क्या आप भारत की उस सशस्त्र परंपरा के बारे में जानते हैं जिसने मुगलों और अफगानों से लोहा लिया? न सिर्फ लोहा लिया, बल्कि अपनी पहचान की लड़ाई में उस लोहे पर अपना रक्त बहाया और अपनी पहचान को बचाने की जंग न सिर्फ लड़ी, बल्कि जीती भी। लेकिन आज अपनी पहचान, जिसे वे सहेजते-बचाते इतनी सदियों से आ रहे थे, उसे लेकर वे एक अजीब से दौर से गुजर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं निहंग सिखों की। इन्हें पॉपुलर टर्म्स में ‘गुरु की फौज’ कहा जाता है, जिनका इतिहास तलवार, बलिदान और रक्त से लिखा गया है। लेकिन आज इन्हीं निहंगों के नाम पर हाईवे जाम करने, पुलिस से भिड़ने और धार्मिक परिसरों पर कब्जे की खबरें आ रही हैं। कहा जा रहा है कि निहंगों के द्वारा लॉ एंड ऑर्डर को बिगाड़ा जा रहा है।
क्या निहंग सच में वही रह गए हैं जो वे 18वीं सदी में थे? या ब्रिटिश काल की ‘मार्शल रेस थ्योरी’ ने उन्हें हिंदुओं से इतना अलग कर दिया कि आज समाज एक गहरी दरार के मुहाने पर खड़ा है और वह साफ नजर आ रही है? आज हम इतिहास के उन पन्नों को पलटेंगे जो अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। हम बात करेंगे अयोध्या के उस 1858 के दावे की, नागा साधुओं के उन अखाड़ों की जो कभी निहंगों के समानांतर थे, और इन योद्धा परंपराओं के बीच दीवार खड़ी करने वाली इतिहास की कौन सी कड़ियां हैं, उनका भी जिक्र करेंगे।
सबसे पहला सवाल यह जानना जरूरी है कि निहंग कौन हैं? निहंग शब्द को लेकर, इसके अर्थ को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभेद हैं। कई इतिहासकार इसे फारसी के ‘नहंग’ यानी मगरमच्छ से जोड़ते हैं, जो मुगलों ने उनकी क्रूर युद्ध शैली को देख कर उन्हें दिया था। जिस नाम से वे उन्हें पुकारते थे। लेकिन सिख इतिहासकार हरजिंदर सिंह दिलगीर इसे ‘निडर’ होने से जोड़ते हैं। अब सवाल यह है कि निहंग होना क्या हुआ? कब से शुरुआत हुई इस परंपरा की? तो इसका कोई एक सीधा जवाब इतिहास के पन्नों में नहीं मिलेगा। इतिहास के लोग इसके बारे में चार अलग-अलग थ्योरीज देते हैं। पहली, गुरु गोविंद सिंह के पुत्र फतेह सिंह के नीले चोले और धुमाला से शुरू हुए ये लोग। दूसरी, 1704-05 की चमकौर की लड़ाई के बाद गुरु के नीले वस्त्रों से ये लोग शुरू हुए। तीसरी, निशान वालिया मिसल के अकाली नैना सिंह से इन लोगों की परंपरा की शुरुआत हुई और चौथी, 1703 की आनंदपुर साहिब की जो लड़ाई थी, वहां से निहंग परंपरा शुरू हुई। इतिहासकार शरणजीत कौर संधारा का मानना है कि निहंग 18वीं सदी में एक संगठित शक्ति के तौर पर तब उभरे जब मुगल सत्ता कमजोर पड़ रही थी।
अब इसका एक और इंटरेस्टिंग फैक्ट देखिए। क्या आप जानते हैं कि निहंग शस्त्र विद्या में शिव को आदि अखाड़ा गुरुदेव मानते हैं? ‘सरबलोह ग्रंथ’ और ‘चंडी दी वार’ में जो शैव योद्धा तप संस्कृति दिखती है, वह बताती है कि निहंग और हिंदू परंपराएं कभी अलग-थलग नहीं थीं। इनका नीला चोला गुरु गोविंद सिंह की याद है और ऊंची धुमाला पगड़ी सिर्फ एक स्टाइल नहीं, बल्कि चलता-फिरता रक्षा कवच है, जो उनके सिर को बचाने के काम आता है। इसमें चक्रम, खंडा और करुध जड़े होते थे, जिससे जब कोई दुश्मन हमला करता था तो सिर के ऊपर तलवार या कोई हथियार न लग पाए या उतना इंपैक्ट न डाल पाए, इसके लिए रखा जाता था।
निहंगों के इतिहास में अयोध्या का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। 1858 के साल में अगर आप देखेंगे, तो अयोध्या में निहंगों के रोल को लेकर तमाम तरह की बहसें रही हैं। लेकिन 1858 की घटना के जरिए अगर आप समझने की कोशिश करेंगे, तो बड़े अच्छे से समझ में आएगा। 1855 में हनुमानगढ़ी के ऊपर जब कब्जे को लेकर मुसलमानों से हिंदुओं की लड़ाई हुई, उसके बाद हिंदू और स्थानीय मुसलमानों का जो समूह था, जो आक्रांता थे जिन्होंने राम मंदिर के ऊपर बलात कब्जा किया हुआ था, उनके बीच तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया था। तब 28 नवंबर 1858 को बाबा फकीर सिंह खालसा अपने 25 निहंगों के साथ हनुमानगढ़ी परिसर में दाखिल हुए। यहां समझना जरूरी है कि उस समय पर सिख और हिंदू परंपराएं एक-दूसरे से बिल्कुल अलग होकर नहीं चलती थीं। निहंगों का यह समूह स्वयं को सनातन धर्म के एक रक्षक पंथ के तौर पर देखता था। यह एक डिफेंस लाइन थी। उन्होंने वहां प्रवेश करके उस स्थान पर हवन किया जो हिंदू परंपरा का हिस्सा था। यानी कि राम मंदिर और हनुमानगढ़ी की जो पूरी प्रिमाइसेज थी, उसके अंदर हवन किया गया। दीवारों पर इन्होंने कोयले से ‘राम-राम’ लिखा, जिसका मतलब यह था कि वे उस समय अपनी धार्मिक पहचान को हिंदू और राम के प्रति अपनी आस्था को रखते थे और यह घटना उनकी इस आस्था का प्रत्यक्ष प्रमाण थी।
निहंगों के लिए गुरु गोविंद सिंह एक मार्गदर्शक के तौर पर थे, गुरु के तौर पर थे और उन्होंने वहां मौजूद मंदिर परिसर की पवित्रता को पुनर्स्थापित करने के लिए, अपने गुरु की तरह, जिस तरह से गुरु हिंदू हितों के लिए लड़ाई लड़ते थे, हिंदुओं के डिफेंस शील्ड के तौर पर काम करते थे, उसी तरह से यहां पर हवन और पूजा करके यह स्थापित किया कि यह स्थान हिंदुओं के लिए है और निहंगों ने भी इसमें अपना योगदान दिया है। यह सब कुछ जो मैं बता रहा हूं, यह सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले तक में दर्ज हुआ है, जिसके तौर पर हम मान सकते हैं कि यह एक बहुत फंडामेंटल ऐतिहासिक सबूत की कहानी है। इसे किसी अलग सिख आंदोलन के तौर पर देखने के बजाय निहंगों को हमें यह देखना चाहिए कि उस समय सनातन धर्म का एक सशस्त्र समूह था जो अपने धार्मिक स्थलों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा था। आज के समय में जब हम कुछ घटनाओं को देखते हैं तो यह भी स्पष्ट होता है कि उस समय सिख और हिंदू एक ही साझा सांस्कृतिक और धार्मिक धरातल पर खड़े थे।
बावजूद इसके विवाद इस बात पर है कि उस घटना का पॉलिटिकल मीनिंग क्या निकाला जाए? किस तरह से समझा जाए? और इस पूरी डिबेट को हमें समझना है, अगर कि निहंगों और हिंदुओं के बीच के जो मतभेद की कहानी है, जिस दरार का जिक्र आज होने लगा है, वो कैसे समझा जाए, तो उसके लिए हमें ब्रिटिश पीरियड में जाना होगा। ब्रिटिश काल में जाना होगा, जिस समय ‘मार्शल रेस थ्योरी’ चल रही थी। 1849 में पंजाब पर कब्जे के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने भारत की जो सोशल स्ट्रक्चरिंग थी, जो पूरी बनावट थी हमारी सामाजिक, उसको पूरी तरह से बदलने पर जोर दिया। उन्होंने एक ‘मार्शल रेस थ्योरी’ इसी क्रम में लागू की, जिसका मतलब यह था कि सिखों, गोरखाओं और राजपूतों को जन्मजात योद्धा घोषित कर दिया और अन्य सामाजिक समूहों को सैन्य रूप से कमतर घोषित किया, जिससे समाज के अंदर एक डिवीजन आई।
1873 में सिंह सभा आंदोलन हुआ। शुरुआत में यह वफादार पूर्व सैनिकों का संगठन था, जो सिखों के हितों के लिए, जो पंजाब का राजघराना था, उसकी लड़ाई को लड़ रहे थे, लेकिन बाद में ‘तत खालसा’ गुट ने सिखों की अलग और हिंदू प्रभाव से पूरी तरह मुक्त पहचान पर जोर देना शुरू किया। अंग्रेजों ने इस सोच को खुलकर बढ़ावा दिया, क्योंकि वे जानते थे और चाहते थे कि हिंदू और सिख कभी एकजुट न रहें, क्योंकि अगर वे एकजुट रहे, तो अंग्रेजों के लिए अपनी सत्ता को टिका कर रख पाना हिंदुस्तान में, पंजाब में राज करना उनके लिए मुश्किल होगा। उस समय पंजाब एक तरह से समझिए तो कॉन्फ्लिक्ट से गुजर रहा था। सामाजिक टेंशन थी वहां पर। गुरु तेग बहादुर जी की शहादत हो चुकी थी, जजिया लिया जा रहा था, मंदिरों का विध्वंस हो रहा था और मुगल दौर की जो यादें थीं, उन्होंने हिंदू और सिख दोनों समाजों में एक तरह से आइडेंटिटी क्राइसिस को जन्म दिया था।
इसी माहौल में आर्य समाज उभरा। इसका मकसद भी हिंदुओं में आत्मविश्वास को जगाना, उन्हें अपनी जड़ों से जोड़कर संगठित रखना, वेदों से जोड़कर के, जो मौलिक था उससे जोड़कर रखना इनका उद्देश्य था। दूसरी ओर सिखों को लगा कि अगर उनकी अलग पहचान को मजबूती नहीं मिली, तो वे धीरे-धीरे पुनः जिस विरासत से वे आते हैं, उसी विरासत में घुल कर रह जाएंगे और उनकी जो स्पेशल आइडेंटिटी इतने टाइम में तैयार हुई है, वो कहीं न कहीं धुंधली पड़ जाएगी। इतिहासकार रिचर्ड जी फॉक्स बताते हैं कि अंग्रेजों ने इसी मतभेद का, इसी इंफीरियरिटी का फायदा उठाया। आइडेंटिटी क्राइसिस के वक्त का फायदा उठाया। उन्होंने सिंह सभा के उस गुट को बढ़ावा दिया जो सिखों को हिंदुओं से पूरी तरह अलग मानता था। वायसराय लॉर्ड लैंसडाउन का सिंह सभा के प्रति समर्थन भी इसी ‘डिवाइड एंड रूल’ नीति का हिस्सा था। अंग्रेजों को डर था कि अगर आर्य समाज की ऊर्जा और सिखों के द्वारा जो इतने वर्षों में तैयार हुई सैन्य परंपरा है, वो एक हो गई, तो उनकी हुकूमत के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा।
उनके अनुसार ब्रिटिश सेना में भर्ती किए गए सिखों की सिंह पहचान को जानबूझकर के, कोट-अनकोट करके यानी मजबूत करके दिखाया गया ताकि उनकी जो साझा हिंदू-सिख पहचान है, वो कमजोर पड़े। घुसाया गया अंदर में कि जो सिख हैं, जो सिंह हैं, वो दरअसल ‘मार्शल रेस’ हैं और जो बाकी हिंदू हैं वो तो कमजोर लोग हैं। वो लड़ाई कहां लड़ पाते हैं? वे कमतर हैं। इसी बहस के बीच 1888 में ‘सिखिज्म: पास्ट एंड प्रेजेंट’ नाम की एक पुस्तक ने सिखों की जो अलग पहचान बार-बार कल्टीवेट की जा रही थी, उस पर सवाल उठाए। जवाब आया 1898 में, काहन सिंह नाभा ने ‘हम हिंदू नहीं हैं’ नाम की एक पुस्तक लिखी, जिसने आगे चलकर के जो अलग सिख पहचान है, उसकी आइडियोलॉजिकल फाउंडेशन जो रखी, उसको बहुत ज्यादा मजबूत किया।
इसके बाद फिर आती है बात विचारधाराओं के बंटवारे की और गुरुद्वारा सुधार की। इस दौर में सिखों के समाज में अगर आप जाएं तो दो मुख्य विचारधाराएं आमने-सामने लड़ रही थीं, आईडियोलॉजिकली। एक अमृतसर धड़ा था, यानी जो सनातन सिख थे, जो मानते थे कि सिख और हिंदू रीति-रिवाज आपस में घुले-मिले हैं, एक हैं। दूसरा था लाहौर धड़ा, ‘तत खालसा’, जो शुद्धतावाद और अलग पहचान पर जोर देते थे। यानी प्योरिटी चाहते थे कि प्योर रेस है सिख, वो हिंदुओं के साथ मिलकर के न रहे। और इस आर्गुमेंट के जरिए वो एक अलग पहचान पर जोर देते थे। 1902 में चीफ खालसा दीवान के जरिए दोनों में एक सतही एकता जरूर आई, लेकिन जो आईडियोलॉजिकल डिफरेंसेस थे, वो बढ़ते गए। आगे चलकर 1920 के दशक के गुरुद्वारा सुधार आंदोलन ने एसजीपीसी (SGPC) का गठन करवाया। हालांकि इसके निर्माण में जो ब्रिटिशर्स की भूमिका है, उसको लेकर के काफी ज्यादा विवाद होता है। कई बार ये सवाल खड़े होते हैं। इतिहासकारों के बीच मतभेद होते हैं कि एसजीपीसी का निर्माण अंग्रेजों के रोल से हुआ था। इन तमाम सवालों को लेकर के बातें होती हैं। यह विषय काफी ज्यादा, एक तरह से इस पर्टिकुलर अगर कॉन्टेक्स्ट में आप देखेंगे, एसजीपीसी जो आज सिखों की सबसे बड़ी संस्था होने की जिसके बारे में बात की जाती है, उसको लेकर बड़ा विवाद होता है।
लेकिन यह कहना कि पूरा सिख समुदाय अंग्रेजों का वफादार था, सरासर गलत और अधूरा भी हो जाएगा। एसजीपीसी के आर्गुमेंट में कई बार लोग लाइन क्रॉस कर जाते हैं। अगर आप गदर आंदोलन को देखें, जलियांवाला बाग हत्याकांड को देखें, जिसमें बलिदान होने वाले अधिकांश लोग सिख और पंजाबी थे। सिखों की भागीदारी स्वतंत्रता संग्राम के हर चरण में आपको बहुत बड़ी दिखाई पड़ेगी। ‘मार्शल रेस थ्योरी’ और ब्रिटिशर्स के द्वारा सिंह सभा का समर्थन और सिख पहचान को एक अलग आकार देना जो है, यह कहानी का, यात्रा का एक बिंदु है। पूरी यात्रा, पूरी कहानी नहीं है। हमें यह भी समझना होगा कि कैसे एक व्यवस्थित प्रशासनिक नीति ने हमारे समाज के साझा इतिहास को टुकड़ों में बांटने की कोशिश की। अंग्रेजों के वक्त में बहुत कोऑर्डिनेटेड ढंग से इस चीज को किया गया कि समाज के अंदर यह बंटवारा आए।
इस बीच में एक और कहानी आती है, एक और किरदार की एंट्री होती है नागा साधुओं की। एक समानांतर योद्धा परंपरा, अगर हम निहंगों के इतिहास को समझना चाहते हैं, तो हमें नागा साधुओं की परंपरा को भी समझना होगा। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने दशनामी संप्रदाय के अस्त्रधारी योद्धाओं को संगठित किया था। इन्हें नागा साधु कहते हैं। धर्म की रक्षा के लिए ये भी लड़ते थे। ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि 1757 में गोकुल पर हमला करने वाले अहमद शाह अब्दाली की सेना को नागाओं ने हरा दिया था। 1764 की बक्सर की लड़ाई में ब्रिटिश सेना के खिलाफ 500 से ज्यादा नागा साधु लड़े थे और बंगाल में सन्यासी विद्रोह जो 1765 से 1800 तक चला था, उसमें तो सीधे तौर पर सन्यासियों का अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह था। अनूप गिरी और उमा राव गिरी जैसे नागा सेनापति तो जयपुर और जोधपुर जैसी रियासतों की सेना के बहुत महत्वपूर्ण हिस्से थे।
डायक एच. ए. कोल्फ की पुस्तक ‘नौजवान राजपूत एंड सिपॉय’ में नागाओं और सिखों की ऐतिहासिक भूमिका के बारे में महत्वपूर्ण टिप्पणियां दर्ज की गई हैं। इस किताब में स्पष्ट रूप से लिखा है कि मध्यकालीन भारत के गोसाईं और नागाओं का उदाहरण यह दर्शाता है कि तपस्या और युद्ध कभी दोनों एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं रहे हैं। यहां तक लिखा है पुस्तक में कि ये योद्धा साधु वर्ग न केवल धार्मिक जीवन जीता था, बल्कि सैन्य और व्यवसायिक गतिविधियों में भी सक्रिय रूप से शामिल था जो समाज के लिए ‘फॉरवर्ड डिफेंस’ का काम करता था। किताब में कोल्फ तर्क देते हैं कि सिख समुदाय की सैन्य क्षमता उस दौर की अस्थिर मुगल सत्ता और बदलती जो राजनीतिक परिस्थितियां थीं, उसमें अपनी सुरक्षा और अस्तित्व के लिए एक आवश्यक प्रक्रिया थी। पुस्तक में यह भी बताया गया है कि कैसे बाद के समय में, विशेषकर ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, सिखों को ‘मार्शल रेस’ के रूप में वर्गीकृत किया, जिसने उनकी पहचान और सैन्य इतिहास को एक नया आधिकारिक आकार दिया और इसका दूसरा पहलू अगर आप देखना चाहें, तो उनके अंदर ‘हम’ की भावना भी भरी कि ‘हम’ और ‘वे’ यानी हिंदू और सिखों के बीच में एक डिवीजन है। ये चीज को क्रिएट करने में भी इस ‘मार्शल रेस’ के टर्म का, इस थ्योरी का बहुत बड़ा योगदान देखा जाना चाहिए।
और इस इतिहास की पूरी यात्रा से निकलकर के अगर आप आधुनिक समय में आएंगे, आधुनिक राजनीति का समय देखेंगे, आजादी के बाद की राजनीति का समय देखेंगे भारत की, तो उसमें आपको एक बहुत प्रोमिनेंट टर्म देखने को मिलेगा: ‘खालिस्तान’। निहंगों और खालिस्तान आंदोलन का संबंध हमेशा से सवालों के दायरे में रहा है। 1973 के आनंदपुर साहिब प्रस्ताव से लेकर 80 के दशक के भिंडरावाले तक, निहंगों की हथियार संस्कृति का इस्तेमाल एक तरह से उग्र राजनीति या सशस्त्र राजनीति, सशस्त्र विद्रोह के प्रतीकवाद के लिए इसका इस्तेमाल किया गया। 1980 के दशक में भिंडरावाले का उदय सिख राजनीति का एक टर्निंग पॉइंट था। उस टाइम पर निहंगों की उस ‘मीरी-पीरी’ की छवि को एक उग्र राजनीतिक हथियार के तौर पर उस समय इस्तेमाल किया गया भिंडरावाले के द्वारा। ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बाद के जो घटनाक्रम रहे, उन्होंने निहंगों के उस पारंपरिक योद्धा स्वरूप को एक तरह से कह लें तो खालिस्तान की मांग के साथ जोड़ने की जो बात थी, उसके ऊपर मुहर लगा दी, क्योंकि उस समय भारतीय सेना और जो अंदर मौजूद लोग थे, जिन्हें बड़ी मात्रा में निहंग कहा गया, उनके बीच में डायरेक्ट कंफ्रंटेशन देखने को मिला था।
आज भी जब हम अमृतपाल सिंह या ‘वारिस पंजाब’ जैसे संगठनों को देखते हैं, तो हम पाते हैं कि वे ठीक भिंडरावाले की उसी वेशभूषा, उसी भाषा और उसी शैली को अपना रहे हैं। वे निहंगों की उस ‘गुरु की फौज’ वाली पहचान का इस्तेमाल अपनी राजनैतिक रैलियों और विरोध प्रदर्शनों में बड़ी चालाकी से कर लेते हैं। और यह कोई संयोग नहीं है कि भिंडरावाले की तस्वीरें आज भी कई निहंग डेरों और प्रदर्शनों में मुख्यता से, प्रमुखता से हमें देखने को मिल जाती हैं। और इसका यह मतलब निकाला जा सकता है कि निहंग परंपरा के जो हथियार और प्रतीक सदियों से धर्म की रक्षा और धर्म को एकजुट रखने, मजबूत रखने के लिए थे, अब वे एक ऐसी राजनीतिक विचारधारा का हिस्सा बनने की तरफ बढ़ रहे हैं जो कहीं न कहीं मौके-मौके पर भारत की संप्रभुता को चुनौती देने की कोशिश करती प्रतीत होती है। और भारतीय एजेंसियों का भी मानना है कि इन गुटों के संपर्क विदेशों में सक्रिय खालिस्तान समर्थक तत्वों और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी जो भारत के खिलाफ लगातार साजिशें करती है, आईएसआई (ISI), उनके जैसे बाहरी एलिमेंट्स के साथ में भी हैं। जिसे यह गुट साफ तौर पर नकारते तो हैं, लेकिन अगर आप धरातल पर दिखने वाले इनकी हरकतों का पैटर्न आप समझने की कोशिश करेंगे, तो कुछ और ही कहानी आपको नजर आएगी।
हालिया दौर में अमृतपाल सिंह जैसे नेताओं ने निहंगों को फिर से मुख्यधारा की राजनीति में ‘प्रेशर पॉइंट’ की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया है। 2021 की सिंघु बॉर्डर की घटना हो या जून 2026 में उत्तराखंड के कर्णप्रयाग और नगरासू में पार्किंग और गुरुद्वारे के कमरों को लेकर हुआ विवाद हो, पैटर्न बहुत स्पष्ट है। छोटी सी बात पर बवाल होता है। फिर पंजाब की सिख राजनीति जिसमें एसजीपीसी, अकाल तख्त जैसे बड़े एलिमेंट्स हैं, उनका हस्तक्षेप होता है और फिर मामला एक क्राइसिस की शेप लेता हुआ चला जाता है। इन घटनाओं में अगर आप देखेंगे, तो तीन प्रमुख बातें कॉमन मिलेंगी। पहला, बेअदबी के नाम पर तुरंत हिंसक रिएक्शन होता है। दूसरा, कानून को अपने हाथ में लेने को एक तरह से ‘रिलीजियस ड्यूटी’ बना करके दिखाना और तीसरा, इसे पंजाब केंद्रित पॉलिटिकल एजेंडा बनाने की कोशिश करना। यह तरीका निहंगों की मूल ‘गुरु की फौज’ वाली छवि को एक तरह से ‘एंटी-लॉ’ की जो इमेज है, उसके तौर पर पेश करता है। जो उनकी अपनी ही खुद की जो स्टेबल विरासत है, जिस इतिहास की हम तारीफ करते हुए इस पूरे वीडियो में आ रहे हैं, उसके लिए ही बहुत बड़ा खतरा बनता है।
अब सवाल आखिर में यह होता है कि हम कहां पर खड़े हैं? निहंग परंपरा हिंदू और सिख विरासत की एक साझी पहरेदार थी और उसकी निशानी थी। ब्रिटिश नीतियों और सिंह सभा जैसे आंदोलनों ने इसे धीरे-धीरे अलग किया और आज देश विरोधी राजनीति के चंगुल में फंसकर यह खाई और ज्यादा बढ़ रही है। और यह कहना गलत है कि पूरा समुदाय भारत विरोधी है, मैं यह मानता हूं, लेकिन यह भी सच है कि कुछ गुटों का ‘खालिस्तानी’ नैरेटिव के साथ जुड़ना एक कड़वी हकीकत है जिसे स्वीकार करना होगा और उसे रिजॉल्व करना होगा। इतिहास को आप गौरव गाथाओं या नफरत के चश्मे से नहीं देख सकते हैं, बल्कि तथ्यों से देखना होगा। और सवाल उठता है, जब तथ्य हम देखते हैं, तो क्या हम अपनी साझा विरासत को बचा पाएंगे? हमारी ‘कॉमन आइडेंटिटी’ को बचा पाएंगे या ब्रिटिश काल से शुरू हुआ ‘फूट डालो और राज करो’ का खेल, जिससे जन्मी एक सुपीरियरिटी की भावना और उसके बाद अलग आइडेंटिटी की लड़ाई, वो हमें हमेशा के लिए अलग करके खड़ा कर देगा? जो दोनों समाज एक-दूसरे के पूरक थे, दोनों कहीं कोई एक को धर्म का रास्ता दिखाता था तो दूसरा उसकी रक्षा करने के लिए मार्ग प्रशस्त करता था। यह दोनों समाज, सवाल यह खड़ा होता है कि इस तरह की घटनाएं जो उत्तराखंड में हमें देखने को मिली, अभी हाल-फिलहाल में देखने को मिल रही हैं, क्या वो घटनाएं हमें हमेशा के लिए अलग करने की तरफ बढ़ाती हुई नजर आ रही हैं?
मुख्य ऐतिहासिक स्रोत एवं पुस्तकें
- ‘नौकर, राजपूत एंड सिपॉय’ (Naukars, Rajputs and Sepoys): डायक एचए कोल्फ (Dirk H.A. Kolff) द्वारा लिखित यह पुस्तक मध्यकालीन भारत में योद्धा संप्रदायों, विशेषकर नागाओं और सिखों की सैन्य भूमिका का व्यापक विश्लेषण करती है।
- ‘सिखिज्म: पास्ट एंड प्रेजेंट’ (Sikhism: Past and Present): 19वीं सदी के अंत में सिख पहचान और उनके इतिहास पर लिखे गए विमर्श का एक प्रमुख दस्तावेज़।
- ‘हम हिंदू नहीं हैं’ (Hum Hindu Nahin Hain): काहन सिंह नाभा (Kahn Singh Nabha) द्वारा 1898 में रचित, जिसने सिख पहचान के वैचारिक आधार को मजबूती दी।
- सरबलोह ग्रंथ (Sarbloh Granth) एवं चंडी दी वार (Chandi di Var): निहंगों की आध्यात्मिक और योद्धा संस्कृति के दार्शनिक मूल स्रोत।
- सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया का अयोध्या फैसला (Ayodhya Verdict): इस ऐतिहासिक निर्णय में 1858 की हनुमानगढ़ी घटना और बाबा फकीर सिंह खालसा के योगदान का उल्लेख ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में दर्ज है।
- शरणजीत कौर संधारा (Saranjit Kaur Sandhara): निहंगों के 18वीं सदी के उदय और एक संगठित शक्ति के रूप में उनके विकास पर किए गए शोध कार्य।
- रिचर्ड जी. फॉक्स (Richard G. Fox): ब्रिटिश ‘मार्शल रेस थ्योरी’ और सिंह सभा आंदोलन के दौरान सिख पहचान के पुनर्निर्माण पर किया गया अध्ययन।
- औपनिवेशिक प्रशासनिक रिकॉर्ड: 1849 के बाद पंजाब में ब्रिटिश प्रशासन द्वारा सामाजिक संरचना में किए गए बदलावों और लॉर्ड लैंसडाउन की नीतियों से संबंधित ऐतिहासिक फाइलें।




