साल 1999 में गोविंदा और संजय दत्त की एक फिल्म आई थी, नाम है हसीना मान जाएगी। इस फिल्म में गोविंदा चाचा और भतीजा दोनों का रोल निभा रहे हैं। आज भी इस फिल्म का वो डॉयलॉग उतना ही मशहूर है जितना उस वक्त था। डॉयलॉग है, जो चाचा है वही भतीजा है और जो भतीजा है वही चाचा है।
ये भले ही एक कॉमेडी फिल्म थी लेकिन हम इस फिल्म के चाचा-भतीजा का जिक्र कॉमेडी के लिए नहीं कर रहे हैं बल्कि एक गंभीर और ऐतिहासिक निर्णय के लिए कर रहे हैं।
अगर आप पश्चिम बंगाल की राजनीति में जरा भी रूचि रखते हैं तो अब तक आपको ये मालूम पड़ गया हो कि भाजपा सरकार ने कोलकाता की एक सबसे व्यस्त और ऐतिहासिक सड़क का नाम बदल दिया है।
20 जून 2026 यानी पश्चिम बंगाल दिवस के मौके पर, कोलकाता नगर निगम ने एक नोटिफिकेशन जारी किया। पार्क सर्कस के पास की मशहूर और बेहद व्यस्त सड़क, जिसे अब तक सुहरावर्दी एवेन्यू कहा जाता था, उसका नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड कर दिया गया। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने खुद सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा की और इसे ऐतिहासिक भूल को सुधारने वाला कदम बताया।
अब जैसे ही ये खबर आई, बंगाल की राजनीति में मानो आग लग गई और उसकी तपिश दिल्ली तक महसूस होने लगी। एक तरफ हिंदुओं के स्वाभिमान के लौटने की बात होने लगी तो दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस और उसका इकोसिस्टम ये कहने लगा कि ये सड़क चाचा के नाम पर थी, भतीजे के नाम पर नहीं। यानी बुचर ऑफ बंगाल कहे जाने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर नहीं थी बल्कि उसके चाचा डॉ. हसन सुहरावर्दी के नाम पर थी, जो कलकत्ता यूनिवर्सिटी के पहले मुस्लिम वाइस-चांसलर थे।
अब सवाल यहां ये नहीं है कि सड़क किसके नाम पर थी बल्कि सवाल ये है कि चाचा ने जो किया वही तो भतीजे ने भी किया तो फिर दोनों में कोई खास फर्क है नहीं इसलिए हमनें शुरू में फिल्म का जिक्र किया कि जो चाचा है वही भतीजा है।
सबसे पहले हम आपको चाचा के कारनामे बताते हैं। लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम ये कहती है कि हसन सुहरावर्दी एक बड़ा सर्जन था, एक शिक्षाविद था। ये बात बिल्कुल सही है इसमें कोई संदेह नहीं है लेकिन कॉन्ग्रेस ये क्यों नहीं बताती है कि यही हसन सुहरावर्दी अंग्रेजों का गुलाम था और इसी ने एक फ्रीडम फाइटर बिटिया को अंग्रेजों के हवाले कर दिया, उसे सालों तक जेल की कोठरी में बंद करवा दिया।
आइए, आपको आजादी के पहले की एक घटना बताते हैं। 6 फरवरी 1932 का दिन था। कलकत्ता यूनिवर्सिटी का दीक्षांत समारोह चल रहा था। मंच पर ब्रिटिश गवर्नर स्टेनली जैक्सन भाषण दे रहा था। उसी बीच, 21 साल की एक निडर लड़की बीना दास अपनी डिग्री लेने के बहाने मंच के पास पहुंची। उसने अपनी पोशाक में एक रिवॉल्वर छुपाई थी। भारत मां की उस बेटी का एक ही उद्देश्य था अंग्रेजों के चंगुल से देश को आजादी दिलवाना।
बीना दास जब मंच पर चढ़ी तो उसने स्टेनली जैक्सन गवर्नर की तरफ एक के बाद एक पांच गोलियां चला दीं। दुर्भाग्यवश गवर्नर जैक्सन किसी तरह झुककर बच गया लेकिन उस वक्त वहां मौजूद कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर डॉ. हसन सुहरावर्दी ने बीना दास को पीछे से पकड़ लिया और ब्रिटिश पुलिस के हवाले कर दिया।
सोचिए, एक तरफ एक देश की बेटी अपनी जान की बाजी लगा रही थी आजादी के लिए, और दूसरी तरफ एक शख्स अंग्रेजों की जान बचाने के लिए उसे पकड़वा रहा था। हसन सुहरावर्दी को इस वफादारी का इनाम भी मिला ब्रिटिश सरकार ने हसन सुहरावर्दी को सर की उपाधि दी, और 1933 में उसके घर के सामने की सड़क का नाम सुहरावर्दी एवेन्यू भी रख दिया गया।
दूसरी तरफ, बीना दास को क्या मिला? क्रांतिकारी बीना दास को मिला 9 साल का कठोर कारावास। बीना दास के साथी जिन्होंने रिवॉल्वर का इंतजाम किया था उन क्रांतिकारियों को भी कई यातनाएं सहनी पड़ीं।
कॉन्ग्रेस आज जिस हसन सुहरावर्दी के नाम का बचाव कर रही है और सीएम शुभेंदु अधिकारी का मजाक उड़ा रही है कि चाचा-भतीजा में कन्फ्यूज हो गए, नाम की गलती के कारण किसी और सड़क का नाम बदल दिया।
सच ये है कि वह हसन सुहरावर्दी एकेडमिशियन बाद में था, पहले वह अंग्रेजों का वो पिट्ठू था जिसने भारतीय क्रांतिकारियों के खून और आंसुओं की कीमत पर ब्रिटिश सरकार से जागीरें और सम्मान पाया था… और केवल इतना ही नहीं, हसन सुहरावर्दी मुस्लिम लीग और Two-Nation Theory का कट्टर समर्थक था। बंटवारे के बाद तो उसकी बेटी पाकिस्तान जाकर वहां की राजनीति में भी सक्रिय हो गई। ये है इस सुहरावर्दी परिवार का कच्चा चिट्ठा।
सुहरावर्दी परिवार के लिए कांग्रेस का प्रेम कोई आज से नहीं है बल्कि नेहरू के जमाने से है। कैसे है वो हम आपको विस्तार से बताएंगे लेकिन उससे पहले एक छोटा सा परिचय हसन के भतीजे हुसैन का भी दे देते हैं।
हुसैन सुहरावर्दी जिसे बंगाल का कसाई कहा जाता है। 1946 में बंगाल का मुख्यमंत्री रहते हुए उसने पुलिस को बैरकों में बैठने का हुक्म दिया और मुस्लिम लीग के गुंडों को खुली छूट दे दी।
16 अगस्त 1946 का वो दिन, डायरेक्ट एक्शन डे, जिसे इतिहास ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स के नाम से जानता है, कोलकाता की सड़कों पर हिंदुओं की लाशें बिछ गईं। घर जलाए गए, हिंदू महिलाओं पर बेइंतहा जुल्म हुआ, उनके साथ दुष्कर्म किए गए और इस पूरे कत्लेआम के पीछे इसी सुहरावर्दी की साजिश थी। बाद में हुसैन सुहरावर्दी भारत छोड़कर पाकिस्तान चला गया और वहां का प्रधानमंत्री बन गया।
अब बात कांग्रेस खानदान के सुहरावर्दी प्रेम की। ये कहा जाता है कि हसन सुहरावर्दी जब इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहा था, तब उसकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू से हुई थी और इसके बाद दोनों में गहरी दोस्ती हो गई।
शायद इसी दोस्ती के कर्ज का बोझ था कि दिसंबर 1948 में यानी विभाजन और कलकत्ता नरसंहार के दो साल बाद जब भारत सरकार ने हुसैन शहीद सुहरावर्दी पर 50 लाख रुपये की इनकम टैक्स की देनदारी का शिकंजा कसा, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने खुद उसके बचाव में तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई और बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय को पत्र लिखे। नेहरू को उस समय हसन के भतीजे की कितनी चिंता थी ये उसका बस एक उदाहरण है तो इससे आप ये समझ सकते हैं कि क्यों कांग्रेसी आज सुहरावर्दी खानदान के पक्ष में उतरे हैं।
कांग्रेस पार्टी ऐसे खानदान के बचाव में उतरती है जिसका सीधा कनेक्शन पाकिस्तान से होता है। हम आपको इनके एक और चैप्टर के बारे में बताते हैं।
मोहम्मद हिदायतुल्लाह जो भारत के मुख्य न्यायाधीश और बाद में देश के कार्यवाहक राष्ट्रपति भी बने। उनका संबध सुहरावर्दी परिवार से कैसे था आइए जानते हैं।
हसन सुहरावर्दी की बेटी शाइस्ता सुहरावर्दी का निकाह मोहम्मद इकरामुल्लाह से हुआ था, जो पाकिस्तान का पहला विदेश सचिव बना और यही इकरामुल्लाह, हिदायतुल्लाह का सगा बड़ा भाई था।
एक भाई पाकिस्तान का राजदूत बना, फ्रांस, कनाडा, पुर्तगाल और यूके में और दूसरा भाई भारत में न्यायपालिका की सीढ़ियां एक के बाद एक चढ़ता रहा। 1968 में देश का चीफ जस्टिस, 1969 में कार्यवाहक राष्ट्रपति, और फिर 1979 में उप-राष्ट्रपति। ये सब इंदिरा गांधी की सरकार के दौर में हुआ।
अब इतना जानकर आपको ये तो समझ में आ गया होगा कि इस चाचा-भतीजा खानदान से कांग्रेस का प्रेम कितना पुराना और गहरा है। साथ ही ये भी एहसास हो गया होगा कि उस सड़क का नाम सुहरावर्दी एवेन्यू से बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड़ रखा जाना कितना जरूरी था।
अब अगर हम यहां तक पहुंच गए हैं चलिए, इस कहानी के सबसे दिलचस्प किरदार की बात करते हैं, गोपाल चंद्र मुखर्जी, जिन्हें गोपाल पाठा के नाम से जाना जाता है। पाठा बांग्ला में बकरे को कहते हैं क्योंकि गोपाल जी का कॉलेज स्ट्रीट पर मीट का पारिवारिक कारोबार था।
जब 16 अगस्त 1946 को कोलकाता की सड़कों पर कत्लेआम शुरू हुआ, तब हिंदू समाज पूरी तरह बेसहारा और नेतृत्वविहीन दिख रहा था। ऐसे में 5 फुट 4 इंच के इस छोटे से कद के आदमी ने हिम्मत दिखाई। उन्होंने नारा दिया, “अगर वो हमारा एक मारेंगे, तो हम उनके दस मारेंगे। हम कायरों की तरह नहीं मरेंगे।”
गोपाल पाठा ने उस समय युवाओं को इकट्ठा किया और भारतीय जातीय वाहिनी नाम का एक संगठन बनाया जिसने मुस्लिम दंगाइयों का डटकर सामना किया। उनकी इस बहादुरी की वजह से ही, मुस्लिम लीग का कोलकाता को पूरी तरह कब्जे में लेने का मंसूबा कामयाब नहीं हो पाया।
महात्मा गांधी और गोपाल पाठा का एक किस्सा तो बड़ा मशहूर है। सितंबर 1946 में जब महात्मा गांधी कोलकाता आए और सबसे हथियार डालने की अपील की तो उनके शांतिदूत गोपाल पाठा के पास भी पहुंचे लेकिन गोपाल पाठा ने साफ इनकार कर दिया।
उन्होंने कहा था, “मैं अपने हथियार गांधी जी के चरणों में क्यों रखूं? जब हम पर हमले हो रहे थे, हमारी बहनों को उठाया जा रहा था, तब गांधी जी कहां थे? अगर कोई मेरी बहन पर हाथ उठाएगा, तो मैं उसकी कलाई काट दूंगा, यह हिंसा नहीं, मेरा धर्म है।”
यही है वो शख्स, जिसके नाम पर अब कोलकाता की उस ऐतिहासिक सड़क का नाम रखा गया है।
कॉन्ग्रेस का इकोसिस्टम आज चाचा-भतीजा के नाम पर छातियां पीट रहा है। अरे भाई, सिर्फ एक नाम का फर्क बता देने से सारा इतिहास थोड़े ना बदल जाएगा। सच ये है कि हसन सुहरावर्दी खुद मुस्लिम लीग और टू नेशन थ्योरी का कट्टर समर्थक था, उसकी अपनी बेटी बाद में पाकिस्तान जाकर वहां की राजनीति में सक्रिय हो गई। ये पूरा परिवार चाचा हो या भतीजा एक ही जड़ से निकले थे। एक ने अंग्रेजों की चाकरी करके बीना दास जैसी देशभक्त बेटी को जेल भिजवाया, और दूसरे ने हजारों हिंदुओं का खून बहाया।
एक खानदान जिसके लगभग हर बड़े सदस्य ने आखिर में पाकिस्तान को चुना, उसी परिवार के नेटवर्क को कॉन्ग्रेस ने दशकों तक भारत की सत्ता के गलियारों में पाला-पोसा और इसी दौर में, गोपाल पाठा जैसे असली नायक को इतिहास की किताबों से लगभग मिटा दिया गया, सिर्फ इसलिए कि उनकी बहादुरी की कहानी कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति में फिट नहीं होती थी।
दशकों तक वामपंथियों और टीएमसी के शासन में, तुष्टिकरण की राजनीति ने गोपाल पाठा जैसे योद्धा को भुला दिया और गद्दारों के नाम पर बनी सड़कों को सहेज कर रखा। लेकिन अब, भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस ऐतिहासिक भूल को सुधार दिया है।
ये सिर्फ एक सड़क के नाम बदलने की बात नहीं है। ये उन लाखों निर्दोष हिंदुओं और स्वतंत्रता सेनानियों के अपमान को मिटाने की बात है, जिनकी कुर्बानी को दशकों तक दबाया गया। किसी भी गद्दार या देशद्रोही परिवार का नाम आजाद भारत की सड़कों पर शोभा नहीं देता, चाहे उसे कितनी भी सफाई से तकनीकी बहस में लपेटा जाए।
भाजपा सरकार ने गोपाल पाठा के नाम पर सड़क का नाम रखकर ये साबित कर दिया है कि अब देश अपने रक्षकों का सम्मान करेगा, भक्षकों और गद्दारों का नहीं। ये फैसला बंगाली हिंदुओं के खोए हुए गौरव, पराक्रम और आत्मसम्मान को वापस लौटाने वाला एक कदम है और इसके लिए वर्तमान सरकार निश्चित रूप से बधाई की पात्र है।
तो ये थी सुहरावर्दी एवेन्यू से गोपाल मुखर्जी रोड तक की वो पूरी कहानी, जिसे दशकों तक दबाया गया था। अगर आपको ये वीडियो पसंद आया हो, तो चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए, ताकि इतिहास की ऐसी असल कहानियां आपके पास पहुंचती रहें।





