भारत के सामरिक भविष्य, हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर इस पॉडकास्ट में कर्नल हनी बख्शी (Col. Hunny Bakshi) ने ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ (Great Nicobar Project) को लेकर ऑपइंडिया के लिए आशीष नौटियाल एवं ऋतिका चंदोला के साथ विस्तार से चर्चा की। बातचीत में उन्होंने इस प्रोजेक्ट के सामरिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व के साथ-साथ पर्यावरणीय सक्रियता, ऊर्जा सुरक्षा और पूर्वोत्तर भारत की आंतरिक चुनौतियों पर भी अपनी बात रखी।
कर्नल बख्शी के अनुसार, भारत को अब केवल भावनात्मक या प्रतिक्रियात्मक रणनीति से आगे बढ़कर दीर्घकालिक सामरिक सोच अपनानी होगी। उन्होंने कहा कि ‘ग्रेट निकोबार’ केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की निर्णायक उपस्थिति स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
‘अविनाशी विमान वाहक’ के रूप में ग्रेट निकोबार
कर्नल बख्शी ने ग्रेट निकोबार को भारत का ‘अविनाशी विमान वाहक’ (Unsinkable Aircraft Carrier) बताया। उनका कहना था कि हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक गतिविधियों को देखते हुए भारत को ऐसे स्थायी सामरिक ठिकानों की आवश्यकता है, जो समुद्री निगरानी और नियंत्रण की क्षमता को मजबूत करें।
उन्होंने कहा कि ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति भारत को ‘स्ट्रेट ऑफ मलक्का’ (Strait of Malacca) जैसे वैश्विक समुद्री मार्गों पर नजर रखने की क्षमता देती है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे व्यस्त व्यापारिक रास्तों में गिना जाता है, जहां से वैश्विक ऊर्जा और व्यापारिक आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
कर्नल बख्शी के अनुसार, यदि भारत इस क्षेत्र में मजबूत उपस्थिति दर्ज करता है, तो वह हिंद महासागर में शक्ति संतुलन बनाए रखने में अधिक सक्षम होगा।
पर्यावरणीय सक्रियता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा
पॉडकास्ट में पर्यावरणीय विरोध और रणनीतिक जरूरतों के बीच टकराव पर भी विस्तार से चर्चा हुई। कर्नल बख्शी ने कहा कि कई बार ‘पर्यावरण सक्रियता’ (Environmental Activism) के नाम पर ऐसे अभियान चलाए जाते हैं, जो अनजाने या जानबूझकर राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को कमजोर करते हैं।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विकास और पारिस्थितिकी के बीच संतुलन जरूरी है। उनका कहना था कि किसी भी रणनीतिक प्रोजेक्ट का मतलब पर्यावरण को नष्ट करना नहीं होना चाहिए, लेकिन केवल विरोध के लिए विरोध भी उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि भारत को यह समझना होगा कि सामरिक सुरक्षा से समझौता करने की कीमत भविष्य में बहुत भारी हो सकती है। इसी संदर्भ में उन्होंने सिंगापुर का उदाहरण देते हुए कहा कि सीमित भूभाग होने के बावजूद उसने खुद को एक बड़े आर्थिक और सामरिक केंद्र के रूप में विकसित किया।
एनजीटी क्लीयरेंस और प्रक्रियाओं का जिक्र
कर्नल बख्शी ने यह भी कहा कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है। इसके लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की प्रक्रियाएं और क्लीयरेंस शामिल रही हैं।
उनका कहना था कि सोशल मीडिया आधारित त्वरित सक्रियता और वास्तविक नीति-निर्माण में अंतर होता है। किसी भी बड़े राष्ट्रीय प्रोजेक्ट के पीछे लंबी प्रशासनिक, तकनीकी और पर्यावरणीय प्रक्रिया होती है, जिसे अक्सर सार्वजनिक बहस में नजरअंदाज कर दिया जाता है।
हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में भारत की स्थिति
चर्चा के दौरान कर्नल बख्शी ने कहा कि ‘बंगाल की खाड़ी’ (Bay of Bengal) का नाम भारत के भूगोल और इतिहास से जुड़ा है, लेकिन वास्तविक नियंत्रण और प्रभाव के स्तर पर भारत अभी उतनी मजबूत स्थिति में नहीं है जितनी होनी चाहिए।
उन्होंने चीन की बढ़ती समुद्री मौजूदगी की ओर इशारा करते हुए कहा कि हिंद महासागर में भारत को अपनी ‘चोक-पॉइंट’ (Choke Point) क्षमता मजबूत करनी होगी। उनके अनुसार, समुद्री मार्गों पर निगरानी और नियंत्रण केवल सैन्य शक्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक और भू-राजनीतिक सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
आसियान देशों के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी
पॉडकास्ट में दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ भारत के संबंधों पर भी चर्चा हुई। कर्नल बख्शी ने कहा कि आसियान (ASEAN) देशों के साथ भारत की साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है और ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट इस दिशा में भारत की रणनीतिक क्षमता को और बढ़ा सकता है।
उनके अनुसार, यह केवल एक आर्थिक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की शक्ति-प्रदर्शक उपस्थिति का प्रतीक बन सकता है। उन्होंने इसे भारत के सामरिक ‘दांत’ के रूप में भी वर्णित किया, जो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में अहम भूमिका निभा सकता है।
भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग
रणनीतिक कनेक्टिविटी के संदर्भ में कर्नल बख्शी ने भारत, म्यांमार और थाईलैंड के बीच विकसित हो रहे ‘त्रिपक्षीय राजमार्ग’ (Trilateral Highway) का भी उल्लेख किया।
उन्होंने बताया कि भारत ने म्यांमार में सड़क निर्माण परियोजनाओं पर काम किया है, जो केवल बुनियादी ढांचा निर्माण नहीं बल्कि क्षेत्रीय प्रभाव और संपर्क क्षमता बढ़ाने का हिस्सा है।
उनके अनुसार, भविष्य की भू-राजनीति में केवल सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि सड़क, बंदरगाह, समुद्री मार्ग और आर्थिक संपर्क भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया की अस्थिरता
पॉडकास्ट में ईरान-इजरायल तनाव और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के संदर्भ में भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी चर्चा हुई। कर्नल बख्शी ने कहा कि पश्चिम एशिया में किसी भी बड़े संघर्ष का सीधा प्रभाव वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ता है और भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।
उन्होंने विशाखापत्तनम में बनाए गए भारत के सामरिक तेल भंडार (Strategic Oil Reserves) की सराहना की। उनके अनुसार, यह कदम भविष्य की आपात परिस्थितियों में भारत को ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने में मदद करेगा।
कर्नल बख्शी का कहना था कि आधुनिक भू-राजनीति में ऊर्जा सुरक्षा भी राष्ट्रीय सुरक्षा का ही हिस्सा है।
कॉक्स बाजार और हथियारों की तस्करी
पॉडकास्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में हथियारों की तस्करी और आतंरिक सुरक्षा चुनौतियों पर केंद्रित रहा।
कर्नल बख्शी ने बताया कि बांग्लादेश का कॉक्स बाजार (Cox’s Bazar) क्षेत्र लंबे समय से हथियारों की तस्करी का प्रमुख मार्ग रहा है। उनके अनुसार, चीन और पाकिस्तान से आने वाले हथियार विभिन्न नेटवर्कों के जरिए भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंचाए जाते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जब उल्फा (ULFA) सक्रिय था, तब कॉक्स बाजार में एक बड़े ऑपरेशन के दौरान लगभग 5,000 हथियार और करीब 1,15,000 कारतूस पकड़े गए थे। इसे बांग्लादेशी सेना और पुलिस की बड़ी सफलता माना गया था।
‘ऑपरेशन गोल्डन ट्रायंगल’ और पूर्वोत्तर का नेटवर्क
कर्नल बख्शी ने 1995-96 के दौरान हुए ‘ऑपरेशन गोल्डन ट्रायंगल’ (Operation Golden Triangle) का भी उल्लेख किया।
उन्होंने बताया कि हथियारों का एक बड़ा जखीरा बांग्लादेश की ‘नाफ’ (Naf) नदी के रास्ते म्यांमार पहुंचा था। वहां से मिलिटेंट समूह मिजोरम सीमा पार कर मणिपुर और नागालैंड की ओर बढ़े।
इस दौरान भारतीय सेना ने म्यांमार सेना के साथ समन्वय स्थापित किया। ऑपरेशन में 35-36 आतंकवादी मारे गए और लगभग 135 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
‘ऑपरेशन लीच’ का जिक्र
कर्नल बख्शी ने 1998 के आसपास चलाए गए ‘ऑपरेशन लीच’ (Operation Leech) का भी जिक्र किया।
उन्होंने बताया कि कुछ मिलिटेंट हथियारों के साथ अंडमान क्षेत्र के एक द्वीप पर रुके हुए थे, जहां उन्हें घेरकर पकड़ा गया। हालांकि बाद में राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण यह मामला जटिल हो गया।
उनके अनुसार, इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि भारत के समुद्री और तटीय क्षेत्रों की निगरानी केवल बाहरी सुरक्षा नहीं बल्कि आंतरिक स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
‘सेफ रूट्स’ को ‘चोक’ करना क्यों जरूरी
कर्नल बख्शी ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत में सक्रिय उग्रवादी नेटवर्कों को कमजोर करने के लिए उनके ‘सेफ रूट्स’ (Safe Routes) और हथियार आपूर्ति श्रृंखला को ‘चोक’ (Choke) करना जरूरी है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि निकोबार में मजबूत बुनियादी ढांचा और समुद्री निगरानी क्षमता विकसित करने का एक बड़ा उद्देश्य यही है कि भारत अपने समुद्री क्षेत्रों पर बेहतर नियंत्रण स्थापित कर सके।
युवाओं के लिए संदेश
पॉडकास्ट के अंत में कर्नल बख्शी ने युवाओं से अपील की कि वे केवल सोशल मीडिया आधारित ‘रील्स एक्टिविज्म’ (Reels Activism) तक सीमित न रहें।
उन्होंने कहा कि आज के समय में एआई (AI), डेटा और ओपन-सोर्स जानकारी के माध्यम से किसी भी मुद्दे की तथ्यात्मक जांच संभव है। इसलिए लोगों को किसी भी नैरेटिव को आंख बंद करके स्वीकार करने के बजाय तथ्यों और राष्ट्रीय हितों के व्यापक परिप्रेक्ष्य को समझना चाहिए।
उनका कहना था कि यदि भारत को वास्तव में ‘विश्वगुरु’ बनना है, तो उसे कठिन लेकिन आवश्यक रणनीतिक निर्णय लेने होंगे और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी होगी।




