केरल में हिंदुओं और ईसाईयों की आबादी अब लगातार घटने लगी है जबकि मुस्लिम आबादी इस समय ठीक बनी हुई है।
ये बात केरल सरकार का अपना डेटा कह रहा है। Annual Vital Statistics Report 2023 कहती है कि हिंदू और ईसाइयों में जितने लोगों की मृत्यु हो रही है, उससे कम बच्चे पैदा हो रहे हैं।
स्क्रीन पर जो टेबल आप देख रहे हैं… इसे समझिए… 2023 में हिंदू बच्चे पैदा हुए 1 लाख 58 हजार 399 जबकि हिंदुओं की मौत हुई 1 लाख 80 हजार 971… फर्क कितने नंबर का पड़ा 22 हजार 572 का।
यही ईसाइयों के मामले में भी है। 56,810 बच्चे पैदा हुए और 62,388 लोगों की मृत्यु हो गई… अंतर पड़ा, 5,528 का जबकि मुस्लिम समुदाय के मामले इधर एक दम अलग तस्वीर देखने को मिलती है। 59,541 लोगों की मौत हुई लेकिन इसके मुकाबले ज्यादा बच्चे पैदा हुए हैं, 1 लाख 76 हजार 312…
इसे कहते हैं पॉजिटिव और नेगेटिव नैचुरल ग्रोथ रेट… जो हिंदू और ईसाई के मामले में नेगेटिव चला गया है और मुस्लिम समुदाय का NGR पॉजिटिव बना हुआ है।
अब सवाल है कि आखिर Natural Growth Rate होता क्या है?
इसे बहुत आसान भाषा में समझिए। Natural Growth Rate का मतलब है: जन्म माइनस मृत्यु। अगर किसी समुदाय में 100 बच्चे पैदा हुए और 120 लोगों की मृत्यु हो गई, तो उस समुदाय की Natural Growth Rate नेगेटिव होगी। अगर 100 बच्चे पैदा हुए और 70 लोगों की मृत्यु हुई, तो Growth Rate पॉजिटिव होगी।
अब हिंदू-ईसाई का NGR नेगेटिव और मुस्लिम का पॉजिटिव ये कोई एक साल में नहीं हुआ है। हाल के डेटा को अगर हम 2014 के डेटा से कम्पेयर करके देखें तो आपको एक क्लैरिटी नजर आएगी कि कैसे ये जनसंख्या का गणित साल-दर-साल बदला है।
साल 2014 में हिंदू बच्चे पैदा हुए थे 2 लाख 31 हजार 31, जबकि उस साल 1,50,159 मौंते हुईं। तो ये NGR पॉजिटिव था यानी जितने पैदा हुए उससे कम की ही मृत्यु हुई जबकि हाल के डेटा में एक दम उल्टा है। अब अगर इसे कंपेयर करें तो यहां बच्चों के जन्म में 31 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है।
अब ईसाईयों के संबंध में देखें तो 2014 में बच्चे पैदा हुए, 83,616 जबकि मृत्यु हुई 50,095। यानी जन्म से कम मृत्यु तो NGR पॉजिटिव ही रहा।
अब यहां एक इंटरेस्टिंग फैक्ट है। 2014 में मुस्लिम बच्चे जन्में थे 2,18,437 और मृत्यु हुई थी 46,468 लोगों की… अब यहां केवल मुस्लिमों के हिसाब से देखोगे तो आपको इनकी जन्मों की संख्या में भी एक गिरावट देखने को मिलेगी और मृत्यु के मामले में बढोतरी लेकिन अगर आप इसे पूरे राज्य की ओवरऑल पॉपुलेशन यानी हिंदू, ईसाई और मुस्लिम को जोड़कर देखोगे तो मुस्लिम समुदाय के बच्चों के जन्म की संख्या फिर भी बढ़ रही है, इनका नैचुरल ग्रोथ रेट तब भी नेगेटिव नहीं है।
अब मैं आपको एक और बड़ा सैंपल दिखाता हूं जो इस बात की तस्दीक करेगा कि केरल में मुस्लिम समुदाय के बच्चों के जन्म की संख्या लगातार बढ़ी ही है जबकि इसके उलट हिंदू और ईसाईयों की घटी है।
स्क्रीन पर आप ये 2008 से लेकर 2021 तक का डेटा देखिए। 2008 में हिंदू बच्चों की जन्म की संख्या का प्रतिशत है 45.04… अब आप इस वीडियो को पॉज करके 2021 तक के इस डेटा को लाइन बाइ लाइन देखिए… आपको ये देखने को मिलेगा कि 2008 से लेकर 2021 तक हिंदू बच्चों के जन्म का प्रतिशत लगातार घटता आया है। यही हालात क्रिश्चियन के साथ भी देखने को मिल रहा है जबकि मुस्लिम समुदाय में ऐसा नहीं दिख रहा है।
2008 में मुस्लिम समुदाय के बच्चों के जन्म का प्रतिशत था, 36.32 और 2012 को अगर आप छोड़ दे तो ये लगातार बढ़ ही रहा है। 36 से ये 40 हो गया है जबकि हिंदू 45 से नीचे की तरफ आ रहा है और ईसाई भी 17 प्रतिशत से 14 पर आ गया है।
इस डेटा के आधार पर इसका सीधा मतलब ये है कि भले ही आपको पॉपुलेशन में इस समय हिंदू ज्यादा दिखें लेकिन आने वाले कुछ सालों में ये पैटर्न बदलने वाला है क्योंकि हिंदू और ईसाईयों के बच्चे कम पैदा हो रहे हैं, मृत्यु ज्यादा हो रही है जबकि मुस्लिमों के बच्चे ठीक पैदा हो रहे हैं।
इसे आप टोटल फर्टिलिटी रेट के डेटा से भी समझ सकते हैं। ये होता क्या है पहले ये समझिए। TFR यानी एक महिला अपने जीवन में औसतन कितने बच्चों को जन्म दे रही है। जनसंख्या विशेषज्ञ 2.1 के आंकड़े को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं। अगर TFR 2.1 से ऊपर है, तो आबादी बढ़ने की संभावना रहती है। अगर 2.1 से नीचे है, तो लंबे समय में आबादी की वृद्धि धीमी पड़ने लगती है।
अब अलग-अलग सालों का केरल का ये डेटा देखिए। केरल में हिंदुओं का TFR 2.1 से नीचे ही रहा है जबकि ईसाइयों के मामले में भी ये सेम है अगर आप 2005-06 को छोड़ दें तो लेकिन मुस्लिम के मामले में 2015-16 को छोड़कर TFR 2.1 से ऊपर ही रहा है।
वैसे तो ओवरऑल केरल में TFR 2.1 से नीचे ही आ रखा है, जनसंख्या ओवरऑल ही घट रही है। यानी केरल में पिछले लगभग 30 सालों से औसतन कम बच्चे पैदा हो रहे हैं लेकिन हिंदू और ईसाई समुदायों में जन्म दर इतनी कम हो चुकी है कि उनकी आबादी की वृद्धि अब घटने लगी है। प्रदेश की जनसंख्या के लेवल पर अगर इसे देखें तो इस घटते TFR के बावजूद मुस्लिम समुदाय का आबादी में हिस्सा लगातार बढ़ा है।
अब सवाल आता है कि ऐसा हो क्यों रहा है?
दरअसल, इसका कोई एक कारण नहीं है। हिंदू और ईसाई कम बच्चे पैदा कर रहे हैं, परिवार अब छोटे हो गए हैं… आज कल तो DINK वाली शब्दावली भी मार्केट में आ गई है यानी डबल इनकम, नो किड्स… इसके अलावा सबसे बड़ी बात ये है कि केरल में बुजुर्ग आबादी पूरे देश के मुकाबले सबसे ज्यादा है। केरल में 60 साल से अधिक उम्र के 16 प्रतिशत से ज्यादा लोग इस समय मौजूद हैं और 2036 तक तो ये 26 प्रतिशत पहुंच जाएंगे।
इसमें भी अगर आप देखेंगे तो हिंदू बुजुर्ग ज्यादा मिलेंगे क्योंकि अब तक हिंदुओं की आबादी ज्यादा रही है। अब समस्या ये है कि बुजुर्गों की मृत्यु में वृद्धि तो होगी लेकिन हिंदू बच्चों की बढ़ोतरी में वो वृद्धि नहीं देखने को मिलेगी। सेम गोज विद क्रिश्चियंस जबकि मुस्लिमों के साथ ये समस्या नहीं होगी… अगर यही हालात रहते हैं तो आने वालों कुछ सालों बाद केरल में सबसे यंग पॉपुलेशन भी मुस्लिमों की ही होगी।
अब खतरे की घंटी वाला सवाल ये है कि अगर ऐसा ही होता है तो आगे क्या होगा?
अगर अगले 20-25 साल तक यही ट्रेंड चलता रहा, तो जिस समुदाय में जन्म लगातार कम और मौतें ज्यादा रहेंगी, उसकी टोटल पॉपुलेशन भी धीरे-धीरे घटेगी और जिस समुदाय में जन्म मौतों से ज्यादा होंगे, उसका प्रतिशत बढ़ेगा। ये सिंपल मैथ है। यानी हिंदू और ईसाई घटेंगे और मुस्लिम बढ़ेंगे।
अब सवाल है कि क्या ये बदलाव सिर्फ जनसंख्या तक सीमित रहेगा? जवाब है, नहीं। जनसंख्या का गणित केवल लोगों की संख्या नहीं बदलता, बल्कि समाज, राजनीति और सत्ता का संतुलन भी बदल देता है।
दरअसल, जिस रिपोर्ट का हमने जिक्र किया है, वो सिर्फ इतना नहीं कहती कि हिंदुओं और ईसाइयों की जन्म दर घट रही है और मुस्लिमों की Natural Growth Rate पॉजिटिव बनी हुई है। रिपोर्ट इससे आगे जाकर एक बड़ा सवाल उठाती है।
अगर अगले 20-25 वर्षों तक यही रुझान जारी रहा, तो क्या केरल की सामाजिक और राजनीतिक संरचना भी बदल जाएगी? सोचिए, आज जो बच्चे पैदा हो रहे हैं, वही 20-25 साल बाद वोटर बनेंगे, कॉलेजों में जाएंगे, नौकरी करेंगे, सरकारी योजनाओं का लाभ लेंगे और राजनीति की दिशा तय करेंगे।
यही कारण है कि जनसंख्या में बदलाव का असर सीधे समाज और चुनावी राजनीति पर पड़ता है।
अगर किसी समुदाय का आबादी में हिस्सा बढ़ता है, तो उसका वोटर बेस भी बढ़ता है। राजनीतिक दल भी उसी हिसाब से अपनी रणनीतियां बनाते हैं।
इस लिहाज से अगर वर्तमान रुझान जारी रहे, तो केरल की चुनावी राजनीति, गठबंधन की राजनीति और विभिन्न समुदायों के राजनीतिक प्रभाव में भी बदलाव देखने को मिल सकता है।
लेकिन इसका असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा।
जनसंख्या का अनुपात बदलने का मतलब है कि आने वाली पीढ़ियों का अनुपात भी बदलेगा। इसका प्रभाव शिक्षा, रोजगार, सामाजिक प्रतिनिधित्व, धार्मिक संस्थाओं, सांस्कृतिक गतिविधियों और सरकारी नीतियों तक दिखाई दे सकता है।
रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण बात की ओर भी इशारा करती है। आज हिंदू और ईसाई समुदायों में वृद्ध आबादी का अनुपात लगातार बढ़ रहा है, जबकि मुस्लिम समुदाय अपेक्षाकृत युवा बना हुआ है। अगर यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में केरल की सबसे युवा आबादी मुस्लिम समुदाय की हो सकती है।
और इतिहास बताता है कि जिस समुदाय की युवा आबादी अधिक होती है, उसका सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव भी समय के साथ बढ़ता है। इसका सबसे बड़ा एग्जाम्पल हमारे सामने कश्मीर है। कश्मीर में जैसे-जैसे मुस्लिम आबादी बढ़ी, वैसे-वैसे कश्मीरी हिंदू कम होते गए। 1990 में कश्मीरी पंडितों को कैसे भगाया गया और आज कश्मीर में कितने हिंदू रहते हैं, वो किसी से छुपा हुआ नहीं है।
किसी से यह नहीं छुपा हुआ है कि असम का बारपेटा जो एक समय में हिंदू बहुल था, वहां जब डेमोग्राफी बदल गई तो कैसे हिंदू आज अल्पसंख्यक बन गया है।
यही वजह है कि यह बहस केवल जन्म और मृत्यु के आंकड़ों की नहीं है। ये केरल के भविष्य की बहस है। ये बहस इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हमें वर्तमान में ही केरल फाइल्स के भयानक केसेज देखने को मिलते हैं।
तो आने वाले दशकों में केरल की धार्मिक जनसांख्यिकी बदलेगी और जब जनसांख्यिकी बदलती है, तो उसके साथ समाज, राजनीति और सत्ता का संतुलन भी बदल जाता है।
वैसे भी केरल में अगर आज की राजनीति की गणित देखेंगे तो इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के बिना कांग्रेस जैसी पार्टी के लिए वहां सरकार बनाना बहुत मुश्किल काम है।
हिंदुओं के साथ क्या हो सकता है उसे आप ऐसे देखिए कि केरल की वर्तमान सरकार के मंत्रिमंडल में हिंदू पॉपुलेशन के हिसाब से 11 सीट मिलनी चाहिए थी लेकिन मिली सिर्फ आठ… जबकि मुस्लिम पॉपुलेशन के हिसाब से इस गठबंधन वाली सरकार में मुस्लिमों मंत्रियों की संख्या उनकी पॉपुलेशन के हिसाब से बिलकुल बराबर है और यहां तक की ईसाइयों की भी बराबर है तो फिर हिंदुओं की क्यों नहीं है?
इस वीडियो में हमनें जो आपको बीते कुछ सालों के डेटा बताए और उस डेटा के बेस पर हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में जो चीजें घटी हैं, वो चिंता का कारण हैं। चिंता केवल नंबर्स तक सीमित नहीं रह सकती है बल्कि जब ये नंबर्स बदलते हैं तब इसका असर जमीन पर कैसे दिखने लगता है, समझने की असल बात ये है।


