Bhagwant mann

खिज्र हयात तिवाना और भगवंत मान: क्यों संवैधानिक पदों के ऊपर नहीं होना चाहिए धार्मिक अंकुश?

Summary
उन्हें इस बात के लिए भी इस्तीफ़ा देना चाहिए कि वो अपना मेनिफेस्टो पूरा नहीं कर सके, मैं या फिर पंजाब की जनता ऐसे कम से कम 100  कारण गिना सकती है, जिनके आधार पर आज भगवंत मान को पद छोड़ देना चाहिए

अगर आप सोशल मीडिया या टीवी या इवन डिजिटल मीडिया भी फॉलो करते हैं, तो आपको पता चल गया होगा कि भगवंत मान को अकाल तख़्त ने गुरु दोखी और खालसा पंथ का विरोधी करार दे दिया है, अब उनके इस्तीफे मांगे जा रहे हैं। उनके बॉयकॉट की बात हो रही है,  उन पर पोलिटिकल और रिलीजियस प्रेशर बन रहा है। आपको ये भी बात पता होगी कि भगवंत मान ने ये आरोप मानने से मना कर दिया है और इस्तीफ़ा तो वो शायद ही दें। 

भगवंत मान को इस्तीफ़ा देना चाहिए या नहीं देना चाहिए, अकाल तख़्त के आदेश के बाद उन्हें पद पर बने रहना चाहिए या नहीं इसके बारे में मैं बात करूँ, उससे पहले मैं आपको 1940 के दशक के पंजाब में ले चलता हूँ। क्योंकि यहीं से हमें हमारा आंसर मिलेगा। 1940 के दशक का पंजाब आज के पंजाब से कहीं अलग दिखता था। तब लाहौर भी पंजाब का हिस्सा था और रावलपिंडी भी, और इस दौरान पंजाब के मुख्यमंत्री या प्रीमियर हुआ करते थे मलिक खिज्र हयात टिवाना। टिवाना पंजाब में तब ताकतवर यूनियनिस्ट पार्टी के मुखिया हुआ करते थे और साल 1942 में पंजाब के मुख्यमंत्री बने थे। 

साल 1946 में टिवाना पंजाब के दोबारा मुख्यमंत्री बने और उनकी सरकार को तब पंजाब के दो और बड़े दल यानी अकाली और कांग्रेस, दोनों ने सपोर्ट किया। जब हयात मुख्यमंत्री बने तो देश काफ़ी टर्बुलेंट दौर से गुजर रहा था। मुस्लिम लीग एक अलग पाकिस्तान के लिए लगातार वकालत कर रही थी, कांग्रेस देश का विभाजन नहीं चाहती थी और अंग्रेज़ अपनी सत्ता बचाने में जुटे हुए थे। 

लेकिन साल 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध ख़त्म हुआ था और अंग्रेज़ों को भारत पर पकड़ बनाए रखना मुस्किल हो गया। फ़रवरी 1947 में इस बात का ऐलान ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने किया कि भारत को अब स्वतंत्रता दे दी जाएगी। जून 1947 में अंग्रेज़ों ने भारत को विभाजित करने की मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई वाली मुस्लिम लीग की बात भी मान ली और दो देशों यानी भारत और पाकिस्तान बनाने का भी ऐलान कर दिया। 

इस पाकिस्तान को बनाने के लिए सर सिरिल रेडक्लिफ को भारत भेजा गया और उन्होंने दोनों मुल्कों की बाउंड्री तय करना शुरू कर दिया। अब बाउंड्री क्या हो, इसके लिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के अपने-अपने दावे थे। किस इलाके में कौन से धर्म के लोग रहते हैं, कौन सी भाषा बोली जाती है, वहाँ का नेतृत्व क्या चाहता है, ये इस अलगाव के लिए बड़े फैक्टर बनने जा रहे थे। 

और मुस्लिम लीग के लिए सबसे बड़ा चैलेंज था पंजाब। मुस्लिम लीग का कहना था कि यहाँ सबसे बड़ी आबादी मुसलमानों की है इसलिए पंजाब को पूरी तरह से पाक्सितान में शामिल होना चाहिए। लेकिन उनकी इस माँग के आगे देश के हिंदू नेता तो खड़े ही थे लेकिन बड़ा विरोध उन्हें एक आदमी का झेलना पड़ रहा था। 

जिन्ना की मुस्लिम लीग के सामने मलिक खिज्र हयात टिवाना नाम की दीवार थी। खिज्र हयात टिवाना पंजाब के मुख्यमंत्री होने के साथ ही यहाँ के मुसलमानों के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे। पंजाब के सीएम होने के कारण उनके रूख का प्रभाव वाजिब था। लेकिन टिवाना ने अपने सिद्धांतों को सामने रखते हुए पंजाब के विभाजन का पूरी तरह से विरोध किया। 

इन फैक्ट टिवाना का ये विरोध कोई नया नहीं था। साल 1935 से ही टीवाना की यूनियनिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग के बीच खींचतान चलती आ रही थी। इसके चलते यूनियनिस्ट पार्टी के मुखिया सर सिकंदर हयात खान और जिन्ना के बीच साल 1937 में एक समझौता भी हुआ था। इसमें पाकिस्तान का जिक्र तो नहीं था लेकिन जिन्ना का कहना था कि यूनियनिसंट पार्टी के विधायकों को मुस्लिम लीग में शामिल होना चाहिए।

जिन्ना के सामने दीवार बनकर खड़े थे टिवाना

साल 1940 में मुस्लिम लीग ने लाहौर रेजोल्यूशन पास किया जिसे पाकिस्तान रेजोल्यूशन भी कहा जाता है, इसके बाद जिन्ना और मुस्लिम लीग ने यूनियनिस्ट पार्टी पर दबाव बनाना शुरू किया कि वो भी पाकिस्तान बनाने का समर्थन करें। यूनियनिस्ट पार्टी के अधिकांश बड़े नेता मुस्लिम थे, इसलिए उन पर मज़हबी नजरिए से ये दबाव डाला जाने लगा कि वो लगातार पाकिस्तान के निर्माण की माँग उठाएँ। 

लेकिन यूनियनिस्ट पार्टी इसके लिए तैयार नहीं थी। साल 1944 आते आते मुस्लिम लीग अपना प्रभाव बना चुकी थी और खिज्र हयात टिवाना पर जिन्ना ने एक मीटिंग में भी दबाव बनाया कि वो पाकिस्तान को लेकर अपना रूख स्पष्ट करें और उसे समर्थन दें। खिज्र हयात टिवाना का मन कमजोर भी हुआ लेकिन तब पंजाब के गवर्नर ने उन्हें अपने रूख पर अड़े रहने को कहा और ऐसे में उन्होंने जिन्ना की मांगे मानने से इनकार कर दिया।

इससे जिन्ना एंड कंपनी खीझ गई और उसने टिवाना के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार शुरू कर दिया। कहा गया कि टिवाना क़ौम के गद्दार हैं, काफ़िर हैं और मुसलमानों के दुश्मन हैं। यहाँ तक कि जिन्ना ने ख़ुद उन्हें काफ़िर घोषित कर दिया। ये कहानी तब और ज्यादा खराब हुई जब भारत के विभाजन का ऐलान हुआ। 

मैंने आपको पहले बताया कि जब भारत विभाजन का ऐलान हुआ तब टिवाना ही सीएम थे। जिन्ना ने इस दौरान भी लगातार उन पर प्रेशर डाला कि वो मुस्लिम लीग का समर्थन कर दें और पंजाब के पाकिस्तान में मिलाए जाने को लेकर अपनी सहमति दें। हालांकि टिवाना ने ये स्वीकार नहीं किया और कहा कि पंजाब का विभाजन नहीं होना चाहिए। टिवाना ने ये स्टांस लिया कि पंजाब में रहने वाले सभी धर्मों के लोगों के बीच एक सांस्कृतिक मेल-जोल है। 

टिवाना का ये रूख उनके लिए बेहद घातक सिद्ध हुआ। वो काफ़िर तो घोषित हो ही चुके थे और अब उनका सड़कों पर भी विरोध शुरू हो गया।  इतना ही नहीं बल्कि मुसलमानाओं ने उनके प्रतीकात्मक जनाने निकालने शुरू कर दिए, मौलानाओं ने उनके ख़िलाफ़ तक़रीरें देना शुरू कर दिया। हर बार वो जहाँ जाते, वहाँ काफ़िर के नारे लगाए जाते, उनकी गाड़ी घेरी जाती और क़ौम का गद्दार बुलाया जाता। 

लगातार टिवाना को ये प्रेशर झेलना पड़ा। और साल 1947 तक आते आते टिवाना को कंटिन्यू करना मुश्किल हो गया। 02 मार्च 1947 को टिवाना ने अंत में रिजाइन कर दिया। अंग्रेजी अख़बार द ट्रिब्यून में पूर्व IAS आरके कौशिक ने टिवाना के रिजाइन की कहानी भी बयाँ की है। 

कौशिक बताते हैं कि उस दिन पंजाब के शिक्षा मंत्री इब्राहिम खान बर्क के निवास पर टिवाना की मुलाकात मंत्री के आठ वर्षीय बेटे से हुई, बच्चा लाहौर के सेंट एंथनी कॉन्वेंट स्कूल का छात्र था। बच्चे ने उनसे मिलते ही कहा, “क्या आप वही खिज़र टिवाना अंकल हैं जो मुस्लिम मुल्क पाकिस्तान के रास्ते का रोड़ा हैं? मैं तो आपसे हाथ नहीं मिलाऊँगा।”

ये सुनकर शिक्षा मंत्री असहज हो गए, जबकि खिज़र हयात टिवाना की धड़कनें तेज हो गईं। बाद में उन्होंने तब के विकास मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह से कहा, “मैं मुस्लिम लीग से लड़ाई जारी रख सकता था, लेकिन यदि हमारे बच्चे ही हमें खलनायक समझने लगे हैं, तो बेहतर है कि हम रास्ते से हट जाएँ और जो होना है, होने दें।”

इसके बाद उन्होंने पंजाब के प्रीमियर (मुख्यमंत्री) पद से इस्तीफा दे दिया। अगले ही दिन मोहम्मद अली जिन्ना ने घोषणा की कि “पाकिस्तान अब बन चुका है और इसके रास्ते में कोई समस्या नहीं रही।” यानी कुल मिलाकर कहानी ये रही कि टिवाना को मज़हबी दबाव में रिजाइन देना पड़ा और इसका परिणाम ये हुआ कि पंजाब विभाजित हो गया और सिर्फ़ विभाजित नहीं हुआ बल्कि कहते हैं कि टिवाना के पद छोड़ने के एक दिन बाद से ही पूरे पंजाब में दंगे होने लगे।  

मजहबी दबाव में इस्तीफा, फिर बंट गया पंजाब

अब हम आते हैं वापस भगवंत मान की कहानी पर, अकाल तख़्त का कहना है कि भगवंत मान की उन्हें दो वीडियो मिली हैं जो बेहद आपत्तिजनक हैं और वो ऐसे में खालसा पंथ के विरोधी साबित होते हैं। चाहे अकाली दल हो या फिर कांग्रेस, दोनों ने ही पंजाब में इसी के सहारे स्पष्ट तौर पर भगवंत मान को इस्तीफ़ा देने को कहा है, लेकिन ये कहानी कुछ कुछ वैसी ही है, जैसा मैंने आपको खिजर हयात तिवाना के बारे में बताया। 

भगवंत मान को इसलिए देना चाहिए इस्तीफा

भगवंत मान को इस्तीफ़ा देना चाहिए, लेकिन इसलिए उन्हें इस्तीफ़ा देना चाहिए क्योंकि उनके राज में पंजाब पर कर्ज का बोझ साल दर साल बढ़ता चला गया है, इसलिए भी उन्हें इस्तीफ़ा देना चाहिए क्योंकि वो पंजाब में क्राइम कंट्रोल में फेल रहे हैं, उनके राज में अपराधी जेल से वीडियो कॉल कर रहे हैं, भगवंत मान को इसलिए भी इस्तीफ़ा दे देना चाहिए  कि उनके शासनकाल में पंजाब ड्रग्स की समस्या से निजात नहीं पा सका है। 

उन्हें इस बात के लिए भी इस्तीफ़ा देना चाहिए कि वो अपना मेनिफेस्टो पूरा नहीं कर सके, मैं या फिर पंजाब की जनता ऐसे कम से कम 100  कारण गिना सकती है, जिनके आधार पर आज भगवंत मान को पद छोड़ देना चाहिए। अगर आप लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं तो जनता से जुड़ा हर मुद्दा ऐसा होना चाहिए, जिसके सोल्यूशन ना देने पर जनता के चुनें लीडर को पद छोड़ देना चाहिए। 

लेकिन भगवंत को मान को इस बात के लिए बिल्कुल इस्तीफ़ा नहीं देना चाहिए कि उन्हें कहीं और से ये आदेश आया है। लोकतंत्र में आदेश देने वाली जनता होती है, अगर भगवंत मान ने धर्म विरोध में कुछ काम किया है तो उन्हें धार्मिक अधिकारों से वंचित करने का अकाल तख़्त को पूरा अधिकार है। भगवंत मान का सामाजिक बॉयकॉट हो सकता है। लेकिन उन्हें धार्मिक दबाव में इस्तीफ़ा देना पड़े, ये सरासर ग़लत है। 

स्टालिन और ममता बनर्जी, दोनों हिंदू नेताओं को कुछ ही दिनों पहले उनके प्रदेश की जनता ने सत्ता से बेदख़ल कर दिया है। अगर पंजाब की जनता को लगता है कि भगवंत मान धर्मविरोधी हैं तो जनता उनके ख़िलाफ़ आए, चुनाव में तो अब एक साल भी नहीं बचा है। तो ये नहीं होना चाहिए कि भगवंत मान यानी पंजाब राज्य के चुनें हुए मुख्यमंत्री के ऊपर भी कोई अथॉरिटी है जो उसे आदेश दे सकती है। 

लोकतंत्र में अथॉरिटी या फिर सत्ता का अंतिम केंद्र वो होते हैं जिन्हें जनता चुनती है और उनके ऊपर भी कोई संस्था स्थापित हो जाए जो अपने हिसाब से फैसले ले तो वो वैसे ही होता है, जो खिज्र हयात टिवाना के साथ हुआ। और ऐसे इस्तीफों का परिणाम होता है कि पंजाब जैसे राज्य टूटते हैं, यहाँ दंगे होते हैं और व्यवस्था चरमरा जाती है। 

Editorial team:
Production team:

More videos with Jayesh Matiyal as Anchor/Reporter