकिस्तान के साथ कुछ ऐसा हो रहा है जैसे कोई राह चलते आदमी से कह दे कि ‘तुझे सड़क से उठाकर स्टार बना दूँगा’। पाकिस्तान के साथ कुछ ऐसा ही किया है डोनाल्ड ट्रम्प ने। Trump ने पाकिस्तान को सपना दिखाया है कि वहाँ तेल के विशाल कुएँ ढूँढ लिए गए हैं, और ऐसा लगता है जैसे पाकिस्तान ने अमेरिका पर आँख मूँदकर पूरा भरोसा भी कर लिया है।
पाकिस्तान तो अपने जन्म के समय से ही दूसरों के भरोसे जिया है। कभी वह अमेरिका की गोद में जा बैठता है, तो कभी चीन की झप्पी में। न पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था मज़बूत है, न कोई स्पष्ट नीति है, और विज़न? वह तो बिल्कुल ज़ीरो है। अब पाकिस्तान को एक नया सपना बेचा जा रहा है; तेल के खजाने का सपना।
यह सुनते ही दो बातें दिमाग़ में आती हैं। पहली यह कि ट्रम्प अभी भी अपनी पुरानी नौटंकी में व्यस्त हैं, और दूसरी यह कि पाकिस्तान को एक बार फिर बेवकूफ़ बनाया जा रहा है, क्योंकि कड़वा सच तो यह है कि पाकिस्तान के पास ऐसा कोई तेल रिज़र्व है ही नहीं। तो फिर ट्रम्प पाकिस्तान को यह ख़्वाब क्यों दिखा रहे हैं?
असल में डोनाल्ड ट्रम्प के लिए यह साफ़-साफ़ एक बिज़नेस है और पाकिस्तान से बेहतर ‘यूज़फुल इडियट’ उन्हें दुनिया में और कोई मिल नहीं सकता। उन्हें अच्छी तरह पता है कि पाकिस्तान इस समय बदहाली के सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है। वहाँ महँगाई से आम जनता के लाले पड़े हुए हैं, देश IMF की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है, सेना और सरकार के बीच वर्चस्व का टकराव चलता रहता है और वहाँ के लोग आटे-चावल के दाम चेक करके ही अपने दिन काट रहे हैं।
इसीलिए ट्रम्प ने पाकिस्तान की इस कमज़ोर नस को पकड़ लिया है। आपको लग सकता है कि पाकिस्तान के पास वाक़ई तेल है भी या नहीं? और अमेरिका जैसे महाशक्ति देश को आख़िर ऐसे लाचार देश की ज़रूरत ही क्या आन पड़ी है? तो सबसे पहले हम यह जान लेते हैं कि क्या पाकिस्तान के पास सच में तेल मौजूद है?
पाकिस्तान में इस वक़्त तेल के हालात बिल्कुल भी ठीक नहीं हैं। ‘पाकिस्तान पेट्रोलियम इन्फ़ॉर्मेशन सर्विसेज़’ के मुताबिक़, हाल के महीनों में देश के घरेलू तेल उत्पादन में 11 फ़ीसदी की बड़ी गिरावट आई है। सिंध और बलूचिस्तान जैसे इलाक़ों में मौजूद तेल और गैस के कुएँ या तो सूख चुके हैं या फिर उनमें उत्पादन बेहद कम हो गया है। अतीत में की गई खुदाई की कोशिशें भी ज़्यादा कामयाब नहीं रहीं; एक तरफ़ देश में निवेश की भारी कमी थी, तो दूसरी तरफ़ आधुनिक टेक्नोलॉजी की। हक़ीक़त यह है कि ज़्यादातर कुएँ या तो पूरी तरह ख़ाली हो चुके हैं या अब उनकी उम्र पूरी हो रही है। बस कुछेक गिनी-चुनी जगहों पर ही काम चल रहा है।
ऐसे माहौल में अब जब अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से यह इशारा आया है कि कोई अमेरिकी तेल कंपनी पाकिस्तान में काम शुरू कर सकती है, उसके बाद से ही पाकिस्तानियों ने ‘शेख’ बनने के हसीन सपने देखने शुरू कर दिए हैं। वैसे, तेल के सपने और पाकिस्तान का नाता पुराना है। जब ज़मीन में तेल के आसार भी नहीं थे, तब ये ऐसे खयाली पुलाव पका रहे थे कि बिना तेल के, पानी से ही कार चला लेंगे।
ये सपने पहले इसलिए बड़े स्तर पर नहीं देखे जाते थे क्योंकि बलूचिस्तान, जहाँ तेल के कुएँ होने के दावे किए जा रहे हैं, वहाँ पाकिस्तानी हुक़ूमत की एक नहीं चलती। वहाँ पाकिस्तान की सेना और सरकार की ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ बलोच विद्रोही लंबे समय से कड़ा विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
पाकिस्तानी सरकार की अपनी ही जनता पर कोई पकड़ नहीं है, और सबसे बड़ी बात यह है कि वहाँ पर कोई सुचारू तेल रिफ़ाइनिंग सिस्टम ही मौजूद नहीं है। यानी यह सब सिर्फ़ बातों का खेल है। तेल मिले न मिले, पाकिस्तान को चूना ज़रूर लग सकता है।
अब दूसरा बड़ा सवाल यह है कि पाकिस्तान को यह सपना अमेरिका आख़िर दिखा क्यों रहा है? अमेरिका को इस वक़्त दक्षिण एशिया में पाकिस्तान जैसा एक ऐसा मोहरा चाहिए, जहाँ से वह भारत और चीन, दोनों पर कड़ा पहरा रख सके। यही वजह है कि बांग्लादेश में भी तख्तापलट जैसी स्थितियाँ देखी गईं। अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलने के बाद अमेरिका के लिए पाकिस्तान जैसे मददगार की ज़रूरत और भी ज़्यादा बढ़ जाती है।
पाकिस्तान और अमेरिका के इस ‘मालिक और ग़ुलाम’ वाले रिश्ते को समझने के लिए हमें पाकिस्तान के जन्म के इतिहास में जाना होगा। यह वह दौर था जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूरी दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ नाम के दो ध्रुवों में बँट चुकी थी। साल 1947 के बाद एक तरफ़ भारत जहाँ ‘गुट निरपेक्षता’ की नीति पर चल रहा था, वहीं पाकिस्तान खुलकर अमेरिका की गोद में जा बैठा था। अमेरिका ने भी खुलकर पाकिस्तान को अपना संरक्षण इसलिए दिया क्योंकि उसे अफ़ग़ानिस्तान के नज़दीक एक प्यादे की सख़्त ज़रूरत थी, क्योंकि तब तक अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ और अमेरिका के बीच एक छद्म युद्ध यानी प्रॉक्सी वॉर शुरू हो चुका था।
साल 1979 में जब सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा किया, तब अमेरिका ने पाकिस्तान को अपना मुख्य मोहरा बनाकर अफ़ग़ानिस्तान में मुजाहिदीनों को खुला समर्थन देना शुरू किया। पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI और अमेरिकी एजेंसी CIA ने मिलकर ‘ऑपरेशन साइक्लोन’ चलाया, जिसमें अमेरिका पैसा और आधुनिक हथियार देता था और पाकिस्तान उन जिहादियों को ट्रेनिंग देने का काम करता था।
इसी तथाकथित जिहाद के दम पर मुजाहिदीनों के ज़रिए अमेरिका ने आखिरकार सोवियत संघ को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। शायद यह अमेरिका और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों का सबसे सुनहरा दौर था, जिसका ख़ुमार आज भी पाकिस्तान के हुक्मरानों के सर चढ़कर बोलता है।
लेकिन नियति का न्याय कुछ ऐसा हुआ कि इसी जिहाद की कोख से तालिबान और इस्लामी कट्टरपंथ को वैश्विक हवा मिली, जिसका नतीजा अमेरिका पर हुए 9/11 के आत्मघाती हमले के रूप में सामने आया। इस हमले के बाद पूरी दुनिया की राजनीति पलट गई, ख़ासकर इस्लामी मुल्कों और अमेरिका के बीच के समीकरण पूरी तरह बदल गए, जिसका सीधा असर अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों पर भी पड़ा। जल्द ही इस रिश्ते ने अपना सबसे निचला स्तर भी देखा, जब इन भीषण आतंकी हमलों का मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन सीधे पाकिस्तान के भीतर छिपा हुआ पकड़ा गया।
अमेरिका ने पाकिस्तान के घर में घुसकर ओसामा बिन लादेन को मार गिराया, और उसके बाद से पाकिस्तान की आम जनता के मन में अमेरिका के ख़िलाफ़ नफ़रत और ग़ुस्सा लगातार बढ़ता चला गया। सच यही है कि पाकिस्तान की आम जनता की नज़रों में ओसामा एक इस्लामी हीरो था, भले ही दुनिया और पाकिस्तान का आका अमेरिका उसे एक ख़ूंखार टेररिस्ट बोलता रहा हो। यहीं से वह दौर शुरू होता है जब पाकिस्तान के आलाकमान को तो तब भी अमेरिकी मदद की ज़रूरत महसूस होती थी, लेकिन पाकिस्तान के आम लोग अमेरिका को लात मारना चाहते थे।
इसके बाद से कई बार ऐसे मौक़े आए जब अमेरिका और पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की जनता में भारी आक्रोश देखने को मिला। लोग सड़कों पर उतरे, भीषण हिंसा हुई और ऐसी ही एक बड़ी हिंसा साल 2007 में इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के इलाक़े में पूरी दुनिया ने देखी।
यह इतिहास में पहली बार था जब पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथ और पाकिस्तान की अपनी सेना सीधे आमने-सामने आ गए थे। वहाँ की जनता ने कुछ पल के लिए यह साफ़ समझ लिया था कि पाकिस्तान की फ़ौज और वहाँ की हुक़ूमत सिर्फ़ अमेरिका की एक कठपुतली मात्र है। जिस जिहाद और जिन मदरसों का इस्तेमाल पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान और कश्मीर को लहूलुहान करने के लिए किया था, वही कट्टरपंथ अब उसके अपने घर में आत्मघाती बम बनकर फट रहा था।
अब यह पूरी तरह साफ़ हो चुका था कि पाकिस्तान की आम जनता और वहाँ के कट्टरपंथी मौलवी अमेरिका से बेइंतहा नफ़रत करने लगे थे, और इसी जनभावना का भरपूर फ़ायदा इमरान ख़ान ने उठाया। इसी एंटी-अमेरिका सेंटिमेंट ने इमरान ख़ान को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाया था।
इमरान ख़ान जब सत्ता में आए, तो उन्होंने वैश्विक मंचों पर अमेरिका की तीखी आलोचना शुरू कर दी। इमरान ख़ान ने नारा दिया कि ‘हम कोई ग़ुलाम नहीं हैं, हमें मुकम्मल आज़ादी चाहिए!’ अमेरिका के ख़िलाफ़ इस तरह खुलकर बगावत करने का नतीजा वे आज भी जेल की सलाखों के पीछे भुगत रहे हैं, और पाकिस्तान की सत्ता वापस ऐसे लोगों के हाथों में सौंप दी गई है जो अमेरिका के इशारों पर चलने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।
लेकिन इन मौजूदा शासकों को भी अच्छी तरह पता है कि पाकिस्तान की आम जनता के भीतर अभी भी अमेरिका के ख़िलाफ़ भारी ग़ुस्सा और नफ़रत भरी हुई है, और पिछले कई महीनों से वहाँ के हुक्मरान लगातार यह कोशिश कर रहे हैं कि जनता का यह ग़ुस्सा किसी तरह कम किया जा सके। इसी आक्रोश को ठंडा करने के लिए अब यह नया शिगूफ़ा छोड़ा जा रहा है कि अमेरिका पाकिस्तान को तेल के कुएँ खोजकर देने वाला है।
पाकिस्तान की जनता को बड़े-बड़े ख़्वाब दिखाए जा रहे हैं कि ‘पाकिस्तान अब अरब देशों जैसा अमीर बनने वाला है, हमारे पास भी अथाह तेल आएगा, हम भी रईस होंगे और हम ही दुनिया के नए ख़लीफ़ा हैं।’ असीम मुनीर और डोनाल्ड ट्रम्प को यह बखूबी मालूम है कि पाकिस्तान शुरुआत से ही ख़ुद को अरबी संस्कृति के नज़दीक देखना चाहता है। इस देश की बुनियाद ही ‘टू नेशन थ्योरी’ पर रखी गई है, जहाँ मोहम्मद अली जिन्ना जैसे लोग ख़ुद को भारतीय कम और अरबी ज़्यादा मानते थे।
तो फिर इस झूठे सपने से पाकिस्तान के नेताओं को आख़िर क्या फ़ायदा होने वाला है? पूरा प्लान यही है कि अमेरिका के ख़िलाफ़ फिर से लाल मस्जिद जैसी हिंसक भीड़ सड़कों पर न उतरे, लोग अपने घरों में बैठकर शेख बनने के हसीन ख़्वाब देखते रहें और देश के हुक्मरान जनता को लूटकर अमेरिका और यूरोप में आलीशान प्रॉपर्टीज़ बनाते रहें।
दूसरी तरफ़ भारत वैश्विक मंच पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, और अमेरिका कभी नहीं चाहता कि भारत एक विशाल अर्थव्यवस्था बनने के साथ-साथ सामरिक रूप से भी बहुत शक्तिशाली बन जाए। इसी भू-राजनीतिक चिढ़ के कारण अमेरिका को दक्षिण एशिया में एक सस्ता और वफ़ादार मोहरा चाहिए, और पाकिस्तान उस भूमिका के लिए हमेशा उपलब्ध रहता है।
इसीलिए अमेरिका आज पाकिस्तान को तेल के झूठे सपने बेच रहा है, लेकिन अंत में जब पाकिस्तान की बदहाल जनता इस सम्मोहन से जागेगी, तो उसके मुँह से बस यही एक लाइन निकलेगी; ‘ये बिक गई है गवर्नमेंट!’





