‘पठानों से कह दो… चौहान आया है’ यह डायलॉग सुनते ही कुछ लोगों के पेट में मरोड़ पड़ गई। ‘पठान’ तो हीरो बन सकता है, लेकिन जैसे ही ‘चौहान’ नाम आता है, लेफ्ट-जिहादी गैंग का खून खौल उठता है। क्यों? क्योंकि यह फिल्म कश्मीर की उस हकीकत को दिखा रही है, जिसे ‘ऑल्ट न्यूज़’ (Alt News) वाले ‘पीसफुल प्रोटेस्ट’ (Peaceful Protest) बताकर बेच रहे हैं।
15 दिसंबर 2018, पुलवामा का सिरनू गाँव। सेना ने तीन हिज्बुल आतंकियों को मार गिराया। इसके बाद क्या हुआ? सैकड़ों स्थानीय युवा पत्थर लेकर सुरक्षा घेरे पर टूट पड़े। जवान अपनी जान बचा रहे थे और ये ‘मुल्क प्रेमी’ सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसा रहे थे। फिर 14 फरवरी 2019 आया… पुलवामा अटैक हुआ। 40 जवानों का बलिदान। एक दिन में 40 परिवार टूट गए और पूरा देश निशब्द था। इसलिए ‘जेन जी’ (Gen Z) को यह याद दिलाना ज़रूरी है कि आज भी वैलेंटाइन डे को इंडिया में ‘ब्लैक डे’ (Black Day) क्यों मनाया जाता है? क्योंकि पुलवामा का घाव अभी भी हरा है।
अब ‘ऑल्ट न्यूज़’ वाले पैलेट गन पर रो रहे हैं; लंबे-लंबे आर्टिकल लिखकर बता रहे हैं कि फिल्म में पैलेट गन को Dangerous नहीं बताया गया है। अरे भाई, जब भीड़ पत्थर और पेट्रोल बम फेंकती है, तब क्या ‘इंडियन आर्मी’ उन्हें चॉकलेट बाँटे?
अब ज़रा यह सच सुनिए; कश्मीर में पत्थरबाजी और पेट्रोल बम हमलों में हज़ारों जवान घायल हुए हैं। कई जवानों की आँखें चली गईं, चेहरे झुलस गए, हाथ-पैर टूट गए। लेकिन आज भी CRPF के जवान रोज़ इस जिहादी पत्थरबाजी का सामना करते हैं। वे फिर भी शांत दिखते हैं, लेकिन जब जिहादियों पर एक्शन लिया जाता है, तो ये लोग ‘ह्यूमन राइट्स’ (Human Rights) का रोना शुरू कर देते हैं।
अगर इन सब बातों से हैरानी हो रही है, तो वह भी याद कीजिए कि रातों-रात कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से खदेड़ दिया गया था। महिलाओं के साथ बलात्कार, बच्चों के सामने कत्ल, कश्मीरी पंडितों की गलियों में हत्या; सब कुछ हुआ था।
अब दिल्ली दंगों को याद कीजिए, जहाँ अंकित शर्मा को पीट-पीटकर मार डाला गया, दिलबर नेगी का कत्ल हुआ। कोविड के दौरान जमातियों ने अस्पतालों पर पत्थर बरसाए, बनभूलपुरा में पुलिस अफसरों पर हमला हुआ। कश्मीर से लेकर दिल्ली, कन्याकुमारी और केरल तक एक ही Modus Operandi और एक ही किताब की SOP चलती है। फिर भी ‘ऑल्ट न्यूज़’ की तरफ से इतना Victim Play क्यों?
पर इन सब पर लेफ्ट के इन ‘उमर खालिद लवर्स’ की उँगलियों को लकवा मार जाता है। यानी हमारे देश के जवान मरें तो साइलेंस, आतंकी मरें तो विक्टिम कार्ड? ये फिलिस्तीन के लिए सड़क पर उतर आते हैं, ईरान में कोई मारा जाए तो यहाँ जुलूस निकाले जाते हैं, लेकिन कश्मीर के बलिदानियों के लिए एक शब्द नहीं!
यह दोहरी जिहादी मानसिकता है भाई। एक तरफ ‘आज़ादी’ के नारे, दूसरी तरफ पत्थर और बम। और जब ‘चौहान’ जैसी फिल्म आईना दिखा देती है, तो ये जल जाते हैं। क्योंकि फिल्मों में अब आतंकियों की ‘लव स्टोरी’ (Love Story) नहीं, बल्कि सच्चाई दिखाई जा रही है। कश्मीर में ‘स्टोन पेल्टिंग’ (Stone Pelting) कोई संस्कृति नहीं, ‘रेडिकलाइजेशन’ (Radicalisation) का हिस्सा है। हाथ में पत्थर थमाए जाते हैं और दिमाग में ज़हर भरा जाता है।
‘चौहान’ के एक डायलॉग ने लेफ्ट ‘इकोसिस्टम’ (Ecosystem) के हलक से पानी सुखा दिया है। इसमें कोई ताज्जुब नहीं कि ये लोग इस फिल्म को ‘प्रोपगेंडा’ (Propaganda) बताकर रोकने की कोशिश करेंगे। सोचिए, जब ये लोग सच मानने को तैयार ही नहीं, तो फिल्म को कैसे स्वीकार करेंगे? ये फिल्में तो बस एक आईना हैं, जिसे वामपंथ देखना पसंद नहीं करता।





